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सोमवार, 11 जुलाई 2022

बारिश

बारिशों में भीगें और तुम नहीं तो क्या मज़ा

उल्फतों में मिलके न भीगे तो बताओ क्या मज़ा


बूँदों ने समझा ज़ुल्फ़ घटा-सी तेरी छाई है

इश्क़ में ऐसा भरम न चलता रहे तो क्या मज़ा


ख़्वाब में ही भीगना सच में हो जाना तरबतर

ख़्याल बादल-सा न उमड़ा तो बताओ क्या मज़ा


छिपके बिजली-सा चमक के गिर जाना दस्तूर है

बिजलियों में अक्स तेरा न उभरे तो क्या मज़ा


पानी की रवानी के किसी किस्से में तुझको खोजना

दरिया-सा बहकर बहके नहीं तो बहने का क्या मज़ा


शबनम ढलकती ही रही गालों पे तेरे रातभर

सफर में राहें हमनवां की बदलें नहीं तो क्या मज़ा



-सुनील सोनी

दिवाली की शुभकामनाएं

कविता : सुनील  स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी