बारिशों में भीगें और तुम नहीं तो क्या मज़ा
उल्फतों में मिलके न भीगे तो बताओ क्या मज़ा
बूँदों ने समझा ज़ुल्फ़ घटा-सी तेरी छाई है
इश्क़ में ऐसा भरम न चलता रहे तो क्या मज़ा
ख़्वाब में ही भीगना सच में हो जाना तरबतर
ख़्याल बादल-सा न उमड़ा तो बताओ क्या मज़ा
छिपके बिजली-सा चमक के गिर जाना दस्तूर है
बिजलियों में अक्स तेरा न उभरे तो क्या मज़ा
पानी की रवानी के किसी किस्से में तुझको खोजना
दरिया-सा बहकर बहके नहीं तो बहने का क्या मज़ा
शबनम ढलकती ही रही गालों पे तेरे रातभर
सफर में राहें हमनवां की बदलें नहीं तो क्या मज़ा
-सुनील सोनी