वो मकान अब भी मेरा बसेरा है
रहती थीं जब तक तुम, घर था
रूठकर भी नहीं मना पाया क्यूँ
सर से पांव तक यूं डूबा हुआ था
हक़ तेरा इतना, छोड़ दे मुझको
मैं भूल जाऊंगा, मैंने कब कहा था
तमन्ना ए सफर भी तमाम नहीं
ज़िक्र तेरे शहर का होता रोज़ था
डबडबाई आँख, ऐलान हो गए
मुक़म्मल न तेरा जां चला जाना था
© SuneilSoni
©सुनील_सोनी
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें