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शनिवार, 16 जनवरी 2021

आवाज़


तेरी आवाज़ मेरी आवाज़ से कितनी मिलती है

तेरी सूरत मेरे नग़मे से भी कितनी मिलती है


ख़्वाब में भी असलियत से कितनी मिलती है

मेरी ज़िंदगी तेरी उम्मीद से कितनी मिलती है


कोई सूरत न छोड़ी जो तेरी गली से मिलती है

तेरे बहाने हर शाम जैसे मुझसे मिलती है


ज़माना भूल जाएगा कब तू किससे मिलती है

मेरे बारे में ही सोचा कर कि तबीयत बहलती है


सुनील ओ अगरचे भरम बाक़ी तो मिलती है

ये मानो ख़ाक में ही उल्फ़त हर बार मिलती है

सोमवार, 4 जनवरी 2021

दीवाना (ग़ज़ल 15)

 साये के साथ

रंग हैं नहीं

जो छोड़ता कभी कहीं

कब कहाँ जाएंगे नहीं

वहीं कहीं नहीं सही

यहीं अभी सही यही

हमसफ़र सफ़र में नहीं

साया कभी साया नहीं

रंग सुर्ख़ सुर्खी में नहीं

लहू छलक आया नहीं


©सुनील_सोनी

©SuneilSoni

तू भी, तू ही (ग़ज़ल 14)

 तू भी, तू ही


इस फ़साने में जहाँ भी तेरा नाम होगा

शक़ नहीं वहीं मेरे दिल का मुकाम होगा


फरिश्तों ने भी आज़माए हैं अमल सारे

गुजरेगी तू जहाँ से वहीं मेरा नाम होगा


सवालों के जो भी निकलेंगे सफे

देखना जवाबों में मेरा नाम होगा


कोई कह दे बिगड़ा तो मान लूंगा

नशा भी तेरा है, तेरा ही नाम लूंगा


बहुत दूर हैं गलियां दिल की तेरे बिन

जिस तरफ निकलूंगा, तेरा नाम लूंगा


बहुत दूर हैं गलियां दिल की तेरे बिन

जिस तरफ निकलूंगा, तेरा नाम लूंगा


पनाहों में तेरी दिल तभी रख दिया था

छोड़ूंगा जब भी दुनिया तेरा नाम लूंगा


हर शहर तेरा हर बसर तेरा

जब भी बसूँगा तेरा नाम लूंगा


इबादत के बाज़ार मुमकिन नहीं हैं

पढूंगा दुआ किसी दिन तो तेरा नाम लूंगा


सतह पर सितारों की जाकर हो बैठे

चाँद शिकवा करेगा तो तेरा नाम लूंगा


©सुनील_सोनी

©Sunil Soni


तुझ तक (ग़ज़ल 13)

 


सरे शाम धूप खिल रही है बेकायदा

रात धीरे-धीरे तेरी हँसी बन रही है


बू ए गुल का सफर सांस तक बेक़ायदा

सुबह धीरे-धीरे तेरी सदा बन रही है


नज़र के निशां पर जिरह बेक़ायदा

आहें तेरी मेरी दास्तां कह रही हैं


दुपहरी में आँसू बरसते बेक़ायदा

नैनों से बदली तेरे कहीं खो रही है


भोर तक न सोने के बहाने बेक़ायदा

नींद धीरे-धीरे तिरी गहरी हो चली है


परछाइयों की मासूमियत बेक़ायदा

हर वक़्त पीछे तिरे बस चल रही हैं


©सुनील_सोनी

© Sunil Soni

नहीं था मन मेरा (ग़ज़ल 12)

 


बेझिझक जिस तरह चली आई थी
बेझिझक उस तरह चली जाए भी

बहुत भोली है वो, रुकती भी नहीं
इतराई सी शरमाई सी हरजाई सी

बचपन भरी आँखें चंचल सी नहीं
बेपरवाह हैं मुझसे, कुछ सुस्ताई सी

मेरा मुक़द्दर कहाँ खींच लाया मुझको
सुबह सुबह देखा उसको अलसाई सी

लटें सुलझाती हुई कभी बिखराती हुई
सुबह सुबह देखा उसको अलसाई हुई

बसंत में अमराई सी कुछ कुछ बौराई भी
कुछ कुछ अपनी सी कुछ कुछ पराई भी

धड़कनें धीमी नहीं पड़ती मेरी
आ जाती है वो थोड़ी सकुचाई हुई

© Sunil Soni

तस्वीर (ग़ज़ल 11)

 जो पगडंडियाँ आसमां से लौटी हैं

बहुत तन्हा हैं, बड़ी सूखी-सूखी हैं

रहने दो अभी, बरसेंगे तो दिख जाएंगे
बादलों ने ग़म की खेती में कुछ देर की है

घुमड़ आए हैं खूब, घने भी अच्छे हैं
अम्बर की झोली खुलने में जरा सी देरी है

कितनी मायूस है, बिछड़कर उससे जो
उदास है हवा, फिर भी बहकी-बहकी है

कभी आएंगे और, तो बाज़ी जीत लेंगे
खेल बाक़ी है, पर खेत होने का जी है

भरम जब भी बनेंगे, खूबसूरत होंगे
सच के दरिया में क्या डूबना ज़रूरी है

© Sunil Soni

©सुनील_सोनी

हम (ग़ज़ल 10)

 

छोर पर ज़माने के कबसे टिके हुए हैं
दोस्ती के बूते ही दुनिया में ठहरे हुए हैं

मिलते नहीं हैं जो, फिर भी मिल ही जाते हैं
हासिल हैं सारे जो, दुआएँ उनकी बड़ी हैं

बुलंदी पर यूँ तो शौहरत के मकाम हैं
यारों की सोहबत में न्यौछावर तमाम हैं

फ़िक्र बिखरी हुई पड़ी धूप सी आसपास
शुक्र है यारियां उसमें ठिठकी सी पड़ी हैं

रक़ाबत पुरज़ोर कभी इश्क़ की गली में
यारो को ग़ैर से हारें वो बुज़दिल नहीं हैं

©SuneilSoni

खेल (ग़ज़ल 9)

 अभी लाल है, अभी पीला होगा

चित्रों में बच्चों के नीला भी होगा


दुल्हन सजी है, दूल्हा भी सजा है

बच्चों के खेल में ये आम होगा


गुलाबी है चुनरी, लहंगा भी गुलाबी

दुल्हन का गजरा घर महका देगा


बजेगा बाजा तो नाचेंगे बाराती

मजा आएगा, क्या खूब खेल होगा


फिर होगी विदाई, तो मैं न जाने दूँगी

कहेगी बिटिया रानी, यही खेल होगा


दुल्हन ही क्यों जाए, दूल्हा आ जाए

खिलौना संसार किस्सा आम होगा

©सुनील_सोनी

जश्ने आज़ादी

ख़्याल ए आज़ादी से छा गईं रौनकें

आसमां पे देखिए तिरंगा लहराया है


कभी खेतों में कभी मैदां में झलकें

गंगा-जमुना में मुहब्बतों का साया है


खुशबुओं के दौर जो सांसों से गुज़रे 

चमन ए हिन्द में फूल कोई बौराया है


सरहदों से रुकते नहीं कभी झोंके

नाम ओ रुतबा ए गुल जहां पे छाया है


तारीख़ ए दौरां ए दुश्वारी के सफ़े मौजूं

इन बादलों के जाने का मौसम आया है


इंद्रधनुषों के पार सूरज ज्यों चमके

इल्म की रौशनी हिन्द का सरमाया है


@SuneilSoni

©सुनील_सोनी

पस ओ पेश (ग़ज़ल)

 कहता हूँ ख़ुद और ठहर जाता हूँ

ठिठकता हूँ, फिर जाग जाता हूँ

 

अँधेरे इंतहाई मेरे जानिब तन्हा

वादों पे हर शब गुज़ार जाता हूँ

 

खिड़की के पार बगीचे होंगे

सोच के हर रोज़ ठहर जाता हूँ


©सुनील_सोनी

साँप की प्रार्थना


हतप्रभ हूँ मनुष्य!

मेरा ज़हर

द्वेष-राग से नहीं उपजा

न ही किसी लाभ के लिए

कभी जान ली है मैंने

केंचुल धारण नहीं किया 

और न ही रूप बदलता हूँ

यह सब प्रकृति ने 

बख्शा है मुझे

हे, मनुष्य ! 

क्यों मेरी उपमा

मानवीय कर दी तुमने

क्यों लजाते हो मुझे

तुम ही हो

जिससे सदा बचना चाहता हूँ

धर्मग्रन्थों से

मुझे निकाल फेंको

मेरा ज़िक्र नृशंस आख्यानों में न आने दो

मैं निम्नतम कोटि का पशु हूँ

तुम प्रथम पायदान पर

मैं वही रहना चाहता हूँ

जो हूँ

मैं किसी तौर

मनुष्य नहीं होना चाहता


©सुनीलसोनी




कोई (ग़ज़ल)

 ये मासूमियत मेरे कंधों पे भारी बोझ है

कोई मेरे भीतर के बच्चे को रोको तो ज़रा


हर तरफ़ वही वहशत शब ओ रोज़ है

मुझसे बहती मोहब्बत को रोको तो ज़रा


चमन पे बेवज़ह खिज़ां मेहरबां क्यों है

सियासत फ़िज़ां में घुल गई कुछ ज़रा


मेरे माज़ी में मुस्कुराहट का खज़ाना है

कभी तुझसे मिलूंगा तभी सोचा था ज़रा


इंतक़ाम में रक़ीबों को गुल से नवाजा है

कहाँ से उठती है खूँ की बू रोको तो ज़रा


मुँह फेर ले जो तसव्वुर हुस्न का इश्क़ है

सितमग़र वो नहीं मगर सूरत देखो तो ज़रा


©सुनील_सोनी



ताब

 मैंने परचम बनाया है तू एक नज़र डाल तो ज़रा

मेरी आँखों से आँखें मिलाने की ताब ला तो ज़रा

तेरी बात (ग़ज़ल 5)


मेरी आँखों में अब जितना वीराना है

वही गली-कूचो का भी अब तराना है


मेरे दिल में अभी आँसू जो उभरा है

कबसे उसकी आँखों में भी वो ठहरा है


मेरे सीने से आती है जो उसकी सदा

मेरी वफ़ा भी उसकी धड़कन में रवां है


तड़पती बिजली जोश में बादल भी

बरस जाने की मेरी बेक़रारी भी जवां है


लाज़िम है उदासी का यूँ तारी हो जाना

मेरे हर रास्ते से वो कभी तो गुज़रा है


©सुनील_सोनी

ये दिन (ग़ज़ल 4)


कट जाता है दिन, पर रात नहीं कटती
कट जाती है दुपहर, शाम नहीं कटती

फुर्र होती सुबह बच्चों के खेल में मुब्तिला
बेबस हूँ, मुए फ़ोन से दूरी नहीं घटती

शुक्र है कि रात तन्हा, अभी ख्वाब सोये हैं
तेरी यादों के बिन यां, क्या वरना गुज़रती

महकेंगे ज़माने फुरकत के, ख़ुशबू से
कहाँ भूला कस्तूरी थी तेरे आने से उठती

हिसाबों में पड़ा हूँ यूं कि न दिन कोई छूटे
तय है वस्ल, क्यों शब न हिज़्र की गुज़रती

©सुनील_सोनी

©suneilsoni





तू (ग़ज़ल)

वीराने में सहमा-सा छू जाता है

कोई नहीं है बस तू याद आता है

यह नहीं कि तेरी याद में खोया हूँ
हवा चलती है तो तू याद आता है

बिजलियाँ चमकें या बरसात हो
सीने से लिपटा तू याद आता है

अभी साया कोई गुज़रा छूकर
हमसाया मुझे तू याद आता है

पेशानी से बोसा मिटाया नहीं है
आईना देखकर तू याद आता है

©SuneilSoni

ग़ज़ल (2) याद

 गश्त यूँ ही गली में लगती रही

मुश्क़ यूँ ही गली में फबती रही


यादों के सफ़र में मैं जगती रही

ख्वाबों के आईने में सजती रही


दिल ज़र्रा ज़र्रा यूँ फुदकता रहा

पेड़ पे कोई कोयल कूकती रही


गजरे से फूल आँगन में गिरते रहे

आंसुओं से गली मेरी सजती रही


तू चली आ कि बज़्म भरती नहीं

महफ़िल तेरे बिन बहकती नहीं

©सुनील_सोनी

©suneilsoni




तरक़ीब

 दिल न डूबे बेवजह, तहखानों में झाँकिए

रिश्तों के संदूक में पुड़िया खुशियों की फाँकिए


दिल में न हो हरारत तो जी किसी का बाँटिए

रंजिश से पड़ी खाई हों तो मोहब्बत से पाटिए


©सुनील_सोनी

ताक़त

 ग़ुलामी की बू न जाएगी जब तक

बग़ावत नौजवां ख़ूँ से न जाएगी

©सुनील_सोनी

वीराना (ग़ज़ल)

 सन्नाटों में दिल के वीराना भी जुड़ गया

याद का धुआँ उठा औ आँखों से बह गया


दोस्तो के हाथ में ही था ज़िम्मा चिराग का

ज़माना मुड़ा तो वफ़ा का ख्वाब बह गया


ज़ुल्मत से आरज़ू क्या किसी ने की होगी

मेरे वक़्त ए आफ़ताब का किस्सा सो गया


साँसों का भरम जोर का झोंका ले गया

हासिल कुल जमा ख़्वाब तनहा रह गया

 

©सुनील_सोनी


दिवाली की शुभकामनाएं

कविता : सुनील  स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी