गली से गुज़रता हूँ रोज़
होती है तो नहीं देखता
नहीं होती वो तो
खोजता हूँ मैं
सूरत कोई नहीं
एहसास सा है
नहीं होता महसूस
तो रोज़ मरता हूँ मैं
अज़ब ढंग हैं
निराले दस्तूर
इश्क़ मुक़्क़मल हो तो
दास्तानें नहीं बनतीं
जी हुज़ूर कह दें
मन में घुलता है शहद
शायद अरमानों में
कोई बादशाह बैठा है
अंधेरे रोशनी हमदम हैं
बिछड़ते रूठते रहते हैं
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