Mishra लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
Mishra लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 9 मई 2016

राज ने समाज से पानी छीना

मौजूदा दौर में जब हर ओर पानी का संकट है, बहुत से लोगों ने इसे पहले भांप लिया था. अनुपम मिश्र भी उन्हीं में से एक हैं. वे कई दशकों से समाज और राजनीतिज्ञों को इस बारे में चेता रहे हैं.  12 साल पहले उनकी बातें कितनी सटीक निकलीं, देखिये ये इंटरव्यू :

‘राज ने समाज के हाथ से पानी छीना’



अनुपम मिश्र देश के एक प्रमुख गांधीवादी कार्यकर्ता हैं और पानी पर बहुत चिंता के साथ काम कर रहे हैं. उनकी किताबें ‘राजस्थान की रजत बूँदे’ और ‘आज भी खरे हैं तालाब’ में उनकी चिंता और काम की गहराई, दोनों नजर आते हैं. वे दिल्ली में गांधी शांति प्रतिष्ठान के प्रमुख
हैं. उनकी दूसरी पहचान हिन्दी  के शीर्षस्थ कवि भवानी प्रसाद मिश्र का पुत्र होना है. जाहिर है, समाज और प्रकृति की चिंता उन्हें विरासत में मिली है. उनका कहना है कि पानी का प्रबंधन समाज को ही सौंप देना चाहिए. राजकर्ताओं को यह समझना चाहिए कि सदियों पुरानी इस सभ्यता में आम आदमी पानी का बेहतरीन इस्तेमाल करता रहा है.

जुलाई, 2004  में वे नागपुर आए तो सर्वोदय आश्रम में एक स्लाइड शो के साथ ‘राज, समाज और पानी’ के मुद्दे पर व्याख्यान दिया. वहीं उनसे कुछ मुद्दों पर मेरी चर्चा हुई. पढ़िए  :



सवाल  : अनुपमजी; पानी को लेकर इन दिनों जिस तरह से हौआ खड़ा किया गया है. संयुक्त राष्ट्र की तमाम एजेंसियों से लेकर उद्योगपति और सरकारें बड़ी चिंतित दिखती हैं. पानी के लिए युद्ध तक की बातें होती हैं? कहीं ऐसा नहीं लगता कि यह हौआ कुछ ताकतवर लोगों को फायदा पहुँचाने की साजिश का हिस्सा है? उसकी मानसिक तैयारी करवाई जा रही है?

जवाब : देखिए, मैं इसे सीधे साजिश के रूप में नहीं देखता. इसे ऐसा देखा जाना चाहिए कि भूमंडलीकरण और निजीकरण के इस दौर में हर चीज का निजीकरण हो रहा है. यह दरअसल निजीकरण का झंडा है. इसमें पानी एक मुद्दा है. बाकी में जमीन है, जंगल है और समूचे प्राकृतिक संसाधन हैं. हर चीज का निजीकरण करने की मुहिम है. यहां तक कि सरकारों का निजीकरण होने जा रहा है. जहां तक युद्ध वाली बात है तो व्यापक संदर्भ में तो नहीं, पर देखिए कि घर-घर में पानी को लेकर झगड़ा है. भाई-भाई लड़ रहे हैं. यानी खतरा तो है. लेकिन, यह खतरा पानी की कमी की वजह से नहीं है. दरअसल, पानी का जिस बदतमीजी से उपयोग हो रहा है, वह इस खतरे का कारण है. फसलों में ज्यादा पानी लगने लगा है, घर बड़े होने लगे हैं और उनमें हरेक सदस्य के लिए टॉयलेट है. बरअक्स इसके, जमीन के पानी को बनाए रखने का कोई प्रयास नहीं है. शहरी लोगों को धूल से नफरत होने लगी है. वे सड़कों को सीमेंट-कांक्रीट की बना रहे हैं. कोई जगह नहीं छोड़ते, जहां से धूल उड़े. पानी जमीन में जाएगा कैसे? तो यह सब सहजता से हो रहा है. यानी कोई षड्यंत्र नहीं है. लेकिन, खतरा कितना बड़ा है, इसे देखिए. मुगल बादशाह अकबर को उसकी राजधानी फतेहपुर सीकरी को इंजीनियरों के तमाम प्रयासों के बावजूद 16 साल बाद खाली करना पड़ा. सिर्फ पानी की वजह से. जो संपन्न शहर हैं, वे पानी खींचकर ले आते हैं. यमुना और गंगा से दिल्ली तक पानी पहुँचाते हैं. लेकिन, और पानी चाहिए.

सवाल  : एक मुद्दा यह भी है कि जो आप कहते हैं कि समाज को पानी का प्रबंधन और अधिकार सौंप देना चाहिए तो जो राष्ट्रीय संपत्ति  है, उसका क्या होगा? क्या यह सरकार जो लोगों ने चुनी है, वह कोई निजीपन का बोध करवा रही है?
जवाब : पानी का काम अब तक समाज करता रहा है. सिर्फ डेढ़ सौ साल पहले यानी अंग्रेजों के आने के बाद यह हुआ कि पानी का प्रबंधन समाज के हाथों से छीन लिया गया. अब तक समाज के हाथ में ही पानी रहा है. राज ने न केवल समाज के हाथ से पानी छीना, बल्कि वह यह भूल गया कि लोग ही उसका सबसे अच्छा इस्तेमाल और प्रबंधन करते रहे हैं. राज ने समाज को माना ही नहीं और योजनाएं बनाकर काम करता रहा. जबकि अंग्रेजों ने भी रुड़की में स्थानीय लोगों से अपर गंगा नहर बनवाई थी और वैसी इंजीनियरिंग कोई तकनीशियन नहीं कर सकता. तो सरकार जब निकम्मी हो तो लोगों को उसका उपाय निजीकरण में नजर आने लगता है. समाज का मुखर और ताकतवर वर्ग उसका समर्थन कर देता है. हर पार्टी की राय वही हो जाती है.

सवाल  : जल नीति और नदी जोड़ो परियोजना क्या समाज को बेदखल नहीं करेंगे?

जवाब : जल नीति हो या और कोई नीति, विशुद्ध अनीति का दौर है. समाज के पोषण की चीजें नहीं रह गई हैं. नदी जोड़ो परियोजना तो अव्यावहारिक है. हालांकि, उसके लिए पैसा ही नहीं जुट पाएगा, पर चिंता की बात यह है कि उसके लिए सभी राजनीतिक दल, राष्ट्रपति-पूर्व राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री-पूर्व प्रधानमंत्री; सभी एक हो जाते हैं. साफ है कि प्रकृति नदियों को जोड़ती भी है और तोड़ती भी है. करोड़ों साल लगते हैं. गंगा-जमुना जहां से निकलती हैं, वहां से अलग हो जाती हैं. प्रकृति उन्हें इलाहाबाद में मिलाती है और लोग उसे तीर्थ बनाते हैं. अब इंजीनियरिंग से जोड़ेंगे तो सिर्फ नहरें बनेंगी और विनाश अलग होगा.

सवाल  : अलवर में राजेन्द्र सिंह या नागपुर के पास वलनी जैसे प्रयोगों को क्या कहेंगे? क्या यही माध्यम हैं?
जवाब : राजेन्द्र सिंह और वलनी के प्रयोग तो आशा की किरणों हैं. ये समाज को उसकी प्रतिष्ठा वापस दिलाएंगे. मैं तो कहता हूँ कि सरकारी विभागों को खत्म करो और ऐसे प्रयोगों को मान्यता दो. राजेन्द्र सिंह के प्रयोग 24 कैरेट के हैं. हर साल बिन बुलाए तकरीबन 35 हजार लोग उसे देखने आते हैं. सात साल से सूखा है, पर खेत लहलहा रहे हैं. जाकर देखिए.

सवाल : क्या ऐसा नहीं है कि केवल पानी की चिंता बाकी सवालों से दूर करती है?
जवाब  : नहीं; ऐसा नहीं है. इन्हें पूरक के रूप में देखना चाहिए. आखिर समाज के लिए कई स्तंभ होते हैं. अलवर के गरीबों में संपन्नता यही प्रयोग ले आए हैं.

सवाल : एनजीओ की भूमिका को लेकर आश्वस्त हैं?
जवाब  : जो काम कोषोन्मुख होगा, उसका हाल यही होगा. बीस साल पहले यूनिसेफ के पैसे से उन्हीं लोगों ने लाखों हैंडपम्प खुदवाए, जिन्हें अब जाकर तालाब, वाटरशेड नजर आ रहे हैं. उनके प्रति समाज की श्रद्धा नहीं है. वे समाज और पंचायत से सीखने के बजाय उन्हें सिखाने में लगे हैं. जबकि पंचायत 2000 साल पुरानी संस्था है.

सवाल : क्या यह नहीं माना जाना चाहिए कि समाज अपने हक के प्रति चिंतित नहीं रहा?
जवाब : दरअसल, जिस तरह से मजदूरों को कुशल नहीं माना गया और उन्हें मजदूरी करने पर मजबूर कर दिया गया उसने स्थितियां खराब की. कोई गाँव लौटकर तालाब की ओर नहीं देखता. उसे निकृष्ट काम बना दिया गया है.


दिवाली की शुभकामनाएं

कविता : सुनील  स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी