जो पगडंडियाँ आसमां से लौटी हैं
बहुत तन्हा हैं, बड़ी सूखी-सूखी हैं
रहने दो अभी, बरसेंगे तो दिख जाएंगे
बादलों ने ग़म की खेती में कुछ देर की है
घुमड़ आए हैं खूब, घने भी अच्छे हैं
अम्बर की झोली खुलने में जरा सी देरी है
कितनी मायूस है, बिछड़कर उससे जो
उदास है हवा, फिर भी बहकी-बहकी है
कभी आएंगे और, तो बाज़ी जीत लेंगे
खेल बाक़ी है, पर खेत होने का जी है
भरम जब भी बनेंगे, खूबसूरत होंगे
सच के दरिया में क्या डूबना ज़रूरी है
© Sunil Soni
©सुनील_सोनी
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