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रविवार, 24 फ़रवरी 2019

#Oscars & #India

ऑस्कर 2019 और भारत

-सुनील सोनी 

ऑस्कर पुरस्कारों के वितरण में 12 घंटों से भी कम समय बचा है. लेकिन, कुछ बातें जो जरूरी हैं, जान लें. 
इस बार ऑस्कर में ऐसी दो फिल्में नामांकित हुई हैं, जिनका किसी न किसी तरह भारत से संबंध है. इनमें से एक तो बेस्ट फिल्म, बेस्ट एक्टर समेत 5 श्रेणियों में नामांकित हुई है, जबकि दूसरी जिस श्रेणी में नामांकित हुई है, वह शॉर्ट डाक्युमेंटरी है. इस श्रेणी में नामांकित फिल्म में इकलौती महिला निर्देशक हैं.

Poster : Bohemian Rhapsody
पहली फिल्म रैमी मलिक के अभिनय से सजी जीवनी ‘बोहेमियन रैपसिडी’ है. इसे ‘सर्वश्रेष्ठ फिल्म’, ‘सर्वश्रेष्ठ अभिनेता’, ‘सर्वश्रेष्ठ फिल्म एडिटिंग’, ‘सर्वश्रेष्ठ साउंड एडिटिंग’, ‘सर्वश्रेष्ठ साउंड मिक्सिंग’ जैसी श्रेणियों में नामांकित किया गया है.

‘बोहेमियन रैपसिडी’ दरअसल, एक एलबम का नाम है, जो उस ज़माने में 6 मिनट लंबा था और इतने लंबे गीत को प्रसारित करने से तब के रेडियो इनकार कर देते थे. बीबीसी उस समय बड़ा नाम था. लेकिन, एल्बम के अभूतपूर्व मिज़ाज़ को देख उसने उसे प्रसारित किया।

फ्रेडी मरक्यूरी पॉप जगत में अब तक के सबसे प्रसिद्ध नामों में से एक हैं. वे भारतीय पारसी मां बाप (जेर और बोमी बलसारा) की संतान थे. उनकी बड़ी बहन का नाम था कश्मीरा. उनका जन्म 5 सितंबर 1946 को जंजीबार में हुआ, जहां उनके पिता अंग्रेजी सरकार के कारिंदे थे. उनका ज्यादातर बचपन भारत मे बीता, जिसमें उन्होंने औपचारिक शिक्षा के अलावा संगीत दीक्षा भी ली. जंजीबार में विद्रोह हुआ, तो उनके पिता इंग्लैंड में बस गए. नौजवान फ्रेडी भी बाद में लंदन में कला की पढ़ाई करने लगे.

उन्होंने कई रॉक बैंड में काम किया, पर 1970 में उन्होंने ‘स्माइल’ नाम के बैंड में गिटारवादक ब्रायन मे और ड्रमर रॉजर टेलर के साथ काम शुरू किया. वे इस रॉक बैंड के मुख्य गायक और गीतकार थे. सालभर बाद उनके साथ संगीतकार जॉन डिकॉन भी जुड़ गए. इसके बाद उन्होंने ‘क्वीन’ नाम का गीत लिखा और रिलीज से पहले बैंड का नाम भी बदलकर ‘क्वीन’ रख दिया. इस गीत और उनके परफॉरमेंस ने धूम मचा दी. फिर बैंड ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. उन्होंने अपना नाम भी फ्रेडी बलसारा से फ्रेडी मरक्यूरी कर लिया.

Rami Malek and Freddie
‘बोहेमियन रैपसिडी’, ‘किलर क्वीन’, ‘समबडी टू लव’, ‘डोंट स्टॉप में नॉव’, ‘क्रेज़ी लिटिल थिंग कॉल्ड लव’ और वी.आर. चैम्पियंस’ जैसे हिट गीतों ने उनकी जिंदगी बदल दी. उनके चार दाँत जन्मजात बड़े थे और यही उनकी गायिकी में काम आए. वे ऊंचे और नीचे सुर भी इतनी आसानी से लगाते थे और कोई भी गीत इस तरह लय में गाते थे कि लोग उनके साथ सीधे जुड़ जाते थे. फ्रेडी का सबसे बड़ा चमत्कार यही था कि वे श्रोताओं को अपने साथ जोड़ लेते थे. कई परफॉरमेंस में उनके साथ लोग भी गाते और नाचते थे.


फिल्म में रैमी मलिक ने उनकी भूमिका निभाई है. वे सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का ऑस्कर जीत सकते हैं. एडिटिंग और साउंड एडिटिंग के दोनों पुरस्कार भी इस फिल्म को मिल सकते हैं.

‘पीरियड्स : ऐंड ऑफ सेंटेंस’

दूसरी फिल्म शॉर्ट डाक्युमेंटरी है :  ‘पीरियड्स : ऐंड ऑफ सेंटेंस’. उत्तरप्रदेश के हापुड़ के एक गांव की किशोरी छात्राओं पर बनी यह डाक्युमेंटरी लॉस एंजिल्स की 6 छात्राओं की मेहनत का फल है. यह फिल्म ऑस्कर में लघु आकार की डॉक्युमेंटरी श्रेणी में चुनी गई है. खास बात यह है कि लॉस एंजिल्स के ऑकवुड स्कूल की छह हाईस्कूल छात्राएँ में इस फिल्म की कार्यकारी निर्माता हैं. हॉलीवुड पब्लिसिस्ट लीसा टैबैक की बेटी क्लेयर स्लाइनी, फिल्म के छह कार्यकारी निर्माताओं में से एक है. फिल्म की निर्देशक रायका जेहताबकी हैं, जबकि सैम डेविस फिल्म के सिनेमैटोग्राफर, एडिटर, साउंड डिजाइनर और निर्माता हैं. गुणीत मोंगा की वजह से भारत में यह फिल्म शूट हो पाई.

25 मिनट लंबी इस फिल्म में छात्राओं से पूछे गए प्रश्नों और उत्तर के बीच लंबा सन्नाटा है, जो भयभीत करता है. यह सन्नाटा रॉ फुटेज में और लंबा है. यह दिखाता है कि कैसे भारत में लड़कियों के लिए मासिक धर्म शर्मसार करने वाली घटना है और उन्हें कोई अंदाज़ नहीं है कि इससे कैसे निपटा जाए. हापुड़ के स्कूल के छात्र-छात्राओं की बातचीत से फिल्म शुरू होती है. एक लड़का पूछता है कि क्या ये किसी कक्षा के पीरियड की तरह है, जिसके लिए एक घंटा बजता है? जब उस लड़के से पूछा जाता है कि क्या तुम पीरियड के बारे में जानते हो, वह किशोर उत्तर देता है, ‘‘यह एक तरह का रोग है न?’’

Poster of Film and Guneet Monga
अरुणाचलम मुरु गनाथनम ने सस्ते सैनेटरी पैड बनाने की जो पहल की, उसी से ईजाद मशीन को इस गांव में लगाया जाता है. यह स्नेहा, रेखा और दूसरी लड़कियों का जीवन बदल देती है. गांव की औरतें ही ये पैड बनाती हैं और बेचती हैं. यह उनके लिए आमदनी का जरिया ही नहीं है, बल्कि इसने गहरी खाई पाटने में मदद भी की है और पुरुषों के बीच भी इस विषय पर विमर्श शुरू किया है.

बाफ्टा पुरस्कारों के लिए नामांकित गुणीत मोंगा की कंपनी सिख्या एंटरटेनमेंट भी इस डॉक्युमेंटरी की निर्माता है. मोंगा ने बताया कि कि ऑकवुड स्कूल की 12-14 साल की लड़कियों के समूह ने कहीं आलेख पढ़ा कि कैसे भारत के गांवों की लड़कियों को मासिक धर्म के चलते साफसफाई और शर्म के चलते स्कूल छोड़ देना पड़ता है. उन्होंने एक्शन इंडिया नामक एनजीओ से संपर्क किया और कहा कि वे सैनेटरी पैड बनाने वाली मशीन दान करना चाहती हैं. उन्होंने कई उपक्रम चलाए और पैसे जुटाए.
लेकिन, जब उन्हें लगा कि यह पर्याप्त नहीं है तो शिक्षिका के प्रोत्साहन से उन्होंने ऑनलाइन अभियान चलाया, ताकि इस विषय में चर्चा के लिहाज से डॉक्युमेंटरी फिल्म बनाई जा सके. जैसे ही पैसे पूरे हुए, उन्होंने रायका से संपर्क किया.
मोंगा ने बताया, ‘‘उनमें से एक लड़की के माता-पिता मुझे जानते थे. उस लड़की ने मुझे भारत में शूटिंग में मदद करने के लिए कहा.’’  फिल्म में मोंगा की सहयोगी मंदाकिनी कक्कड़ का वाइसओवर है, जिन्होंने लड़कियों को मनाया और उनसे बात की.  अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद और फिर हिंदी से अंग्रेजी करना एक समस्या थी और दूसरी समस्या थी लड़कियों से कुछ कहलवा पाना. लेकिन, हमने इसे हल कर लिया.

युवा निर्देशक *रायका

Director Rayka Zehtabchi
फिल्म की निर्देशक रायका जेहताबकी इस श्रेणी में नामांकित की गईं अकेली स्त्री हैं. 25 साल की इस निर्देशक ने महज 2 साल पहले यूएससी फिल्म स्कूल से स्नातक किया है. रायका कहती हैं, ‘‘मैं जब स्नातक हुई तो इन 6 कार्यकारी निर्माताओं में से एक
लड़की रूबी शिफ के पिता ने मुझसे इस बारे में बात की. यह प्रोजेक्ट लॉस एंजिल्स के ऑकवुड स्कूल में पढ़ानेवाली अंग्रेजी शिक्षिका मेलिसा बर्टन के कारण शुरू हो पाया.’’
रायका ने बताया कि फिल्म बनाने में हमें दो साल लगे. उस गांव की औरतें कैसे दूसरी औरतों की मदद कर रही हैं, इस बारे में वे कहती हैं, ‘‘जो चीज हमें गर्व से भर देती है, वह यह कि भारत के छोटे से गांव में कुछ दृढ़निश्चयी महिलाओं का समूह ‘एक समय में एक पैड’ की प्रथा को बदलने के लिए काम कर रहा है.’’

(*रायका, दरअसल रेखा हैं और उनका सरनेम भी मेहताब से संबंधित है। वे ईरानी हैं)



मंगलवार, 24 मई 2016

दि सिनेमा ट्रैवलर्स के माथे पर ताज

‘दि सिनेमा ट्रैवलर्स’ के माथे पर ताज

शर्ली अब्राहम
अंतत: 2016 का कान्स फिल्म मेला भारत के लिहाज से खाली नहीं गया. भारत, खासकर महाराष्ट्र में टूरिंग टॉकीज यानी तंबू में प्रोजेक्टर के जरिए दिखाई जानेवाली फिल्मों को लेकर बनी शर्ली अब्राहम और अमित मधेशिया की डॉक्युमेंटरी ‘दि सिनेमा ट्रैवलर्स’ को ‘ल वील डि’ओ’ अवार्ड से नवाजा गया.

79 वर्षीय ब्रिटिश निर्देशक केन लोच की फिल्म ‘आई, डैनियल ब्लैक’ ने सर्वश्रेष्ठ फिल्म का ‘पाम डि’ओ’ जीता. वे 2006 में ‘द विंड दैट शेक्स द बार्ली’ के लिए यह प्रतिष्ठित पुरस्कार पा चुके हैं. ‘आई, डैनियल ब्लैक’  न्यूकैसल के प्रौढ़ विधुर को हार्टअटैक आने के बाद ब्रिटेन की जनकल्याण से नाउम्मीदी और समस्याओं की कहानी है. लोच का नया प्रोजेक्ट मशहूर फिल्मी हस्तियों आल्फ जोबर्ग, फ्रांसिस फोर्ड कपोला, बिले अगस्त, दि दार्देन ब्रदर्स, एमिर कुस्तुरिका, शोहेई इमामुरा और माइकल हनेके के साथ होगा.
अमित मधेशिया
फिलिपीन्स की जैकलीन जोस निर्देशक ‘ब्रिलैंट मैंडोजा की ‘मा रोसा’ में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री ठहरीं.  ब्रिटेन की एंड्रिया अर्नाल्ड की ‘अमेरिकन हनी’ को जूरी अवार्ड मिला, जबकि रोमानियाई डायरेक्टर क्रिश्चियन मुनग्यू ने फ्रांसीसी डायरेक्टर ऑलिवर असायस के साथ बेस्ट डायरेक्शन का अवार्ड पाया. ईरानी निर्देशक असगर फरहादी की फिल्म ‘फरोशांद’ (दि सेल्समैन’) ने सर्वश्रेष्ठ स्क्रीनप्ले और सर्वश्रेष्ठ अभिनेता (शाहाब हुसैनी) के अवार्ड जीते. शॉर्ट फिल्म का पॉम डि’ओ जुआनजो गिमेनेज को मिला, जबकि ज्यूरी की ओर से विशेष प्रशस्ति जाओ पॉला मिरांडा मारिया की अ मोक कुई डांसकू कॉम ओ डियाबो (दि गर्ल हू डांस विद दि डेविल) को मिला. कैमेरा डि’ओ ‘डिवाइंस’ के लिए हॉडा बेनयामिना को मिला. 

रविवार, 22 मई 2016

ये भारत भी कान्स में था मौजूद

कान्स फिल्म मेला 2016 

ये भारत भी कान्स में था मौजूद...


-सुनील सोनी

यही है वो ऐश्वर्य की बहुचर्चित लिपस्टिक 
मौजूदा वक्त में दुनिया में जितनी भी लुभावनी चीजें हैं, उनमें से सबसे रसदार है फ्रांस के कान्स में चल रहा 69वां विश्व कान्स फिल्म मेला 2016.
यह ऐसी जगह है, जहां सिनेमा जगत से जुड़ी दुनियाभर की तमाम हस्तियां हाजिरी लगाती हैं. यूं, यह फिल्म मेला यूरोप और अमेरिका को ही तरजीह देता है, पर अफ्रीका और एशिया के लिए भी वहां थोड़ी बहुत जगह होती है. खासतौर पर उन सिनेकृतियों के लिए, जिन्हें आम तौर पर उनके अपने देशों में भी लोक तक पहुंचाने के लिए भीषण मशक्कत और दुश्वारियों से गुजरना पड़ता है.

सोनम कपूर 
कान्स फिल्म मेले को भारतीय मूलत: कला की इस विधा के कलात्मक आकलन के लिए नहीं जानते. वे उसे जानते हैं ऐश्वर्या राय से लेकर विद्या बालन, ऋचा चड्ढा, सोनम कपूर और मलिका सहरावत तक के रेड कॉरपेट पर चलने को लेकर. इस बार भी भारतीय सौंदर्यमूर्तियां मेले में मौजूद रहीं. अनुराग कश्यप जैसे बहुचर्चित अभिनेता भी ‘रमन राघव 2.0’ जैसी फिल्मों को लेकर वहां पहुंचे. लेकिन, इस बार उन सबका कान्स फिल्म मेले की आधिकारिक प्रविष्टियों से लेना-देना नहीं था. वे किसी न किसी तौर पर आमंत्रित या अतिथि थे, बस.

मंटो फ्रांस में..
अचरज यह है कि नंदिता दास सआदत हसन ‘मंटो’ को लेकर कान्स हो आती हैं, पर बहुत लोगों को पता नहीं चलता.

ये हैं प्रातिनिधिक ‘भारतीय’ फिल्में


केवल नंदिता नहीं हैं, जिनकी चर्चा भारतीय सिने संसार में उस तरह नहीं हो रही है, जैसी होनी चाहिए, क्योंकि दरअसल कान्स में भारतीय उपमहाद्वीप की प्रातिनिधिक फिल्में तो यही हैं.  इन फिल्मों में ‘गुढ़’, ‘दि सिनेमा ट्रैवलर्स’, ‘अ येलो बर्ड’ और ‘जागो हुआ सवेरा’ हैं. इनमें से पहली दो तो भारतीय हैं, पर शेष दो सिंगापुरी और पाकिस्तानी हैं.




चलिए जानते हैं उनके बारे में : 

गुढ़ यानी घोंसला

गुढ़  का एक दृश्य
इस बंगाली फिल्म का निर्देशन सौरभ राय ने किया है, जो सत्यजीत राय फिल्म संस्थान के छात्र रहे हैं. 2015 की यह फिल्म 28 मिनट की है. यह एक बच्चे अजय की कहानी है, जिसके मार्फत बचपन की वो यादें ताजा होती हैं, जिनसे हर कोई गुजरता है. वे हमारी स्मृतियों के ऐसे धुंधले क्षण होते हैं, जिनसे नाता जोड़ने में बड़ी कठिनाई होती है, क्योंकि हम बड़े हो चुके हैं.  यह अजय के बचपन, उसकी मां, गांव और उसमें जारी क्रांति और उससे होनेवाले परिवर्तनों के प्रति उसके लगाव की कहानी है. उसे कान्स मेले के ‘सिने फाउंडेशन’ खंड में जगह मिली.


दि सिनेमा ट्रैवलर्स 

यह मूलत: 1:36 घंटे की डॉक्युमेंटरी है, जिसके निर्माता-निर्देशक शिरले अब्राहम और अमित मधेशिया हैं. इसे बनाने में उन्होंने तकरीबन 5 साल लगाए. जिन्होंने इस फिल्म को भारत की केव पिक्चर्स के मार्फत प्रस्तुत किया है. उसे कान्स के ‘क्लासिक’ खंड में ‘डॉक्युमेंटरी एबाउट सिनेमा’ कॉलम के तहत जगह मिली. यह भारत के गांव-कस्बों में मशहूर टूरिंग टॉकीज की कथा है, जो तकनीकी, सांख्यिक और जटिल परिवर्तनों के बावजूद लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है. इसमें एक प्रोजेक्टर मरम्मत करनेवाला सूत्रधार है और उसे कविता, दर्शन तथा यथार्थवाद के मार्फत पेश करता है.


जागो हुआ सवेरा / फैज़ अहमद फैज़ की पटकथा 

जागो हुआ सवेरा का पोस्टर, जिसमें फैज़ का नाम है. 
यह 1:34 घंटे की ऐसी
पाकिस्तानी फिल्म है, जिसका अस्तित्व समाप्तप्राय: था. लेकिन, उसे पुनर्निर्मित किया गया और कान्स ने पुनर्निर्माण वाले खंड में उसे जगह दी. यह जानना बड़ा दिलचस्प है कि हिंदी नामवाली यह फिल्म आखिर पाकिस्तान की क्यों है?
तो जानिए कि यह फिल्म जब बनी तो पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) पाकिस्तान का हिस्सा था. बांग्लादेश के मछुआरों की जिंदगी पर बनी इस फिल्म के निर्देशक ए.जे. कारदार हैं, जबकि  संगीतकार तिमिर बरन और कहानीकार माणिक बंदोपाध्याय हैं. उसकी पटकथा खुद कारदार ने विश्वविख्यात शायर फैज अहमद फैज के साथ मिलकर लिखी. उसके कलाकारों में : खान अताउर रहमान, तृप्ति मित्र, मैना लतीफ, काजी खालिक, मोयना, जुरीन रक्षी, रोक्सी, रिजवान, नसीमा जैसे पुराने जमाने के कलाकार थे.  1958 में बनी और और 25 मई 1959 रिलीज हुई इस फिल्म को कान्स फिल्म मेले में नौमान तासीर फाउंडेशन ने पेश किया. चूंकि उसके निगेटिव गुम हो गए थे, इसलिए छाया और आवाज का पुनरुद्धार लंदन में डीलक्स रिस्टोरेशन में किया गया है. इस फाउंडेशन को अंजुम तासीर ने स्थापित किया है.


ए  येलो  बर्ड का पोस्टर 

ए येलो बर्ड 

सिंगापुर में रहनेवाले भारतवंशी के. राजगोपाल की 1:52 घंटे की इस फिल्म का वर्ल्ड प्रीमियर कान्स फिल्म मेले में हुआ, पर उसका सबसे बड़ा आकर्षण भारतीय अभिनेत्री सीमा बिस्वास थीं. शिव नामक एक कैदी की पत्नी और बेटी को ढूंढने की यह करुणामयी कहानी ‘यथार्थवादी’ यानी रियलिस्टिक सिनेमा की तर्ज पर कही गई है. हालांकि, कान्स के सिने फाउंडेशन खंड में भी उसका चयन किया गया था.



भारत कान्स में 

बहरहाल, एक नजर इस पर भी डालें कि भारत का कान्स में क्या इतिहास रहा है : 

1.
चेतन आनंद की ‘नीचा नगर’
1946 पॉम डि ओ (गोल्डन पाम) जीता
2.
वी. शांता राम की ‘आमार भूपाली’
1952, उत्कृष्ट साउंड रिकॉर्डिग
3.
विमल राय की दो बीघा जमीन
1954 अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार
4.
सत्यजीत राय की ‘पथेर पांचाली’
1956, पॉम डि ओ
सत्यजीत राय की फिल्म पथेर पांचाली का डाक टिकट 
5.
मृणाल सेन की ‘खारिज’
1983, स्पेशल जूरी पुरस्कार
6.
मीरा नायर की ‘सलाम बॉम्बे’
1988, कैमेरा डि ओ
7.
मुरली नायर की ‘मरण सिंहासनम्’
1999, कैमरा डि ओ पॉम डि ओर
8.
1948 में बनी उदय शंकर (गुरुदत्त के बड़े भाई) की ‘कल्पना’ को मार्टिन स्कोरसिसी के वर्ल्ड सिनेमा फाउंडेशन ने 2010 में रिस्टोर किया और 2012 में उसे कान्स में दिखाया गया.
9.
2010 में विक्रमादित्य मोटवानी की फिल्म ‘उड़ान’ ऐसी पहली हिंदी फिल्म थी, जो ‘अनसर्टन रिगार्ड’ खंड में दिखाई गई.
10.
2011 में श्रीलंकाई निर्देशक विमुक्ति जयसुंदर की बंगाली फिल्म ‘छत्रक’ ने डायरेक्टर्स फॉर्टनाइट खंड में स्टैंडिंग ओवेशन पाया.
11.
2012 में असीम अहलुवालिया की ‘मिस लवली’ और अनुराग कश्यप की ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के दो खंड दिखाए गए. तीनों में नवाजुद्दीन सिद्दीकी प्रमुख भूमिका में थे.


रविवार, 5 अगस्त 2012

मर्लिन मुनरो

मर्लिन की गाथा

मर्लिन  मुनरो  की मृत्यु के ६० साल पूरे होने पर...



ह अकथ कथा है, ऐसी उदास परी की, जो जिंदगी भर उस चीज के लिए पहचानी गई, जो उसे असह्य थी..
वो मोह लेने का मशहूर हुनर 

‘दि सेवेन इयर च’ में वो मशहूर ‘स्कर्ट ब्लो’ वैसे मर्लिन का मिजाज नहीं बताता, जिसकी बातें सबसे ज्यादा होती हैं.
कोई उसकी समंदरी नीली आंखों पर, कोई सुनहरी जुल्फों या रक्ताभ लिपिस्टिक रंगे होठों पर फिदा हो सकता है; और कोई संगमरमरी जिस्म या शोख अदाओं पर दुनिया न्यौछावर कर सकता है..

लेकिन, कौन देखता है कि सफलता के अंधेरे अनंत होते हैं. 9 साल में बलात्कार की यातना, दुकान की नौकरी पर बीता बचपन, 16 की उम्र में खुदकुशी की कोशिश..

बचपन की बदसूरती के चलते खूबसूरती के आग्रह का दु:ख उसके कितने भीतर तक धंसा था, इसका अंदाजा उसी के कथन से लगाइए..

‘‘मैं जब बच्ची थी, तब मुझसे किसी ने कभी नहीं कहा कि मैं सुंदर हूं. तमाम बच्चियों से कहा जाना चाहिए कि वे सुंदर हैं. वे सुंदर न हों तब भी.’’

उदास परी 
असहाय और सहायता के उसके सपने, जिसमें उसने देखा कि वह चर्च में जमीन पर लोट रहे जनसैलाब के सामने निर्वसना खड़ी है.. लोगों के सिर बचाने के लिए पंजों के बल चल रही है.
मर्लिन 1926 में जन्मी. उनकी मां मानसिक रोगी थीं. लिहाजा, ज्यादातर बचपन अनाथाश्रम अथवा दूसरों के घर में बीता.
36 साल की छोटी-सी जिंदगी और बड़ी कामयाबी. 1946 में उसे फिल्मों में काम मिल गया. एक साल के भीतर ही 30 बड़ी फिल्म उसके खाते में थीं.

मॉडलिंग से पहले पॉर्न फिल्म से शुरू हुआ सिलसिला उसे हॉलीवुड में सर्वोच्च शिखर तक ले गया.   वह वहां अकेली और भयभीत थी. सफलता के शिखर पर भी उसका जीवन उतना ही अवास्तविक था जितना एक स्वप्न..

उसे मेकअप, कैमरों और स्टूडियो से घृणा थी, पर उसके बिना वह जी भी नहीं पाती थी..

उसका असली ख्याल यह था..

मर्लिन की एक जानलेवा अदा 
‘‘सेक्स सिम्बल बनना एक वस्तु बन जाना है. मैं वस्तु होने से नफरत करती हूं. लेकिन, मैं सेक्स सिम्बल के बजाय किसी और चीज का सिम्बल बनना चाहती हूं. मैं यकीन करती हूँ कि मैं एक अभिनेत्री बनना चाहती हूं. अपनी इंटीग्रिटी के साथ एक अभिनेत्री . मैं सचमुच एक अदाकारा बनना चाहती हूँ, एक कामोत्तेजक जीव नहीं.’’

1949 में मर्लिन की फिल्म ‘जेंटलमेंस प्रिफर ब्लॉन्ड्स’ में जो गीत है, ‘डायमंड्स आर अ गल्र्स बेस्ट फ्रेंड्स’; वह उसकी जिंदगी पर खरा उतरता है. वह अपने लिए जिंदगी भर डायमंड्स इकट्ठे करती रही, ताकि पुरुषों के खोखले समाज में उसे इज्जत मिल जाए, पर वो उसे मिला नहीं.
इसलिए उसने कभी जो कहा था..
‘‘हॉलीवुड में किसी भी लड़की की प्रतिभा इस बात से आंकी जाती है कि वह कैसी दिख रही हैं, इस पर नहीं कि वह असल में हैं क्या. हॉलीवुड ऐसी जगह है, जहाँ आपको चुंबन के लिए हजार डॉलर्स मिल जाएंगे. लेकिन, आत्मा के लिए 50 सेंट्स भी नहीं. मैं यह जानती हूं और मैं महंगा ऑफर ठुकरा देती हूँ और 50 सेंट्स मंजूर कर लेती हूँ.’’


...पर प्रेम कहां था?

बेसबॉल स्टार जो डिमैगियो और नाटककार ऑर्थर मिलर से दुखांत और नाकाम विवाह उस दु:ख-गाथा का अध्याय हैं. समूची जिंदगी में वह सच्चे प्रेम के लिए तरसती रही और अंतत: नाकामी ने उसे मृत्यु-मार्ग सुझाया.
जिमी डोहर्टी से मर्लिन ने 16 की उम्र में पहली शादी की, जो बहुत नहीं चली. सफलता के दौरान 1954 में उनकी मुलाकात डिमैगियो से हुई. महज 9 महीनों में ये रिश्ता खत्म हो गया. मिलर ने उसके साथ 5 साल बिताए, पर प्रेम कहां था?

बस यही डायरी में उसने लिखा.. 


‘‘मैं अपनी शादी की वजह से दु:खी नहीं थी. लेकिन, इससे मैं खुश भी नहीं  थी. मैं और मेरे पति मुश्किल से ही एक-दूसरे से बोल पाते थे, और यह  सब इस वजह से नहीं था कि हम एक-दूसरे से नाराज थे. हमारे पास कहने को कुछ नहीं था. मैं इस ऊबाऊपन से मर रही थी. मेरी पैसों में कतई दिलचस्पी नहीं थी, मैं तो बस वंडरफुल होना चाहती थी. करियर वंडरफुल था. लेकिन एक ठंडी रात में उसे आप लपेट नहीं सकते थे. मैं कैलेंडर पर जिंदा रहूँगी, समय में कभी नहीं.’’

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो...
संभवत: उसे मृत्यु से प्यार था..


उसने कहा था..

‘‘मैं बिना फेस लिफ्ट कराए बूढ़ी होना चाहती हूँ. मैं चाहती हूँ कि मुझमें अपने उस चेहरे के प्रति भरोसेमंद रहने का साहस हो, जिसे मैंने बनाया है. कभी-कभी मुझे लगता है उम्रदराज होना टाला जा सकता है और जवान रहते मर जाएं तो बेहतर. लेकिन, तब आप अपनी जिंदगी पूरी नहीं करते. तब आप कभी भी अपने को पूरी तरह से नहीं जान पाएँगे.’’

कहते हैं कि 5 अगस्त 1962 में मर्लिन ने अपनी ही दवा से अपनी जान ले ली.. 5 अगस्त 1962 को लॉस एंजिल्स में अपने घर के शयनकक्ष में मर्लिन मृत मिलीं. घर की देखभाल करने वाली महिला ने तड़के डॉक्टरों को फोन करके बुलाया. दोनों डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. शयन कक्ष बंद होने के कारण उन्हें दरवाजा तोड कर कमरे में घुसना पड़ा. मर्लिन अपने पलंग पर निर्वसना पड़ी पाई गईं. नींद की गोलियों की शीशी उनकी बगल में मिली. अधिकारियों ने बाद में कहा, ‘‘शायद मर्लिन ने आत्महत्या की.’’ लेकिन,अब तक खुदकुशी की थ्योरी पर लोगों को संदेह है..

शायद वह इस बार भी संभवत: प्रेम में नाकाम हो गई थी..


राष्ट्रपति कैनेडी के साथ मर्लिन 
कयास ही है, पर अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी और उसके बीच प्रेम का अंकुर फूट चुका था.. उसने अपना आखिरी फोन कैनेडी को ही किया था.. यह एक रहस्य रहा, जिसकी तस्दीक कभी नहीं हो पाई.. उसकी जिंदगी के अंत के रहस्यों के कई किस्से हैं, पर मर्लिन को न समझ पाना ही इसका अंत है.


मधुबाला जैसी..

पता नहीं क्यों मर्लिन और मधुबाला की तुलना को जी चाहता है...
 मधुबाला : जीवन में मधु 

धरती पर सौंदर्य की देवी ‘वीनस’ के दोनों अवतारों में महज नाम के हिज्जों के आरंभाक्षर का साम्य न था.

दोनों एक ही कालखंड की पैदाइश थीं. 

एक पश्चिम और दूसरी पूरब में. 

दोनों के फिल्मी नाम मूल नाम से बदले हुए. एक का नोरमा जीन्स मॉरटेंसन. दूसरी का मुमताज से मधुबाला.

दोनों ने कम उम्र में काम शुरू किया और अपार सफलता और ख्याति पाई.



दोनों की उम्र 36 साल.

दोनों जीवन भर प्रेम ढूंढती रहीं...


दोनों की मौत रहस्य का पिटारा है..

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

ये ना थी हमारी किस्मत कि विसाल ए यार होता..

ये न थी हमारी किस्मत...  

फिल्म विश्लेषण : सात खून माफ़


निर्देशक/ संगीतकार : विशाल भारद्वाज


निश्चय ही 'सात खून माफ़' एक ऐसी फिल्म है, जो आपको राहत देती है कि आप अकेले ही नहीं हैं, जो जिंदगी में चाही-अनचाही घुसपैठों को भुगत रहे हैं. आपकी जिन्दगी में दाखिल लोग, जिनके मुखौटे उतरने  पर दुनिया के तमाम असौंदर्य और अधैर्य का अहसास होता है, सारी चीजों को बंजर बना चुके होते हैं. तब आप एक फैसला लेते हैं, उन्हें जिन्दगी  और दुनिया से खारिज करने का. अधीरता में ही सही, निर्णय का यही चरम संभवतः जीवन की दुश्वारियों के बीच से पगडंडियाँ  बनाता है. रस्किन बांड की लघुकथा  'सुजेना'ज सेवेन हसबैंड' पर आधारित इस फिल्म में विशाल भारद्वाज ने  बड़ी सफाई से पुरुष प्रधान समाज की बखिया उधेड़ी है. पहली नज़र में सुजेना का चरित्र आपको 'निम्फो-मेनियक'  दिखाई पड़ सकता है, पर ऐसा है नहीं. असली प्यार की तलाश सुजेना को कहाँ नहीं ले जाती, पर हर बार पैकिंग के चमकदार रैपर उतरते ही बदसूरती अपनी सारी भयावहता और सड़ांध के साथ ऐन मुंह के सामने आ खड़ी होती है. वास्तव में ये सुजेना और उसके रिश्तों की पड़ताल नहीं है; ये समाज के बहुस्तरीय अस्तरों में छिपे सच की खुरचन है.

यह एक खूबसूरत एंग्लो-इंडियन युवती सुजेना ऐना मेरी जोहानिस उर्फ़ साहेब की कथा है. फिल्म में यह किरदार प्रियंका चोपड़ा ने निभाया है. बचपन में है माँ के साए से महरूम हो गई सुजेना फिर से वही स्नेह पाना चाहती है. सच्चा प्रेम पाने के लिये एक के बाद एक, सात शादियाँ करती है, पर प्यार की जगह धोखा खाती है. छह पतियों का  क़त्ल  करती है और सातवाँ खून खुद अपनी शिनाख्त मिटाकर करती है. फिल्म में फोरेंसिक डॉक्टर अरुण (विवान शाह)  अपनी पत्नी नंदनी (कंकणा सेन शर्मा)  सुजेना की कथा कहता है, जो उसे देखते और चाहते हुए बड़ा हुआ है. सुजेना का पहला पति एडविन रोड्रिक्स (नील नितिन मुकेश) सेना का एक लंगड़ा मेजर है, जो बेहद क्रूर है और बीवी को सिर्फ भोग्य और संपत्ति समझता है. सुजेना के स्वाभिमान को चोट पहुंचाकर तृप्ति पाने वाले मेजर को सुजेना आदमखोर शेर का निवाला बनवा देती है. फिर उसकी जिंदगी में जमशेद सिंह राठोड़ (जॉन अब्राहम) आता है, जिसे सिर्फ उसके पैसे से मतलब है. ड्रग्स, लड़कियां, संगीत चोरी से निपटते निपटते सुजेना उसे अंततः हेरोइन ओवरडोज से मुक्ति दिलवा देती है. तीसरा शौहर वसीउल्लाह खान (इरफ़ान)  अच्छा शायर है, पर बिस्तर पर बेरहम जल्लाद. उसे जीते-जी कब्र नसीब होती है. चौथा शौहर रूसी जासूस निकोलाई वेरोंसकी (अलेक्जेंद्र दायचेंको) दोहरी जिंदगी जी रहा है. सुजेना इस छल को नहीं बख्शती. पांचवां पति कीमतीलाल (अन्नू कपूर ) उसके जिस्म का दीवाना है और कुछ जरा जल्दी ही वियाग्रा का ओवरडोज खाकर मरता है. छठा हसबैंड डॉ. मधुसूदन तरफदार (नसीरूदीन शाह ) उसकी संपत्ति हड़पने का भेद खुलने पर मारा जाता है. इन पूरे चक्करों में सुजेना ना केवल यह समझ गई है कि खूबसूरत जिस्म का इस्तेमाल कैसे किया जाये, पर यह भूल भी गई है कि सिर्फ जिस्म ही मंजिल नहीं है. इसलिए वह जब नौजवान हो चुके अरुण को पाना चाहती है, तो वह इंकार कर देता है. उसका दिल फिर एकबार टूटता है, पर उसे परिणति पर पहुँचने का सबक भी देता है. पूरी फिल्म का दूसरा भाग ही ज्यादा तेज घटनाक्रमों से भरा है, जहाँ फ्लैशबैक और वर्तमान एक जगह आकर मिलते भी हैं. खुद रस्किन बांड का एक किरदार में होना अच्छा महसूस करता है. यह फिल्म आपको सुकून का अहसास नहीं करने देती, क्योंकि सुजेना को भी चैन नहीं है. लेकिन, आप खुद को उसके करीब पाते हैं. वह आपकी रूह में सुरसुरी पैदा करती है. 

प्रियंका ने सुजेना के चरित्र को जीने में जी-जान लगा दी है और केंद्रीय पात्र का आभामंडल इतना असरदार है कि अरुण के अलावा बाकी सब किरदार गौण लगते हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि उनका अभिनय कमतर है. हर कोई अपनी कहानी चलने तक बेहद प्रभावी हैं. यहाँ तक कि नील नितिन मुकेश और जॉन भी. नसीर और इरफ़ान अपनी टाईप्ड छवि के मारे हैं, पर ठीक हैं. अन्नू कपूर किरदार के अनुकूल हैं, और उषा उत्थुप तो पहली बार पता चला कि अदाकारा भी हैं. एक डार्क फिल्म में सिनेमेटोग्राफी कितनी प्रभावोत्पादक होनी चाहिए, यह रंजन पंडित ने दिखाया है.  

संगीत का जिक्र किये बगैर फिल्म पूरी नहीं हो सकती. फिल्म का काल और कैनवास काफी बड़ा है, इसलिए संगीतकार के रूप में विशाल ने कई प्रयोग किये है, जो अच्छे हैं. रूसी लोकगीत का प्रयोग भी. गुलज़ार हैं ही. उषा उत्थुप और रेखा भारद्वाज आवाज के जरिये फिल्म में कई रंग भरती हैं. पता नहीं क्यों, सुरेश वाडेकर का 'तेरे लिये' एल्बम में होने के बावजूद फिल्म से गायब है. बैकग्राउंड स्कोर बढ़िया है और कथा को सहारा देने में कामयाब है. 

विशाल की किस्सागोई पिछली फिल्मों में अच्छी रही है, पर यहाँ वे कुछ कथा कहने के तरीके को लेकर असमंजस में दिखाई देते हैं. वैसे भी, इतनी सपाट; पर परतदार कथा को कहना खेल नहीं. शायद यही कारण होगा कि पटकथा लिखने के लिये उन्हें विदेशी पटकथाकार की मदद लेनी पड़ी. यह भी कहना होगा कि निर्देशक, संपादन के स्तर पर भी चूक गया. फिल्म संपादक ए. श्रीकर प्रसाद ने अपना काम किया है, पर उन्हें निर्देशक की ओर से वह मदद नहीं मिली, जो फिल्म में कसाव ले आती. एक बात और... विशाल अपने गुरु गुलज़ार का फ्लैशबैक का जुनून समझ तो गए, पर इस हुनर में उतनी सफाई नहीं ला पाए हैं. नतीजा यह कि फिल्म की लय और गत बिगड़ गई. बहस इस पर भी हो सकती है कि क्या निर्देशक के पास खुद कथा कहने का माद्दा नहीं था, जो सूत्रधार और कथा-कथन का सहारा लेना पड़ा? निर्देशक की इससे बड़ी कमजोरी और क्या होगी? 

इसके बावजूद प्रयोगधर्मी विशाल को सराहे बगैर नहीं रहा जा सकता. 

सुनील सोनी 

दिवाली की शुभकामनाएं

कविता : सुनील  स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी