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सोमवार, 4 जनवरी 2021

स्वप्न

 स्वप्न आँखों को जगाता

पुष्प नव नित ज्यों खिलाता

आसमां से धरती मिलाता

रंग सूरज में भरे 

चंद्रमा जैसे सजे

हर तरफ हरियाली नई

नदी ज्यों समंदर से मिली

जल भी वही, थल भी वही

खेत में मिट्टी वही

अंकुर पौधा पेड़ वही

आज से कल तक वही


यह सृजन है

स्वप्न है

सृष्टि नई

दृष्टि नई



सपना उगेगा

खेत में

हल लगेगा

जोत में

बीज सृजन के

बोये हैं

मतवाले

खोये हैं

नव दृष्टि का पर्व है

नव सृष्टि का सर्ग है


तूने जो सपना बोया था

चल उसे सींचते हैं

हँसी का जो आँसू खोया था

चल उसे खींचते हैं

नया नहीं बस सोया था

चल उसे उठाते हैं

सृजन राग तेरे मन बैठा

चल उसे हम गाते हैं


©सुनील_सोनी

बारिश

 

बारिश

घर खाली है तुम बिन
खेत नम नहीं रहे
नदियों का पानी सूख रहा है
तालाब खाली हो चले हैं
मेरे घर का कुआं भी नहीं बचेगा
आँसू भी कम निकले इस बार
इससे पहले कि
मर जाए आँखों का पानी
बारिश का आना ज़रूरी है

© सुनील सोनी

कुछ अशआर



पुरानी होती जाती है जितनी

मोहब्बत सिर चढ़ती जाती है उतनी


तसव्वुर में ही है अभी महबूब मेरा

झाँकेगा तो खोल देंगे दिल की खिड़की


दिलफेंक कहो तो भी सुन लेंगे

आशिक़ न मानो तो भी सह लेंगे


नज़र भर देखो मुड़ने से पहले

 बेवफ़ाई मानकर फिर जी लेंगे


उल्फ़त की जानिब जब कभी जाना हुआ

तुझे सोचता रहा, जिक्र भी करता रहा


इश्क़ का देखिए, कैसा ये तराना है !

जबां में खुशबू ओ आँखों में फ़साना है !!


यार के लब सुखन का मज़ा देते हैं

तू कहता है मेरे शे'र जवां होते हैं


बूँद खोएगी तो आसमां में जाएगी

बूँद बिखरेगी तो जमीं पर आएगी



दरवाज़े के दोनों पार गली थी

जहाँ से चली थी वहीं भली थी



© Sunil Soni


रुका हुआ सा कुछ

खाली हाथ लौट आया है

पहले से भी ज्यादा


दिल भरा हुआ है

किसी काम का नहीं


कब्रों पर ठहरे हुए आँसू

सूखते जा रहे हैं


आँखों का खुला होना

मुर्दा होने का डर है


पत्थर पूजे जाने लगे बेहिसाब

ज़िन्दगी पत्थर सी रह गई


खुशबुएँ खून की बढ़िया हैं

औरों की पानी सी बहती हैं


कमबख्त सच को लग जाए झूठ की हवा

बदकिस्मती अपनी बददुआ भी नहीं लगती


©सुनील_सोनी

© Suneil Soni

रिक्त स्थान भरो

शहर में.... भरते जा रहे हैं...

खालीस्थान
दिलों में...
और ज़मीन पर

मेरे घर के सामने वाली गली में
खेलना;.   मुमकिन नहीं...
कि
...जैसे मैं बचपन में खेलता थाsss

सड़कें... रात में भी...
नहीं ले पाती सांस
चौराहे... सिग्नल बंद होने पर
तलाशते हैं... फुरसत

वो नीम...
बरसात में झूमता था...

पीपल के पत्तों में ठहरी बूंदें
अंजुलियों में...
ख़ज़ाना बनती थीं...

रह गए होते तो
सपना साझा करता...

नए बचपन से

नीम में...
या
बरगद में
रहनेवाले तमाम...
भूतों की कहानियां सुनाने का

शऊर
या
बिरसा
किसे सौंपू?

दुविधा है...

गुलमोहर...
गर्मियों में जला तो
हरियाते हुए दहका गया ज़मीन
सिर्फ बकाया है वही...
बेकायदा...

आसमान में...
चिड़ियों से ज्यादा...
उड़ते हुए... आदमी

पँख उगा पाते तो...
बेहतर था

मिट्टी... पेड़ उगाना भूल रही है...

पहली बारिशों की सौंधी खुशबू
12वीं मंज़िल पर...
इत्र की शीशियों में कैद हैं

सर्दियाँ; सिमट आई हैं...
एयर कंडीशनर के भीतर
शरद की; पूनों का चाँद...
प्रेम के बजाय...
फोटो प्रतियोगिता का सबब है

हम बदल रहे हैं...
जैसा चाहते थे...

आदमीयत की; आदिम इच्छाएँ...
मशीनों की रज़ामंदी हो चली हैं...

घर का बन जाना...
घर बन जाने से; अलहदा है...

जमीनों के रिक्त स्थान...
लोहा...; और कांक्रीट, भर रहा है...
दिल... पिघलकर मिट्टी हुए जा रहे हैं...

© सुनील सोनी

कुदरत

दरवाज़ों के ऊपर जो रौशनदान हैं

उन्हें खुला रखना

खिड़कियों से झाँकने वालों से डरकर

लगाना मत परदा

छत से आसमान दिखता रहे

ऐसा इंतेज़ाम करना

धूप तुम्हें पुचकार कर उठाए

इतना ध्यान रखना

झोंके इधर से चलें और उधर से जाएं

खुले में इतने रहना

बारिशों के छींटे चाय की मेज पर पड़ें

अथवा

झूले पर बैठकर चाय पीते हुए तुम्हें भिगोएं

ये ख़्याल रखना

शहर में इतना गुम न होते चले जाना

जैसे तुम शहर बन जाओ

मिट्टी पर कभी कभी नंगे पाँव

चल लिया करना

सब स्मृतियां मिट्टी से बनी हैं


© SuneilSoni


©सुनील_सोनी

भीगना

वो मकान अब भी मेरा बसेरा है

रहती थीं जब तक तुम, घर था


रूठकर भी नहीं मना पाया क्यूँ
सर से पांव तक यूं डूबा हुआ था


हक़ तेरा इतना, छोड़ दे मुझको
मैं भूल जाऊंगा, मैंने कब कहा था


तमन्ना ए सफर भी तमाम नहीं
ज़िक्र तेरे शहर का होता रोज़ था


डबडबाई आँख, ऐलान हो गए
मुक़म्मल न तेरा जां चला जाना था

© SuneilSoni

©सुनील_सोनी

जश्ने आज़ादी

ख़्याल ए आज़ादी से छा गईं रौनकें

आसमां पे देखिए तिरंगा लहराया है


कभी खेतों में कभी मैदां में झलकें

गंगा-जमुना में मुहब्बतों का साया है


खुशबुओं के दौर जो सांसों से गुज़रे 

चमन ए हिन्द में फूल कोई बौराया है


सरहदों से रुकते नहीं कभी झोंके

नाम ओ रुतबा ए गुल जहां पे छाया है


तारीख़ ए दौरां ए दुश्वारी के सफ़े मौजूं

इन बादलों के जाने का मौसम आया है


इंद्रधनुषों के पार सूरज ज्यों चमके

इल्म की रौशनी हिन्द का सरमाया है


@SuneilSoni

©सुनील_सोनी

ज़मीन

 जहाँ तक देखो हरा है

शायद इसमें लाल भी पड़ा है

मटमैला हो गया वहां पर

जहां मेरा पसीना पड़ा है

सुर्ख उग आए से लगते हैं जो फूल

मां का सिंदूर वहां झड़ा है


©सुनील_सोनी

मिट्टी

 उनकी मिट्टी में जाना है मुझे

जिसने मिट्टी में मिलाया था मुझे


हश्र ए आख़िर मिट्टी सबका

ख़ाक में ही मिल जाना है मुझे


©सुनील_सोनी

दृष्टि

 ये वृक्ष जो

मूसलाधार में

सधे खड़े हैं

कृतज्ञ हैं

आकाश के

धरा की तृप्ति के लिए

जीवन तरने के लिए

आंधियाँ

विनम्रता की उपासक हैं

वृक्ष उनके शिष्य

ढहना

सफल होने का रास्ता है

सधे रहना समर्पण का

बारिश

आत्मा है सृष्टि की


©सुनील_सोनी

मान भी जाओ

 हिकायत को न हिक़ारत से देखें हुज़ूर

ये हमारी है, उनकी भी है, दुनिया की भी है


लहू हमारे ज़ख्मों से ठहरता क्यों नहीं

सज़ा हमारी है, उनकी भी, दुनिया की भी है


सुनाते-सुनाते रोते जाते हैं बरबस

रंज हमारा उनका भी, दुनिया का भी है


मिसाल दूँ या ज़िक्र रंजिश में छोड़ दूँ

कहानी उन तक मेरी, दुनिया तक भी है


मुमकिन है एक ही वक़्त साथ हों तन्हा भी

तक़ाज़ा मेरा उनका भी है, दुनिया का भी


©सुनील_सोनी

आओ

 असंख्य द्वार

संशय के पार

तुम्हारा रास्ता देखते हैं

ज्यों हरसिंगार

गुलमोहर ज्यों

ग्रीष्म में 

शरमा कर हो जाता है लाल

झरोखे वे हरियाये हैं

झाँकती थी

कोई कली जिनसे

सरोवरों के दर्पण में

जो शिखर

बादलों के परदे से ढँके हैं

नदी की तलछटों में

रूप हर चुके हैं

वन पर बसन्त छाये से

मुझ तक तुझे लाये से

©सुनील_सोनी


आशा

 अनदेखे भी अनकहे हैं

अस्वर भी सुर से भरे हैं

दृग कब कभी किसके खुले हैं

आह ! श्वास के झोंके चले हैं

दृकपाल से हर क्षण तरसते

झूम के हर प्रहर बरसते

बादलों के मर्म में भी

प्रिय की सी छाया

धूल के कण भी अचंभित

थाप पाकर अनमने से

रक्त के आरोह में प्रतिक्षण

स्पंदनों के गीत हैं


©सुनील_सोनी

तितली कुछ पराग पाए

हरीतिमा जी भी जाए

क्यों कामना कहती चली है

मन में बहली पड़ी है

तुझसे मिलन की आशा



मन

धूप मेरे हिस्से की

बादल ले गया
इंद्रधनुष
बारिश के साथ मिलकर
बच्चों की खातिर रच गया
रात जैसा दिन में ही
घनघोर
मन भी गीला कर गया
दुःख भरा या सुख से हो तर
भेद बोता ही नहीं है
फिर विरह हो या मिलन
शेष रहता ही नहीं है

शुष्क जब भी
दिख पड़ेगा
श्याम में भी शुभ्र होगा
तब नहीं बिखेरेगा
इंद्रधनुष के रंग
बारिश का विरही
खाली बादल


©सुनील_सोनी
©suneilsoni

कमाल

 दिल पे कब ज़ुबां के आमाल चलते हैं

इश्क़ में हुज़ूर बस कमाल चलते हैं


मंदिर की घंटियाँ जोर से बजाईं तो

वो समझे कि हम बवाल करते हैं


समंदर की दहाड़ों पर हम रो दिए तो

फरेब हैं ये आंसू, कहकर चल दिए


©सुनील_सोनी

छोर

तुम्हें देख लेना

मन का छूना है
छुईमुई के पत्तों के लजाने जितना
नाजुक
तुम्हारा न देखना भी
हर क्षण
तुम्हें देखने की प्रतीक्षा
यह प्रतीक्षा चंद्रयान की
विक्रम की तलाश जितनी ही
अनवरत है
अथाह है

तुम्हारा मौन
मेरे शब्दकोश से
अधिक वाचाल है
तुम जो कहती हो
बिना मुझसे मुखातिब हुए
मैं नहीं सुन पाता
लेकिन
तुम्हारे होंठों के खुलने या बंद होने की
आवृत्ति
अधैर्य की सीमा तक
चंचल है

तुम्हारा गुस्सा
मैं देख नहीं पाता
लेकिन
तुम्हारी आँखों से रिसता हुआ
पढ़ पाता हूँ
त्यौरियों से कपाल तक
भिंच जाता है
उसका अनुमान
वर्षा का अनुमान लगाने से
सरल है

जब मैं यह कह रहा हूँ
तब
मुझे रजभर भी
भरोसा नहीं
कि
तुम जानती हो
यह सब
मैं इस रहस्य को
अरहस्य नहीं होने दूंगा कभी
मैं इसका अकेला साक्षी हूँ
और रहूंगा


©सुनील_सोनी
©suneilsoni


अनुमान

जिस गली से
अनुमान पर निर्भर
गुजरता हूँ मैं
घुप्प अंधेरे के बीच

मैंने सुना था
लाउडस्पीकर पर
गली का समापन
जगमगा देगा मुझे

कोलाहल है जैसे
गली में हैं बहुत लोग
मेरी तरह
अनुमान पर चल रहे हैं

©suneilsoni

©सुनील_सोनी

भाषा

 भोथरी होती जाती है 

मेरी भाषा

हर रोज़ सान पर लगाता हूँ

लिखता हूँ

ताकि चमक बरकरार रहे

लेकिन

भय के फंदे मेरे भीतर पल रहे हैं

छटपटा रहे हैं आंसू

पर उन्हें बिना धार के

कैसे रुला पाऊंगा मैं

हँसा भी नहीं सकता

भाषा मेरे भीतर भय बनकर रह गई है

उसमें कोई न कोई अक्सर

य लगा जाता है

भाषा का स्थगन

 मेरा ठहर जाना है

लेकिन

मैं जोखिम लेने को तैयार नही

मैं उम्मीदें बँधाने को राजी नही

मैं दर्द के दरिया को क्यों छेड़ूँ

हरहराते घावों को क्यों छेड़ूँ

मैं नहीं कह पाऊंगा कि

निकल आओ घर से

सड़क पर भिड़ो

टूट जाओ या मर जाओ

पर अपनी बात बोलो

मैं नहीं लिखूंगा उनकी कहानी

खून से लथपथ हैं तो क्या

स्याही की जगह नहीं भरूंगा

कलम में रक्त की धार

नहीं बताऊँगा कि

मैंने जलते घरों की शहादत देखी

क्यों लिखूँ कि किन कब्रों में दफन हैं बच्चे

©सुनील_सोनी

हे ! राम !!

 हे ! राम !! सिया राम !!

माया का कैसा जाल बुना है

रूप तुम्हारा ही धरकर

रावण चहुंओर खड़ा है

दस नहीं, हज़ारों अब तो

मुख पर सुविध श्रृंगार है

कितना सुंदर वेश रचा है

मोह में कहीं फंस न जाऊं

मैया सीता ज्यूँ हर न जाऊं

धर्म के छद्म में अधर्म खड़ा है

सच की छाती पर झूठ चढ़ा है

मति मेरी सुध भी रखना राम

अरज

हे राम ! हे राम !!


©सुनील_सोनी

दिवाली की शुभकामनाएं

कविता : सुनील  स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी