सोमवार, 4 जनवरी 2021

कोई (ग़ज़ल)

 ये मासूमियत मेरे कंधों पे भारी बोझ है

कोई मेरे भीतर के बच्चे को रोको तो ज़रा


हर तरफ़ वही वहशत शब ओ रोज़ है

मुझसे बहती मोहब्बत को रोको तो ज़रा


चमन पे बेवज़ह खिज़ां मेहरबां क्यों है

सियासत फ़िज़ां में घुल गई कुछ ज़रा


मेरे माज़ी में मुस्कुराहट का खज़ाना है

कभी तुझसे मिलूंगा तभी सोचा था ज़रा


इंतक़ाम में रक़ीबों को गुल से नवाजा है

कहाँ से उठती है खूँ की बू रोको तो ज़रा


मुँह फेर ले जो तसव्वुर हुस्न का इश्क़ है

सितमग़र वो नहीं मगर सूरत देखो तो ज़रा


©सुनील_सोनी



कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

दिवाली की शुभकामनाएं

कविता : सुनील  स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी