तेरी आवाज़ मेरी आवाज़ से कितनी मिलती है
तेरी सूरत मेरे नग़मे से भी कितनी मिलती है
ख़्वाब में भी असलियत से कितनी मिलती है
मेरी ज़िंदगी तेरी उम्मीद से कितनी मिलती है
कोई सूरत न छोड़ी जो तेरी गली से मिलती है
तेरे बहाने हर शाम जैसे मुझसे मिलती है
ज़माना भूल जाएगा कब तू किससे मिलती है
मेरे बारे में ही सोचा कर कि तबीयत बहलती है
सुनील ओ अगरचे भरम बाक़ी तो मिलती है
ये मानो ख़ाक में ही उल्फ़त हर बार मिलती है