स्वाद की वर्षा
अक्सर मां लोकोक्तियां कहती हैं. कुछ जीवन से जुड़ीं, कुछ प्रकृति से. उनमें से बुंदेलखंडी में यह भी है : ‘‘सावन मूला, भादों मही/ क्वांर करेला, कातक दही/ मरहौं न तो परहौं सही.’’ ऋतु के बरसाती चौमासे पर ये लोक समझ का वितान है. विदर्भ में ठेठ वरहाड़ी भोजन से मुंह जला बैठने के बाद जो जलीकटी दिल से और पेट से निकलती है, वह आग बरसाते सूरज और उतनी ही शिद्दत से तपती धरती के पाकरहस्य का तिलिस्म तोड़ने का जज़्बा शायद ही बचने देती है.
बारहोंमास किसी भी सड़क, किसी भी कोने-किनारे, बाज़ार से गली-कूचों तक भोग लगा आते हों, वो सावन का इंतज़ार नहीं करते कि कोई बूंद मेघ बरसायें और माटी की सौंधी खुशबू से मन भरे; ताकि प्रतिक्रिया में उठती बेसन की गंध रसोई में झांकने पर विवश कर दे.
घर के दीवानखाने की फ्रेंच विंडो के कांच से झरती धार के बीच दूर तलक फूल-पौधों को झूमते हुए भीगते देख पाना सपना हो; लेकिन, स्याह-सी दोपहर के अहसास में रिमझिम नाद का सुकून उस व्यंजन की स्मृति को पुनर्जीवित कर ही देता है, जिसके आस्वाद के व्यग्रता की तीव्रता कुलमहिषी के इत्मीनान की स्थिरता से अधिक है.
परिणीति निश्चय उस अभिव्यक्ति से मेल खाती है.. ज्यों.. टमाटर-धनिया-मिर्च की चटनी में डुबोकर मनोदर तृप्त करने वाले पकौड़े देर तक जमीं पर उतरने नहीं देते. ..जब तक चाय की चुस्की स्वाद संपूर्ण न कर दे.
बात बेसन के पकौड़ों की होती, तो बहुत-सी बातें याद आतीं.. मसलन, दादी और मां से होते हुए जीवनसाथी तक की बहुविधस्वाद श्रृंखला. ‘आम’ भजियों से ‘कुलीन’ पकौड़े होते जाने का शब्द-संबंध वर्षा ऋतु आरंभ से ही है, वरना फिर कहां...
मेघवर्षा सौंदर्य उपासकों में रससंचार के उपक्रम में ही नहीं रह जाती; मन की अगन, तन की अगन, पेट की अगन भी बुझाती है. विरह महज प्रेम में होता है, तो यकीन जानिये कोई भी भोजनप्रेमी गलत साबित कर देगा.
वर्षा गोलगप्पों से लेकर मनाही की पूरी सूची बनवाती है, जो बाजार से घर तक स्वानुशासन की रेखा से इधर-उधर होकर चलती रहती है. शाकाहारियों और मांसाहारियों की दशा में अंतर नहीं बचता. शाकाहारी अत्याल्पाहारी हो जाते हैं; मांसाहारी प्रकृतिवश शाकाहार की ओर मुड़ जाते हैं.
मंद जठराग्नि का समय संभवत: उपवास का सर्वश्रेष्ठ समय हो आता है. सावन में नौजवान लड़कियां शिव को साधने में सोमवार का व्रत न करें और लड़के कांवड़ से जल लाकर देवों को न चढ़ाएं तो कैसे बड़े-बूढ़े मनवा पाते कि वर्षा में सुपाचन अमृतवर्षा ही है.
प्रकृति के आनंदोत्सव की ऋतु सब प्राणधारियों के फलने-फूलने का वरदान है. हर हर हरियाली हरे पत्ताें की शाक को तक वर्ज्य बना देती है, ताकि सूक्ष्म जीव संसार बड़ा हो और मनुष्य का आत्मानुशासन भी.
अजब नहीं कि विज्ञान के बाजार से मेल ने थोड़े समय में इतना कुछ बदल दिया कि ‘चातुर्मास का बंधन’ समाजबंध की जगह धार्मिक हो चला. परिवहन खाद्य परिवर्तन भी ले आया. शेष कसर पीढ़ीगत स्मृतिलोप पूरी कर दी. यह तक भुला दिया कि वर्षा से फैली; चहुंओर हरियाली गाय के दूध तक का स्वाद/गुणधर्म बदल देती है; मछलियों समेत कई जीवों का प्रजननकाल यही है और संक्रमण का भीषण समय भी. उष्णकटिबंधीय प्रदेश के व्यापक ऋतुचक्र में ‘चातुर्मास’ के मूल मिताहार, पथ्य या आहार नियमन ही हैं.
आपको पालने हों, तो यह नियमन बड़े-बुजुर्ग बताएंगे या आहारविद्. लेकिन, सावन के बाद किसी को पथ्यप्रतिबंध तोड़ते देखें तो समझें कि स्मृति में वह वहीं से संचित है, रूप बदलकर भले ही.