स्वप्न आँखों को जगाता
पुष्प नव नित ज्यों खिलाता
आसमां से धरती मिलाता
रंग सूरज में भरे
चंद्रमा जैसे सजे
हर तरफ हरियाली नई
नदी ज्यों समंदर से मिली
जल भी वही, थल भी वही
खेत में मिट्टी वही
अंकुर पौधा पेड़ वही
आज से कल तक वही
यह सृजन है
स्वप्न है
सृष्टि नई
दृष्टि नई
सपना उगेगा
खेत में
हल लगेगा
जोत में
बीज सृजन के
बोये हैं
मतवाले
खोये हैं
नव दृष्टि का पर्व है
नव सृष्टि का सर्ग है
तूने जो सपना बोया था
चल उसे सींचते हैं
हँसी का जो आँसू खोया था
चल उसे खींचते हैं
नया नहीं बस सोया था
चल उसे उठाते हैं
सृजन राग तेरे मन बैठा
चल उसे हम गाते हैं
©सुनील_सोनी
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