सोमवार, 4 जनवरी 2021

नहीं था मन मेरा (ग़ज़ल 12)

 


बेझिझक जिस तरह चली आई थी
बेझिझक उस तरह चली जाए भी

बहुत भोली है वो, रुकती भी नहीं
इतराई सी शरमाई सी हरजाई सी

बचपन भरी आँखें चंचल सी नहीं
बेपरवाह हैं मुझसे, कुछ सुस्ताई सी

मेरा मुक़द्दर कहाँ खींच लाया मुझको
सुबह सुबह देखा उसको अलसाई सी

लटें सुलझाती हुई कभी बिखराती हुई
सुबह सुबह देखा उसको अलसाई हुई

बसंत में अमराई सी कुछ कुछ बौराई भी
कुछ कुछ अपनी सी कुछ कुछ पराई भी

धड़कनें धीमी नहीं पड़ती मेरी
आ जाती है वो थोड़ी सकुचाई हुई

© Sunil Soni

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दिवाली की शुभकामनाएं

कविता : सुनील  स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी