सोमवार, 13 जून 2016

क्या स्विट्जरलैंड सभ्यता के नए पायदान पर नहीं जाना चाहता?

क्या स्विट्जरलैंड सभ्यता के नए पायदान पर नहीं जाना चाहता?



विविध एवं बहुआयामी संकट से जूझ रहे संपूर्ण मानवीय समाज के समक्ष फिलहाल असमंजस यह है कि सभ्यता के नवचरण में प्रवेश के लिए वह रास्ता कौन-सा चुने? प्रौद्योगिक-धार्मिक अतिरंजना के क्षण में स्विट्जरलैंड ने बहुत छोटा-सा प्रयोग किया, जिसके खिलाफ सत्ता से आवाम तक बड़ी आवाज बुलंद हुई. मूल मकसद के चलते इस प्रयोग को विफल माना भी जाना चाहिए,पर उसने जो राय मांगी थी, वह बहुत महत्वपूर्ण थी.  वह थी कि क्या सभी नागरिकों को हर महीने तय रकम  दी जाए, चाहे वे काम करें या नहीं. बच्चों को भी उनका तयशुदा हिस्सा मिले. रायशुमारी में इसे बहुत थोड़ा समर्थन मिला. लेकिन, क्या इससे उस मकसद को व्यापक बनाकर संकट का समाधान तलाशा जा सकता है? 

अहम था उस जनमत संग्रह का हिस्सा बनना, जो साबित करता है कि ऐसा कोई भी सवाल स्विट्जलैंड जैसे देश में कितने मायने रखता है. अगर भारत में यह रायशुमारी कोई करता, तो उसे ‘पागल’ करार देने में चंद मिनट भी न लगते. लिहाजा, सवाल यह कि स्विट्ज़रलैंड ने ऐसे किसी विकल्प को क्यों नकारा? क्या जनमानस में ऐसे सवाल पहले से ही कौंध रहे थे? लेकिन, सिर्फ स्विट्ज़रलैंड नहीं, भारत में दो दशक पहले से ऐसा विचार विमर्श जारी है. फ़र्क महज उद्देश्यों और सिद्धांतों का  है. आइए उस विमर्श के बारे में बात करें...




तकरीबन दो दशक बीत चुके हैं, जब नागपुर में हम इस बात पर सिर खपा रहे थे कि पैसे से समग्रता में छुटकारा पाने के लिए क्या किया जाए? दुनिया में पैसा लगभग भगवान की जगह रखता है और हर कोई उसके पीछे है. ‘आजच्या सुधारक’ के संपादकीय मंडल के सदस्य और भारत में नवोन्मेषी सोच रखनेवाले चिंतकों में से एक दिवाकर मोहनी उस वक्त नया सुझाव रख रहे थे. यह सन 1996 से 2004 के बीच का वक्त था. उस समय तक मोहनी जी महान समाज सुधारक गोपाल गणेश आगरकर की ‘सुधारक’ पत्रिका को नागपुर से पुनर्जीवित कर चुके थे और दो दशकों से  मौजूदा युग में मानवीय जीवन का हिस्सा बन चुके कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर काम कर रहे थे. ये मुद्दे थे ईश्वर और धर्म; पैसे से मुक्ति एवं नई अर्थव्यवस्था की अवधारणा, स्त्री स्वतंत्रता और शिक्षा; विवाह संस्था एवं परिवार.

इन सब मुद्दों में ‘पैसे से मुक्ति’ (महज मुद्रा से निजात नहीं) एक ऐसी अवधारणा थी, जो अत्यंत विचारोत्तेजक थी.  पैसा एक ऐसी चीज है, जिससे हम अपनी खाल की तरह ही मुक्ति नहीं पा सकते. दूसरे शब्दों में यह भी कह सकते हैं कि पैसा हमारी आत्मा में गहराई तक धंसा है.  उसको नष्ट करने का सिद्धांत ही कई लोगों को सिहरा देता है और गुस्सा दिलाता है या वे उसे अविश्वसनीय गल्प मानकर खारिज कर देते हैं.

लिहाजा, जब यह संवाद होता कि विश्व को पैसे से मुक्ति दिलानी ही होगी, तो मोहनी जी को एक नया विचार सूझा. विचार यह था कि हर व्यक्ति किसी के बैंक खातों में हर माह एक निश्चित रकम डाल दी जाए, चाहे वह काम करता हो अथवा नहीं. बच्चों के लिए भी एक निश्चित रकम दी जाए. हर परिवार में चाहे जितने भी सदस्य हों, यह रकम सरकार उनके खाते में हर माह जमा करेगी और उसे महंगाई के सूचकांक के हिसाब से बढ़ाती घटाती जाएगी. (महंगाई वाला सिलसिला व्यवस्था के पूर्णता प्राप्त कर लेने तक ही चलेगा, क्योंकि उसके बाद धन की जरूरत ही खत्म हो जाएगी.)

इस ख्याल की चिंगारी को हवा उसी समय तेजी से प्रचलित हो रहे क्रेडिट और डेबिट कार्डो की प्रणाली ने दी थी कि कैसे ‘आभासी धन’ यानी वर्चुअल मनी पैसे को हकीकत में नष्ट करने का आगाज कर देगी और चूंकि मुद्रा प्रथम चरण में खत्म होगी, शनै:-शनै: वह (पैसा) खुद खत्म होता चला जाएगा. यह कोई पुराने युग की व्यवस्था नहीं थी, जिसमें करंसी नोटों और सिक्कों से पहले अनाज अथवा वस्तुओं के लेनदेन करके व्यापार कर लिया जाता था. यह एक ऐसी व्यवस्था की अभिकल्पना थी, जिसमें लेनदेन की जरूरत रह ही नहीं जाती और हर अनिवार्य सामग्री सबको नि:शुल्क ही प्राप्त होती.

निश्चित ही इस कल्पना ने संदेह के घने बादल उठाए और सवालों की मूसलाधार बारिश ने भी उन्हें कम नहीं किया.  यह यह बेहद रोमानी कल्पना थी, जिससे पहली नजर में अराजकता फैलने का खतरा पैदा होने का अनुमान था. यह इसलिए कि माना जाता है कि सभ्यता के इस चरण में दुनिया के अमूमन सभी हिस्सों में अपवादों को छोड़कर धन को ही श्रम का मूल माना जाता है और शासन तथा शक्ति का केंद्रबिंदु भी. लेकिन, दिवाकर मोहनी बादलों को छाँटने के प्रयास में हमारे नकारात्मक सवालों के जवाब खोज रहे थे.  उनकी समझ निश्चय ही कहती थी कि श्रम के बदले धन दिया/लिया जाना गुलामी का ही एक रूप है, जो अंतत: शोषण तक ले जाता है और सजर्नात्मक वृत्ति को समाप्त करता है. पैसा अंधविश्वास की तरह नकली चीज है. विभिन्न उदाहरणों से वे यह मनवा पाने में कामयाब रहे भी.

इसके बावजूद यह सवाल भी उठा कि धन के अभाव में व्यवस्थाएं कैसे चलेंगी? जब कोई मजदूर नहीं होगा, तो उत्पादन कैसे होगा? जब उत्पादन नहीं होगा तो सब कुछ ठप हो जाएगा? जीवन स्तर में बढ़ोत्तरी के मापदंड कैसे होंगे? सबसे बड़ी कठिनाई कि अनाज कैसे उगेगा?

यहां मोहनी जी का तर्क था, ‘‘सामुदायिक शासनकर्ता (अथवा समाज अधिष्ठाता) ही अगर इसे लागू करेंगे तो वे नई चुनौतियों के हल भी ढूंढेंगे. यानी सामुदायिक समानता का अधिकार सर्वप्रथम होगा, जिसमें व्यक्तिगत के बजाय सामुदायिक श्रम की भागीदारी महज न्यूनतम उत्पादन एवं अधिकतम सृजन तक सीमित होगी. नई व्यवस्था में सबको सबकुछ प्राप्त करने के लिए उत्पादन में योगदान देना होगा, जो अनिवार्यता से स्वैच्छिकता की ओर बढ़ता चला जाएगा.  यानी एक नई प्रणाली की स्थापना हो जाएगी. यह उत्तरोत्तर प्रगति करेगी. मतलब यह कि जहां समुदाय ही अनाज उगाएगा, वहीं जरूरी उत्पादन भी करेगा और आविष्कार भी. धन के लोप के चलते सभी अड़ंगे मिट जाएंगे. इससे संसाधनों का दुरुपयोग भी खत्म होगा.’’

एक सवाल और उठा कि क्या श्रम के महत्वहीन होने से लोग आलसी नहीं हो जाएंगे? अथवा नए आविष्कार एवं प्रयोग रुक नहीं जाएंगे? हमारे एक मित्र ने महाराष्ट्र के यवतमाल जिले के कोलाम आदिवासियों का उदाहरण दिया, जिनकी बेतरह गरीबी पर तरस खाकर तत्कालीन सरकार ने उन्हें भरण-पोषण खर्च देना शुरू कर दिया था. इसके चलते वे आलसी हो गए थे और उन्होंने रोजगार के प्रयास तक छोड़ दिए थे, क्योंकि उस अल्प भरण-पोषण खर्च में वे पूरा माह काम चला लेते थे.

लेकिन, विचार प्रक्रिया से इसका जवाब भी मिल गया. खासकर, मोहनी जी ने इसकी दिशा दी. निश्चय ही पहले कुछ समय तक श्रम के अभाव में लोग आलसी हो जाएंगे, पर वे उसके बाद अपने शौक पूरे करने में जुट जाएंगे. उनमें से जो लोग घूमने के शौकीन होंगे, वे घूमेंगे; जो वैज्ञानिक होंगे, वे प्रयोग करेंगे, जो संगीत में रुचि लेते होंगे, वे सीखेंगे-सिखाएंगे या संगीत समारोह करेंगे-नई गीत और धुन रचेंगे. पेंटिंग  और शिल्प रचे जाएंगे, फिल्में और नाटक होंगे.  सबसे बड़ी बात सब उन्हें देखेंगे, सुनेंगे. सबकी बारी उत्पादन, रचना एवं आविष्कार की रचनात्मक प्रक्रिया में शामिल होने की होगी, जिसे समाज तय करेगा. यह नए समाज के उत्थान की प्रक्रिया में होता जाएगा, जिसमें कुछ दशक या सदियां भी लगेंगी.

जहां तक अराजकता की बात थी, वह प्रारंभिक पायदान तक ही सीमित रह जाएगी, क्योंकि उसे काबू में करने के लिए समाज एवं शासनकर्ता उपयुक्त कदम यानी चेतना का स्तर बढ़ाने जैसे तरीके शिक्षा जैसे औजार के मार्फत उठाएंगे. चूंकि नए समाज की रचना के पहरेदार और हरकारे वही होंगे, इसलिए वे नए नियम रचेंगे, जिसे समाज की स्वीकृति के बाद ही लागू किया जाएगा. इसे ग्रामसभा की तरह देखा और लागू किया जा सकता है.

इसमें सबसे बड़ा सवाल यह था कि ऐसे बेहतर समाज के लिए क्या हर मनुष्य तैयार होगा और वह अपनी प्रवृत्ति को काबू में रख सकेगा? वह भी बिना किसी अनुशासन के? क्योंकि इस समाज में रेजिमेंटेशन जैसी अनुशासन कुप्रवृत्तियों के लिए जगह ही नहीं बन सकती. एक और मानवीय कुप्रवृत्ति ‘लालच’ से कैसे पार पा सकेंगे? क्या इसके लिए जेनेटिक कोड बदलने की जरूरत होगी, या इंसान खुद बदल जाएगा?

बहुत सालों तक कई अनुत्तरित प्रश्नों को वहीं छोड़ दिया गया कि जब यह प्रयोग होगा, तब देखा जाएगा.

तकरीबन 20 साल बाद स्विट्जरलैंड में ‘बेसिक इनकम समूह’ ने वह प्रयोग किया, जिसका नागपुर के इस विमर्श को इंतज़ार था. वहां इस बात पर रायशुमारी हुई कि क्या सभी को एक निश्चित रकम हर माह मिल जाए, जो मौजूदा वक्त और महंगाई के हिसाब से बड़ों के लिए 2500 स्विस फ्रैंक और नाबालिगों एवं बच्चों के लिए 625 स्विस फ्रैंक हो. हालांकि, वे पैसों से मुक्त नई दुनिया बनाने की ओर कदम नहीं उठा रहे थे. वे बस बेरोजगारी को सबक सिखाने के पक्षधर थे. लेकिन, अंतत: यह योजना थी बेहतरीन, जिसे लोगों ने नकार दिया.

सवाल यह उठता है कि क्या लोगों ने इसे इसलिए नकार दिया कि इस समूह ने इसे बेरोजगारी का हल बताया था? हालांकि, भारत के नागपुर शहर में बैठे दिवाकर मोहनी और सभ्यता के नए स्तर की रचना के इरादे को वैचारिक रूप देने की समझ कायम करने अथवा गुननेवाले लोग मानते हैं कि यह नई दुनिया की ओर एक कदम है और स्विट्जरलैंड ने यह पहल की है. हालांकि वह हर प्रयोग के पहले पड़ाव से फिसल गया? लेकिन, इससे आगे ऐसे प्रयोग होते रहेंगे.

-सुनील सोनी 
(लेखक खुद उस विचार-विमर्श का हिस्सा रहा है)

शनिवार, 4 जून 2016

प्रेम

प्रेम तुम चिरैया हो
या खेत
नहीं; तुम पानी हो
जो आसमान से बरसता है
या बहता है किसी नदी से
और बरसता है झरने से
हरेक लम्हा तुम हो
हर कण भी
इसलिए धूल में लोटा हूँ मैं
क्योंकि मैं न रहूँ
यकीन तुम ही हो
और
संदेह तक
कहना
या
न कहना
क्षितिज से मिलती धरती
तुम्हारा होना है
तुम हो वहाँ
जहाँ नहीं हो
मैं भी तुम
तुम मैं हूँ
हर तरफ

-सुनील सोनी 03/06/2016

मंगलवार, 24 मई 2016

दि सिनेमा ट्रैवलर्स के माथे पर ताज

‘दि सिनेमा ट्रैवलर्स’ के माथे पर ताज

शर्ली अब्राहम
अंतत: 2016 का कान्स फिल्म मेला भारत के लिहाज से खाली नहीं गया. भारत, खासकर महाराष्ट्र में टूरिंग टॉकीज यानी तंबू में प्रोजेक्टर के जरिए दिखाई जानेवाली फिल्मों को लेकर बनी शर्ली अब्राहम और अमित मधेशिया की डॉक्युमेंटरी ‘दि सिनेमा ट्रैवलर्स’ को ‘ल वील डि’ओ’ अवार्ड से नवाजा गया.

79 वर्षीय ब्रिटिश निर्देशक केन लोच की फिल्म ‘आई, डैनियल ब्लैक’ ने सर्वश्रेष्ठ फिल्म का ‘पाम डि’ओ’ जीता. वे 2006 में ‘द विंड दैट शेक्स द बार्ली’ के लिए यह प्रतिष्ठित पुरस्कार पा चुके हैं. ‘आई, डैनियल ब्लैक’  न्यूकैसल के प्रौढ़ विधुर को हार्टअटैक आने के बाद ब्रिटेन की जनकल्याण से नाउम्मीदी और समस्याओं की कहानी है. लोच का नया प्रोजेक्ट मशहूर फिल्मी हस्तियों आल्फ जोबर्ग, फ्रांसिस फोर्ड कपोला, बिले अगस्त, दि दार्देन ब्रदर्स, एमिर कुस्तुरिका, शोहेई इमामुरा और माइकल हनेके के साथ होगा.
अमित मधेशिया
फिलिपीन्स की जैकलीन जोस निर्देशक ‘ब्रिलैंट मैंडोजा की ‘मा रोसा’ में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री ठहरीं.  ब्रिटेन की एंड्रिया अर्नाल्ड की ‘अमेरिकन हनी’ को जूरी अवार्ड मिला, जबकि रोमानियाई डायरेक्टर क्रिश्चियन मुनग्यू ने फ्रांसीसी डायरेक्टर ऑलिवर असायस के साथ बेस्ट डायरेक्शन का अवार्ड पाया. ईरानी निर्देशक असगर फरहादी की फिल्म ‘फरोशांद’ (दि सेल्समैन’) ने सर्वश्रेष्ठ स्क्रीनप्ले और सर्वश्रेष्ठ अभिनेता (शाहाब हुसैनी) के अवार्ड जीते. शॉर्ट फिल्म का पॉम डि’ओ जुआनजो गिमेनेज को मिला, जबकि ज्यूरी की ओर से विशेष प्रशस्ति जाओ पॉला मिरांडा मारिया की अ मोक कुई डांसकू कॉम ओ डियाबो (दि गर्ल हू डांस विद दि डेविल) को मिला. कैमेरा डि’ओ ‘डिवाइंस’ के लिए हॉडा बेनयामिना को मिला. 

रविवार, 22 मई 2016

ये भारत भी कान्स में था मौजूद

कान्स फिल्म मेला 2016 

ये भारत भी कान्स में था मौजूद...


-सुनील सोनी

यही है वो ऐश्वर्य की बहुचर्चित लिपस्टिक 
मौजूदा वक्त में दुनिया में जितनी भी लुभावनी चीजें हैं, उनमें से सबसे रसदार है फ्रांस के कान्स में चल रहा 69वां विश्व कान्स फिल्म मेला 2016.
यह ऐसी जगह है, जहां सिनेमा जगत से जुड़ी दुनियाभर की तमाम हस्तियां हाजिरी लगाती हैं. यूं, यह फिल्म मेला यूरोप और अमेरिका को ही तरजीह देता है, पर अफ्रीका और एशिया के लिए भी वहां थोड़ी बहुत जगह होती है. खासतौर पर उन सिनेकृतियों के लिए, जिन्हें आम तौर पर उनके अपने देशों में भी लोक तक पहुंचाने के लिए भीषण मशक्कत और दुश्वारियों से गुजरना पड़ता है.

सोनम कपूर 
कान्स फिल्म मेले को भारतीय मूलत: कला की इस विधा के कलात्मक आकलन के लिए नहीं जानते. वे उसे जानते हैं ऐश्वर्या राय से लेकर विद्या बालन, ऋचा चड्ढा, सोनम कपूर और मलिका सहरावत तक के रेड कॉरपेट पर चलने को लेकर. इस बार भी भारतीय सौंदर्यमूर्तियां मेले में मौजूद रहीं. अनुराग कश्यप जैसे बहुचर्चित अभिनेता भी ‘रमन राघव 2.0’ जैसी फिल्मों को लेकर वहां पहुंचे. लेकिन, इस बार उन सबका कान्स फिल्म मेले की आधिकारिक प्रविष्टियों से लेना-देना नहीं था. वे किसी न किसी तौर पर आमंत्रित या अतिथि थे, बस.

मंटो फ्रांस में..
अचरज यह है कि नंदिता दास सआदत हसन ‘मंटो’ को लेकर कान्स हो आती हैं, पर बहुत लोगों को पता नहीं चलता.

ये हैं प्रातिनिधिक ‘भारतीय’ फिल्में


केवल नंदिता नहीं हैं, जिनकी चर्चा भारतीय सिने संसार में उस तरह नहीं हो रही है, जैसी होनी चाहिए, क्योंकि दरअसल कान्स में भारतीय उपमहाद्वीप की प्रातिनिधिक फिल्में तो यही हैं.  इन फिल्मों में ‘गुढ़’, ‘दि सिनेमा ट्रैवलर्स’, ‘अ येलो बर्ड’ और ‘जागो हुआ सवेरा’ हैं. इनमें से पहली दो तो भारतीय हैं, पर शेष दो सिंगापुरी और पाकिस्तानी हैं.




चलिए जानते हैं उनके बारे में : 

गुढ़ यानी घोंसला

गुढ़  का एक दृश्य
इस बंगाली फिल्म का निर्देशन सौरभ राय ने किया है, जो सत्यजीत राय फिल्म संस्थान के छात्र रहे हैं. 2015 की यह फिल्म 28 मिनट की है. यह एक बच्चे अजय की कहानी है, जिसके मार्फत बचपन की वो यादें ताजा होती हैं, जिनसे हर कोई गुजरता है. वे हमारी स्मृतियों के ऐसे धुंधले क्षण होते हैं, जिनसे नाता जोड़ने में बड़ी कठिनाई होती है, क्योंकि हम बड़े हो चुके हैं.  यह अजय के बचपन, उसकी मां, गांव और उसमें जारी क्रांति और उससे होनेवाले परिवर्तनों के प्रति उसके लगाव की कहानी है. उसे कान्स मेले के ‘सिने फाउंडेशन’ खंड में जगह मिली.


दि सिनेमा ट्रैवलर्स 

यह मूलत: 1:36 घंटे की डॉक्युमेंटरी है, जिसके निर्माता-निर्देशक शिरले अब्राहम और अमित मधेशिया हैं. इसे बनाने में उन्होंने तकरीबन 5 साल लगाए. जिन्होंने इस फिल्म को भारत की केव पिक्चर्स के मार्फत प्रस्तुत किया है. उसे कान्स के ‘क्लासिक’ खंड में ‘डॉक्युमेंटरी एबाउट सिनेमा’ कॉलम के तहत जगह मिली. यह भारत के गांव-कस्बों में मशहूर टूरिंग टॉकीज की कथा है, जो तकनीकी, सांख्यिक और जटिल परिवर्तनों के बावजूद लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है. इसमें एक प्रोजेक्टर मरम्मत करनेवाला सूत्रधार है और उसे कविता, दर्शन तथा यथार्थवाद के मार्फत पेश करता है.


जागो हुआ सवेरा / फैज़ अहमद फैज़ की पटकथा 

जागो हुआ सवेरा का पोस्टर, जिसमें फैज़ का नाम है. 
यह 1:34 घंटे की ऐसी
पाकिस्तानी फिल्म है, जिसका अस्तित्व समाप्तप्राय: था. लेकिन, उसे पुनर्निर्मित किया गया और कान्स ने पुनर्निर्माण वाले खंड में उसे जगह दी. यह जानना बड़ा दिलचस्प है कि हिंदी नामवाली यह फिल्म आखिर पाकिस्तान की क्यों है?
तो जानिए कि यह फिल्म जब बनी तो पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) पाकिस्तान का हिस्सा था. बांग्लादेश के मछुआरों की जिंदगी पर बनी इस फिल्म के निर्देशक ए.जे. कारदार हैं, जबकि  संगीतकार तिमिर बरन और कहानीकार माणिक बंदोपाध्याय हैं. उसकी पटकथा खुद कारदार ने विश्वविख्यात शायर फैज अहमद फैज के साथ मिलकर लिखी. उसके कलाकारों में : खान अताउर रहमान, तृप्ति मित्र, मैना लतीफ, काजी खालिक, मोयना, जुरीन रक्षी, रोक्सी, रिजवान, नसीमा जैसे पुराने जमाने के कलाकार थे.  1958 में बनी और और 25 मई 1959 रिलीज हुई इस फिल्म को कान्स फिल्म मेले में नौमान तासीर फाउंडेशन ने पेश किया. चूंकि उसके निगेटिव गुम हो गए थे, इसलिए छाया और आवाज का पुनरुद्धार लंदन में डीलक्स रिस्टोरेशन में किया गया है. इस फाउंडेशन को अंजुम तासीर ने स्थापित किया है.


ए  येलो  बर्ड का पोस्टर 

ए येलो बर्ड 

सिंगापुर में रहनेवाले भारतवंशी के. राजगोपाल की 1:52 घंटे की इस फिल्म का वर्ल्ड प्रीमियर कान्स फिल्म मेले में हुआ, पर उसका सबसे बड़ा आकर्षण भारतीय अभिनेत्री सीमा बिस्वास थीं. शिव नामक एक कैदी की पत्नी और बेटी को ढूंढने की यह करुणामयी कहानी ‘यथार्थवादी’ यानी रियलिस्टिक सिनेमा की तर्ज पर कही गई है. हालांकि, कान्स के सिने फाउंडेशन खंड में भी उसका चयन किया गया था.



भारत कान्स में 

बहरहाल, एक नजर इस पर भी डालें कि भारत का कान्स में क्या इतिहास रहा है : 

1.
चेतन आनंद की ‘नीचा नगर’
1946 पॉम डि ओ (गोल्डन पाम) जीता
2.
वी. शांता राम की ‘आमार भूपाली’
1952, उत्कृष्ट साउंड रिकॉर्डिग
3.
विमल राय की दो बीघा जमीन
1954 अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार
4.
सत्यजीत राय की ‘पथेर पांचाली’
1956, पॉम डि ओ
सत्यजीत राय की फिल्म पथेर पांचाली का डाक टिकट 
5.
मृणाल सेन की ‘खारिज’
1983, स्पेशल जूरी पुरस्कार
6.
मीरा नायर की ‘सलाम बॉम्बे’
1988, कैमेरा डि ओ
7.
मुरली नायर की ‘मरण सिंहासनम्’
1999, कैमरा डि ओ पॉम डि ओर
8.
1948 में बनी उदय शंकर (गुरुदत्त के बड़े भाई) की ‘कल्पना’ को मार्टिन स्कोरसिसी के वर्ल्ड सिनेमा फाउंडेशन ने 2010 में रिस्टोर किया और 2012 में उसे कान्स में दिखाया गया.
9.
2010 में विक्रमादित्य मोटवानी की फिल्म ‘उड़ान’ ऐसी पहली हिंदी फिल्म थी, जो ‘अनसर्टन रिगार्ड’ खंड में दिखाई गई.
10.
2011 में श्रीलंकाई निर्देशक विमुक्ति जयसुंदर की बंगाली फिल्म ‘छत्रक’ ने डायरेक्टर्स फॉर्टनाइट खंड में स्टैंडिंग ओवेशन पाया.
11.
2012 में असीम अहलुवालिया की ‘मिस लवली’ और अनुराग कश्यप की ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के दो खंड दिखाए गए. तीनों में नवाजुद्दीन सिद्दीकी प्रमुख भूमिका में थे.


सोमवार, 9 मई 2016

राज ने समाज से पानी छीना

मौजूदा दौर में जब हर ओर पानी का संकट है, बहुत से लोगों ने इसे पहले भांप लिया था. अनुपम मिश्र भी उन्हीं में से एक हैं. वे कई दशकों से समाज और राजनीतिज्ञों को इस बारे में चेता रहे हैं.  12 साल पहले उनकी बातें कितनी सटीक निकलीं, देखिये ये इंटरव्यू :

‘राज ने समाज के हाथ से पानी छीना’



अनुपम मिश्र देश के एक प्रमुख गांधीवादी कार्यकर्ता हैं और पानी पर बहुत चिंता के साथ काम कर रहे हैं. उनकी किताबें ‘राजस्थान की रजत बूँदे’ और ‘आज भी खरे हैं तालाब’ में उनकी चिंता और काम की गहराई, दोनों नजर आते हैं. वे दिल्ली में गांधी शांति प्रतिष्ठान के प्रमुख
हैं. उनकी दूसरी पहचान हिन्दी  के शीर्षस्थ कवि भवानी प्रसाद मिश्र का पुत्र होना है. जाहिर है, समाज और प्रकृति की चिंता उन्हें विरासत में मिली है. उनका कहना है कि पानी का प्रबंधन समाज को ही सौंप देना चाहिए. राजकर्ताओं को यह समझना चाहिए कि सदियों पुरानी इस सभ्यता में आम आदमी पानी का बेहतरीन इस्तेमाल करता रहा है.

जुलाई, 2004  में वे नागपुर आए तो सर्वोदय आश्रम में एक स्लाइड शो के साथ ‘राज, समाज और पानी’ के मुद्दे पर व्याख्यान दिया. वहीं उनसे कुछ मुद्दों पर मेरी चर्चा हुई. पढ़िए  :



सवाल  : अनुपमजी; पानी को लेकर इन दिनों जिस तरह से हौआ खड़ा किया गया है. संयुक्त राष्ट्र की तमाम एजेंसियों से लेकर उद्योगपति और सरकारें बड़ी चिंतित दिखती हैं. पानी के लिए युद्ध तक की बातें होती हैं? कहीं ऐसा नहीं लगता कि यह हौआ कुछ ताकतवर लोगों को फायदा पहुँचाने की साजिश का हिस्सा है? उसकी मानसिक तैयारी करवाई जा रही है?

जवाब : देखिए, मैं इसे सीधे साजिश के रूप में नहीं देखता. इसे ऐसा देखा जाना चाहिए कि भूमंडलीकरण और निजीकरण के इस दौर में हर चीज का निजीकरण हो रहा है. यह दरअसल निजीकरण का झंडा है. इसमें पानी एक मुद्दा है. बाकी में जमीन है, जंगल है और समूचे प्राकृतिक संसाधन हैं. हर चीज का निजीकरण करने की मुहिम है. यहां तक कि सरकारों का निजीकरण होने जा रहा है. जहां तक युद्ध वाली बात है तो व्यापक संदर्भ में तो नहीं, पर देखिए कि घर-घर में पानी को लेकर झगड़ा है. भाई-भाई लड़ रहे हैं. यानी खतरा तो है. लेकिन, यह खतरा पानी की कमी की वजह से नहीं है. दरअसल, पानी का जिस बदतमीजी से उपयोग हो रहा है, वह इस खतरे का कारण है. फसलों में ज्यादा पानी लगने लगा है, घर बड़े होने लगे हैं और उनमें हरेक सदस्य के लिए टॉयलेट है. बरअक्स इसके, जमीन के पानी को बनाए रखने का कोई प्रयास नहीं है. शहरी लोगों को धूल से नफरत होने लगी है. वे सड़कों को सीमेंट-कांक्रीट की बना रहे हैं. कोई जगह नहीं छोड़ते, जहां से धूल उड़े. पानी जमीन में जाएगा कैसे? तो यह सब सहजता से हो रहा है. यानी कोई षड्यंत्र नहीं है. लेकिन, खतरा कितना बड़ा है, इसे देखिए. मुगल बादशाह अकबर को उसकी राजधानी फतेहपुर सीकरी को इंजीनियरों के तमाम प्रयासों के बावजूद 16 साल बाद खाली करना पड़ा. सिर्फ पानी की वजह से. जो संपन्न शहर हैं, वे पानी खींचकर ले आते हैं. यमुना और गंगा से दिल्ली तक पानी पहुँचाते हैं. लेकिन, और पानी चाहिए.

सवाल  : एक मुद्दा यह भी है कि जो आप कहते हैं कि समाज को पानी का प्रबंधन और अधिकार सौंप देना चाहिए तो जो राष्ट्रीय संपत्ति  है, उसका क्या होगा? क्या यह सरकार जो लोगों ने चुनी है, वह कोई निजीपन का बोध करवा रही है?
जवाब : पानी का काम अब तक समाज करता रहा है. सिर्फ डेढ़ सौ साल पहले यानी अंग्रेजों के आने के बाद यह हुआ कि पानी का प्रबंधन समाज के हाथों से छीन लिया गया. अब तक समाज के हाथ में ही पानी रहा है. राज ने न केवल समाज के हाथ से पानी छीना, बल्कि वह यह भूल गया कि लोग ही उसका सबसे अच्छा इस्तेमाल और प्रबंधन करते रहे हैं. राज ने समाज को माना ही नहीं और योजनाएं बनाकर काम करता रहा. जबकि अंग्रेजों ने भी रुड़की में स्थानीय लोगों से अपर गंगा नहर बनवाई थी और वैसी इंजीनियरिंग कोई तकनीशियन नहीं कर सकता. तो सरकार जब निकम्मी हो तो लोगों को उसका उपाय निजीकरण में नजर आने लगता है. समाज का मुखर और ताकतवर वर्ग उसका समर्थन कर देता है. हर पार्टी की राय वही हो जाती है.

सवाल  : जल नीति और नदी जोड़ो परियोजना क्या समाज को बेदखल नहीं करेंगे?

जवाब : जल नीति हो या और कोई नीति, विशुद्ध अनीति का दौर है. समाज के पोषण की चीजें नहीं रह गई हैं. नदी जोड़ो परियोजना तो अव्यावहारिक है. हालांकि, उसके लिए पैसा ही नहीं जुट पाएगा, पर चिंता की बात यह है कि उसके लिए सभी राजनीतिक दल, राष्ट्रपति-पूर्व राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री-पूर्व प्रधानमंत्री; सभी एक हो जाते हैं. साफ है कि प्रकृति नदियों को जोड़ती भी है और तोड़ती भी है. करोड़ों साल लगते हैं. गंगा-जमुना जहां से निकलती हैं, वहां से अलग हो जाती हैं. प्रकृति उन्हें इलाहाबाद में मिलाती है और लोग उसे तीर्थ बनाते हैं. अब इंजीनियरिंग से जोड़ेंगे तो सिर्फ नहरें बनेंगी और विनाश अलग होगा.

सवाल  : अलवर में राजेन्द्र सिंह या नागपुर के पास वलनी जैसे प्रयोगों को क्या कहेंगे? क्या यही माध्यम हैं?
जवाब : राजेन्द्र सिंह और वलनी के प्रयोग तो आशा की किरणों हैं. ये समाज को उसकी प्रतिष्ठा वापस दिलाएंगे. मैं तो कहता हूँ कि सरकारी विभागों को खत्म करो और ऐसे प्रयोगों को मान्यता दो. राजेन्द्र सिंह के प्रयोग 24 कैरेट के हैं. हर साल बिन बुलाए तकरीबन 35 हजार लोग उसे देखने आते हैं. सात साल से सूखा है, पर खेत लहलहा रहे हैं. जाकर देखिए.

सवाल : क्या ऐसा नहीं है कि केवल पानी की चिंता बाकी सवालों से दूर करती है?
जवाब  : नहीं; ऐसा नहीं है. इन्हें पूरक के रूप में देखना चाहिए. आखिर समाज के लिए कई स्तंभ होते हैं. अलवर के गरीबों में संपन्नता यही प्रयोग ले आए हैं.

सवाल : एनजीओ की भूमिका को लेकर आश्वस्त हैं?
जवाब  : जो काम कोषोन्मुख होगा, उसका हाल यही होगा. बीस साल पहले यूनिसेफ के पैसे से उन्हीं लोगों ने लाखों हैंडपम्प खुदवाए, जिन्हें अब जाकर तालाब, वाटरशेड नजर आ रहे हैं. उनके प्रति समाज की श्रद्धा नहीं है. वे समाज और पंचायत से सीखने के बजाय उन्हें सिखाने में लगे हैं. जबकि पंचायत 2000 साल पुरानी संस्था है.

सवाल : क्या यह नहीं माना जाना चाहिए कि समाज अपने हक के प्रति चिंतित नहीं रहा?
जवाब : दरअसल, जिस तरह से मजदूरों को कुशल नहीं माना गया और उन्हें मजदूरी करने पर मजबूर कर दिया गया उसने स्थितियां खराब की. कोई गाँव लौटकर तालाब की ओर नहीं देखता. उसे निकृष्ट काम बना दिया गया है.


दिवाली की शुभकामनाएं

कविता : सुनील  स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी