भोथरी होती जाती है
मेरी भाषा
हर रोज़ सान पर लगाता हूँ
लिखता हूँ
ताकि चमक बरकरार रहे
लेकिन
भय के फंदे मेरे भीतर पल रहे हैं
छटपटा रहे हैं आंसू
पर उन्हें बिना धार के
कैसे रुला पाऊंगा मैं
हँसा भी नहीं सकता
भाषा मेरे भीतर भय बनकर रह गई है
उसमें कोई न कोई अक्सर
य लगा जाता है
भाषा का स्थगन
मेरा ठहर जाना है
लेकिन
मैं जोखिम लेने को तैयार नही
मैं उम्मीदें बँधाने को राजी नही
मैं दर्द के दरिया को क्यों छेड़ूँ
हरहराते घावों को क्यों छेड़ूँ
मैं नहीं कह पाऊंगा कि
निकल आओ घर से
सड़क पर भिड़ो
टूट जाओ या मर जाओ
पर अपनी बात बोलो
मैं नहीं लिखूंगा उनकी कहानी
खून से लथपथ हैं तो क्या
स्याही की जगह नहीं भरूंगा
कलम में रक्त की धार
नहीं बताऊँगा कि
मैंने जलते घरों की शहादत देखी
क्यों लिखूँ कि किन कब्रों में दफन हैं बच्चे
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें