सोमवार, 4 जनवरी 2021

साँप की प्रार्थना


हतप्रभ हूँ मनुष्य!

मेरा ज़हर

द्वेष-राग से नहीं उपजा

न ही किसी लाभ के लिए

कभी जान ली है मैंने

केंचुल धारण नहीं किया 

और न ही रूप बदलता हूँ

यह सब प्रकृति ने 

बख्शा है मुझे

हे, मनुष्य ! 

क्यों मेरी उपमा

मानवीय कर दी तुमने

क्यों लजाते हो मुझे

तुम ही हो

जिससे सदा बचना चाहता हूँ

धर्मग्रन्थों से

मुझे निकाल फेंको

मेरा ज़िक्र नृशंस आख्यानों में न आने दो

मैं निम्नतम कोटि का पशु हूँ

तुम प्रथम पायदान पर

मैं वही रहना चाहता हूँ

जो हूँ

मैं किसी तौर

मनुष्य नहीं होना चाहता


©सुनीलसोनी




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दिवाली की शुभकामनाएं

कविता : सुनील  स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी