सोमवार, 4 जनवरी 2021

भाषा

 भोथरी होती जाती है 

मेरी भाषा

हर रोज़ सान पर लगाता हूँ

लिखता हूँ

ताकि चमक बरकरार रहे

लेकिन

भय के फंदे मेरे भीतर पल रहे हैं

छटपटा रहे हैं आंसू

पर उन्हें बिना धार के

कैसे रुला पाऊंगा मैं

हँसा भी नहीं सकता

भाषा मेरे भीतर भय बनकर रह गई है

उसमें कोई न कोई अक्सर

य लगा जाता है

भाषा का स्थगन

 मेरा ठहर जाना है

लेकिन

मैं जोखिम लेने को तैयार नही

मैं उम्मीदें बँधाने को राजी नही

मैं दर्द के दरिया को क्यों छेड़ूँ

हरहराते घावों को क्यों छेड़ूँ

मैं नहीं कह पाऊंगा कि

निकल आओ घर से

सड़क पर भिड़ो

टूट जाओ या मर जाओ

पर अपनी बात बोलो

मैं नहीं लिखूंगा उनकी कहानी

खून से लथपथ हैं तो क्या

स्याही की जगह नहीं भरूंगा

कलम में रक्त की धार

नहीं बताऊँगा कि

मैंने जलते घरों की शहादत देखी

क्यों लिखूँ कि किन कब्रों में दफन हैं बच्चे

©सुनील_सोनी

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दिवाली की शुभकामनाएं

कविता : सुनील  स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी