शनिवार, 16 जनवरी 2021

आवाज़


तेरी आवाज़ मेरी आवाज़ से कितनी मिलती है

तेरी सूरत मेरे नग़मे से भी कितनी मिलती है


ख़्वाब में भी असलियत से कितनी मिलती है

मेरी ज़िंदगी तेरी उम्मीद से कितनी मिलती है


कोई सूरत न छोड़ी जो तेरी गली से मिलती है

तेरे बहाने हर शाम जैसे मुझसे मिलती है


ज़माना भूल जाएगा कब तू किससे मिलती है

मेरे बारे में ही सोचा कर कि तबीयत बहलती है


सुनील ओ अगरचे भरम बाक़ी तो मिलती है

ये मानो ख़ाक में ही उल्फ़त हर बार मिलती है

सोमवार, 4 जनवरी 2021

स्वप्न

 स्वप्न आँखों को जगाता

पुष्प नव नित ज्यों खिलाता

आसमां से धरती मिलाता

रंग सूरज में भरे 

चंद्रमा जैसे सजे

हर तरफ हरियाली नई

नदी ज्यों समंदर से मिली

जल भी वही, थल भी वही

खेत में मिट्टी वही

अंकुर पौधा पेड़ वही

आज से कल तक वही


यह सृजन है

स्वप्न है

सृष्टि नई

दृष्टि नई



सपना उगेगा

खेत में

हल लगेगा

जोत में

बीज सृजन के

बोये हैं

मतवाले

खोये हैं

नव दृष्टि का पर्व है

नव सृष्टि का सर्ग है


तूने जो सपना बोया था

चल उसे सींचते हैं

हँसी का जो आँसू खोया था

चल उसे खींचते हैं

नया नहीं बस सोया था

चल उसे उठाते हैं

सृजन राग तेरे मन बैठा

चल उसे हम गाते हैं


©सुनील_सोनी

दीवाना (ग़ज़ल 15)

 साये के साथ

रंग हैं नहीं

जो छोड़ता कभी कहीं

कब कहाँ जाएंगे नहीं

वहीं कहीं नहीं सही

यहीं अभी सही यही

हमसफ़र सफ़र में नहीं

साया कभी साया नहीं

रंग सुर्ख़ सुर्खी में नहीं

लहू छलक आया नहीं


©सुनील_सोनी

©SuneilSoni

कहता हूँ (नज़्म )

 गली से गुज़रता हूँ रोज़

होती है तो नहीं देखता

नहीं होती वो तो

खोजता हूँ मैं


सूरत कोई नहीं

एहसास सा है

नहीं होता महसूस

तो रोज़ मरता हूँ मैं


अज़ब ढंग हैं

निराले दस्तूर

इश्क़ मुक़्क़मल हो तो

दास्तानें नहीं बनतीं


जी हुज़ूर कह दें

मन में घुलता है शहद

शायद अरमानों में

कोई बादशाह बैठा है


अंधेरे रोशनी हमदम हैं

बिछड़ते रूठते रहते हैं


बारिश

 

बारिश

घर खाली है तुम बिन
खेत नम नहीं रहे
नदियों का पानी सूख रहा है
तालाब खाली हो चले हैं
मेरे घर का कुआं भी नहीं बचेगा
आँसू भी कम निकले इस बार
इससे पहले कि
मर जाए आँखों का पानी
बारिश का आना ज़रूरी है

© सुनील सोनी

तू भी, तू ही (ग़ज़ल 14)

 तू भी, तू ही


इस फ़साने में जहाँ भी तेरा नाम होगा

शक़ नहीं वहीं मेरे दिल का मुकाम होगा


फरिश्तों ने भी आज़माए हैं अमल सारे

गुजरेगी तू जहाँ से वहीं मेरा नाम होगा


सवालों के जो भी निकलेंगे सफे

देखना जवाबों में मेरा नाम होगा


कोई कह दे बिगड़ा तो मान लूंगा

नशा भी तेरा है, तेरा ही नाम लूंगा


बहुत दूर हैं गलियां दिल की तेरे बिन

जिस तरफ निकलूंगा, तेरा नाम लूंगा


बहुत दूर हैं गलियां दिल की तेरे बिन

जिस तरफ निकलूंगा, तेरा नाम लूंगा


पनाहों में तेरी दिल तभी रख दिया था

छोड़ूंगा जब भी दुनिया तेरा नाम लूंगा


हर शहर तेरा हर बसर तेरा

जब भी बसूँगा तेरा नाम लूंगा


इबादत के बाज़ार मुमकिन नहीं हैं

पढूंगा दुआ किसी दिन तो तेरा नाम लूंगा


सतह पर सितारों की जाकर हो बैठे

चाँद शिकवा करेगा तो तेरा नाम लूंगा


©सुनील_सोनी

©Sunil Soni


तुझ तक (ग़ज़ल 13)

 


सरे शाम धूप खिल रही है बेकायदा

रात धीरे-धीरे तेरी हँसी बन रही है


बू ए गुल का सफर सांस तक बेक़ायदा

सुबह धीरे-धीरे तेरी सदा बन रही है


नज़र के निशां पर जिरह बेक़ायदा

आहें तेरी मेरी दास्तां कह रही हैं


दुपहरी में आँसू बरसते बेक़ायदा

नैनों से बदली तेरे कहीं खो रही है


भोर तक न सोने के बहाने बेक़ायदा

नींद धीरे-धीरे तिरी गहरी हो चली है


परछाइयों की मासूमियत बेक़ायदा

हर वक़्त पीछे तिरे बस चल रही हैं


©सुनील_सोनी

© Sunil Soni

सपना (नज़्म)


शिद्दत पूरी उसके जैसी है

बड़ी गहरी है सँकरी है


धार है आरपार है

तेज है गुनगुनाहट सी

सवार है सिर पर उसके जैसी ही



व्याकरण उसका समझ नहीँ आता

भाषा उसकी भी मेरे जैसी है


सड़कों पर बिछे हैं नज़र के अरमाँ

मंजरों की महफ़िल में पर हम नहीं हैं


 कहते कहते थकते नहीं, सुनो तो

तराने तमन्नाओं के बुझते नहीं हैं


किसी और दिन इम्तिहान लेना

रक़ीबों की शमशीरें रुकती नहीं हैं

©सुनील_सोनी

© Sunil Soni

नहीं था मन मेरा (ग़ज़ल 12)

 


बेझिझक जिस तरह चली आई थी
बेझिझक उस तरह चली जाए भी

बहुत भोली है वो, रुकती भी नहीं
इतराई सी शरमाई सी हरजाई सी

बचपन भरी आँखें चंचल सी नहीं
बेपरवाह हैं मुझसे, कुछ सुस्ताई सी

मेरा मुक़द्दर कहाँ खींच लाया मुझको
सुबह सुबह देखा उसको अलसाई सी

लटें सुलझाती हुई कभी बिखराती हुई
सुबह सुबह देखा उसको अलसाई हुई

बसंत में अमराई सी कुछ कुछ बौराई भी
कुछ कुछ अपनी सी कुछ कुछ पराई भी

धड़कनें धीमी नहीं पड़ती मेरी
आ जाती है वो थोड़ी सकुचाई हुई

© Sunil Soni

तस्वीर (ग़ज़ल 11)

 जो पगडंडियाँ आसमां से लौटी हैं

बहुत तन्हा हैं, बड़ी सूखी-सूखी हैं

रहने दो अभी, बरसेंगे तो दिख जाएंगे
बादलों ने ग़म की खेती में कुछ देर की है

घुमड़ आए हैं खूब, घने भी अच्छे हैं
अम्बर की झोली खुलने में जरा सी देरी है

कितनी मायूस है, बिछड़कर उससे जो
उदास है हवा, फिर भी बहकी-बहकी है

कभी आएंगे और, तो बाज़ी जीत लेंगे
खेल बाक़ी है, पर खेत होने का जी है

भरम जब भी बनेंगे, खूबसूरत होंगे
सच के दरिया में क्या डूबना ज़रूरी है

© Sunil Soni

©सुनील_सोनी

कुछ अशआर



पुरानी होती जाती है जितनी

मोहब्बत सिर चढ़ती जाती है उतनी


तसव्वुर में ही है अभी महबूब मेरा

झाँकेगा तो खोल देंगे दिल की खिड़की


दिलफेंक कहो तो भी सुन लेंगे

आशिक़ न मानो तो भी सह लेंगे


नज़र भर देखो मुड़ने से पहले

 बेवफ़ाई मानकर फिर जी लेंगे


उल्फ़त की जानिब जब कभी जाना हुआ

तुझे सोचता रहा, जिक्र भी करता रहा


इश्क़ का देखिए, कैसा ये तराना है !

जबां में खुशबू ओ आँखों में फ़साना है !!


यार के लब सुखन का मज़ा देते हैं

तू कहता है मेरे शे'र जवां होते हैं


बूँद खोएगी तो आसमां में जाएगी

बूँद बिखरेगी तो जमीं पर आएगी



दरवाज़े के दोनों पार गली थी

जहाँ से चली थी वहीं भली थी



© Sunil Soni


इंतेज़ार

मेरे महबूब जरा रुक, बारिश तो आने दे

सूरज ढल जाए, शाम का रंग चढ़ जाने दे

फिराक ओ उम्र गुजरे जाते हैं
वक्त ए विसाल करीब तो आने दे

तन्हाइयां तरबतर करतीं नहीं
सोहबत से ये मजा तो आने दे

गम के मौसम लू हैं बेखबर
शरमा, ठंडा झोंका तो आने दे

© Suneil Soni

रुका हुआ सा कुछ

खाली हाथ लौट आया है

पहले से भी ज्यादा


दिल भरा हुआ है

किसी काम का नहीं


कब्रों पर ठहरे हुए आँसू

सूखते जा रहे हैं


आँखों का खुला होना

मुर्दा होने का डर है


पत्थर पूजे जाने लगे बेहिसाब

ज़िन्दगी पत्थर सी रह गई


खुशबुएँ खून की बढ़िया हैं

औरों की पानी सी बहती हैं


कमबख्त सच को लग जाए झूठ की हवा

बदकिस्मती अपनी बददुआ भी नहीं लगती


©सुनील_सोनी

© Suneil Soni

रिक्त स्थान भरो

शहर में.... भरते जा रहे हैं...

खालीस्थान
दिलों में...
और ज़मीन पर

मेरे घर के सामने वाली गली में
खेलना;.   मुमकिन नहीं...
कि
...जैसे मैं बचपन में खेलता थाsss

सड़कें... रात में भी...
नहीं ले पाती सांस
चौराहे... सिग्नल बंद होने पर
तलाशते हैं... फुरसत

वो नीम...
बरसात में झूमता था...

पीपल के पत्तों में ठहरी बूंदें
अंजुलियों में...
ख़ज़ाना बनती थीं...

रह गए होते तो
सपना साझा करता...

नए बचपन से

नीम में...
या
बरगद में
रहनेवाले तमाम...
भूतों की कहानियां सुनाने का

शऊर
या
बिरसा
किसे सौंपू?

दुविधा है...

गुलमोहर...
गर्मियों में जला तो
हरियाते हुए दहका गया ज़मीन
सिर्फ बकाया है वही...
बेकायदा...

आसमान में...
चिड़ियों से ज्यादा...
उड़ते हुए... आदमी

पँख उगा पाते तो...
बेहतर था

मिट्टी... पेड़ उगाना भूल रही है...

पहली बारिशों की सौंधी खुशबू
12वीं मंज़िल पर...
इत्र की शीशियों में कैद हैं

सर्दियाँ; सिमट आई हैं...
एयर कंडीशनर के भीतर
शरद की; पूनों का चाँद...
प्रेम के बजाय...
फोटो प्रतियोगिता का सबब है

हम बदल रहे हैं...
जैसा चाहते थे...

आदमीयत की; आदिम इच्छाएँ...
मशीनों की रज़ामंदी हो चली हैं...

घर का बन जाना...
घर बन जाने से; अलहदा है...

जमीनों के रिक्त स्थान...
लोहा...; और कांक्रीट, भर रहा है...
दिल... पिघलकर मिट्टी हुए जा रहे हैं...

© सुनील सोनी

कुदरत

दरवाज़ों के ऊपर जो रौशनदान हैं

उन्हें खुला रखना

खिड़कियों से झाँकने वालों से डरकर

लगाना मत परदा

छत से आसमान दिखता रहे

ऐसा इंतेज़ाम करना

धूप तुम्हें पुचकार कर उठाए

इतना ध्यान रखना

झोंके इधर से चलें और उधर से जाएं

खुले में इतने रहना

बारिशों के छींटे चाय की मेज पर पड़ें

अथवा

झूले पर बैठकर चाय पीते हुए तुम्हें भिगोएं

ये ख़्याल रखना

शहर में इतना गुम न होते चले जाना

जैसे तुम शहर बन जाओ

मिट्टी पर कभी कभी नंगे पाँव

चल लिया करना

सब स्मृतियां मिट्टी से बनी हैं


© SuneilSoni


©सुनील_सोनी

हम (ग़ज़ल 10)

 

छोर पर ज़माने के कबसे टिके हुए हैं
दोस्ती के बूते ही दुनिया में ठहरे हुए हैं

मिलते नहीं हैं जो, फिर भी मिल ही जाते हैं
हासिल हैं सारे जो, दुआएँ उनकी बड़ी हैं

बुलंदी पर यूँ तो शौहरत के मकाम हैं
यारों की सोहबत में न्यौछावर तमाम हैं

फ़िक्र बिखरी हुई पड़ी धूप सी आसपास
शुक्र है यारियां उसमें ठिठकी सी पड़ी हैं

रक़ाबत पुरज़ोर कभी इश्क़ की गली में
यारो को ग़ैर से हारें वो बुज़दिल नहीं हैं

©SuneilSoni

भीगना

वो मकान अब भी मेरा बसेरा है

रहती थीं जब तक तुम, घर था


रूठकर भी नहीं मना पाया क्यूँ
सर से पांव तक यूं डूबा हुआ था


हक़ तेरा इतना, छोड़ दे मुझको
मैं भूल जाऊंगा, मैंने कब कहा था


तमन्ना ए सफर भी तमाम नहीं
ज़िक्र तेरे शहर का होता रोज़ था


डबडबाई आँख, ऐलान हो गए
मुक़म्मल न तेरा जां चला जाना था

© SuneilSoni

©सुनील_सोनी

खेल (ग़ज़ल 9)

 अभी लाल है, अभी पीला होगा

चित्रों में बच्चों के नीला भी होगा


दुल्हन सजी है, दूल्हा भी सजा है

बच्चों के खेल में ये आम होगा


गुलाबी है चुनरी, लहंगा भी गुलाबी

दुल्हन का गजरा घर महका देगा


बजेगा बाजा तो नाचेंगे बाराती

मजा आएगा, क्या खूब खेल होगा


फिर होगी विदाई, तो मैं न जाने दूँगी

कहेगी बिटिया रानी, यही खेल होगा


दुल्हन ही क्यों जाए, दूल्हा आ जाए

खिलौना संसार किस्सा आम होगा

©सुनील_सोनी

जश्ने आज़ादी

ख़्याल ए आज़ादी से छा गईं रौनकें

आसमां पे देखिए तिरंगा लहराया है


कभी खेतों में कभी मैदां में झलकें

गंगा-जमुना में मुहब्बतों का साया है


खुशबुओं के दौर जो सांसों से गुज़रे 

चमन ए हिन्द में फूल कोई बौराया है


सरहदों से रुकते नहीं कभी झोंके

नाम ओ रुतबा ए गुल जहां पे छाया है


तारीख़ ए दौरां ए दुश्वारी के सफ़े मौजूं

इन बादलों के जाने का मौसम आया है


इंद्रधनुषों के पार सूरज ज्यों चमके

इल्म की रौशनी हिन्द का सरमाया है


@SuneilSoni

©सुनील_सोनी

अर्थात (ग़ज़ल 8)

 


लगता है यूं जैसे फूल साज़िशों से खिले हैं

इत्तफाक़ों के चमन में ऐसे सिलसिले हैं


वो यारो की बातें अदाकारी का वो फ़न

सिनेमा से भी बढ़कर ग़ज़ब सिलसिले हैं


सियासत में आजकल सितम खुशनुमां

मोहब्बत में जनाज़ों के लंबे सिलसिले हैं


वफ़ा के किस्से पत्थरों पर पानी से लिखे हैं

यक़ीं है मगर ताज़ा ज़ख्मों के सिलसिले हैं


मुझ तक ही लौट आती है आवाज़ मेरी

तिलिस्मी वादियों में अंधेरों के सिलसिले हैं


©SuneilSoni

©सुनील_सोनी


ज़मीन

 जहाँ तक देखो हरा है

शायद इसमें लाल भी पड़ा है

मटमैला हो गया वहां पर

जहां मेरा पसीना पड़ा है

सुर्ख उग आए से लगते हैं जो फूल

मां का सिंदूर वहां झड़ा है


©सुनील_सोनी

मिट्टी

 उनकी मिट्टी में जाना है मुझे

जिसने मिट्टी में मिलाया था मुझे


हश्र ए आख़िर मिट्टी सबका

ख़ाक में ही मिल जाना है मुझे


©सुनील_सोनी

दृष्टि

 ये वृक्ष जो

मूसलाधार में

सधे खड़े हैं

कृतज्ञ हैं

आकाश के

धरा की तृप्ति के लिए

जीवन तरने के लिए

आंधियाँ

विनम्रता की उपासक हैं

वृक्ष उनके शिष्य

ढहना

सफल होने का रास्ता है

सधे रहना समर्पण का

बारिश

आत्मा है सृष्टि की


©सुनील_सोनी

मान भी जाओ

 हिकायत को न हिक़ारत से देखें हुज़ूर

ये हमारी है, उनकी भी है, दुनिया की भी है


लहू हमारे ज़ख्मों से ठहरता क्यों नहीं

सज़ा हमारी है, उनकी भी, दुनिया की भी है


सुनाते-सुनाते रोते जाते हैं बरबस

रंज हमारा उनका भी, दुनिया का भी है


मिसाल दूँ या ज़िक्र रंजिश में छोड़ दूँ

कहानी उन तक मेरी, दुनिया तक भी है


मुमकिन है एक ही वक़्त साथ हों तन्हा भी

तक़ाज़ा मेरा उनका भी है, दुनिया का भी


©सुनील_सोनी

आओ

 असंख्य द्वार

संशय के पार

तुम्हारा रास्ता देखते हैं

ज्यों हरसिंगार

गुलमोहर ज्यों

ग्रीष्म में 

शरमा कर हो जाता है लाल

झरोखे वे हरियाये हैं

झाँकती थी

कोई कली जिनसे

सरोवरों के दर्पण में

जो शिखर

बादलों के परदे से ढँके हैं

नदी की तलछटों में

रूप हर चुके हैं

वन पर बसन्त छाये से

मुझ तक तुझे लाये से

©सुनील_सोनी


आशा

 अनदेखे भी अनकहे हैं

अस्वर भी सुर से भरे हैं

दृग कब कभी किसके खुले हैं

आह ! श्वास के झोंके चले हैं

दृकपाल से हर क्षण तरसते

झूम के हर प्रहर बरसते

बादलों के मर्म में भी

प्रिय की सी छाया

धूल के कण भी अचंभित

थाप पाकर अनमने से

रक्त के आरोह में प्रतिक्षण

स्पंदनों के गीत हैं


©सुनील_सोनी

तितली कुछ पराग पाए

हरीतिमा जी भी जाए

क्यों कामना कहती चली है

मन में बहली पड़ी है

तुझसे मिलन की आशा



मन

धूप मेरे हिस्से की

बादल ले गया
इंद्रधनुष
बारिश के साथ मिलकर
बच्चों की खातिर रच गया
रात जैसा दिन में ही
घनघोर
मन भी गीला कर गया
दुःख भरा या सुख से हो तर
भेद बोता ही नहीं है
फिर विरह हो या मिलन
शेष रहता ही नहीं है

शुष्क जब भी
दिख पड़ेगा
श्याम में भी शुभ्र होगा
तब नहीं बिखेरेगा
इंद्रधनुष के रंग
बारिश का विरही
खाली बादल


©सुनील_सोनी
©suneilsoni

कमाल

 दिल पे कब ज़ुबां के आमाल चलते हैं

इश्क़ में हुज़ूर बस कमाल चलते हैं


मंदिर की घंटियाँ जोर से बजाईं तो

वो समझे कि हम बवाल करते हैं


समंदर की दहाड़ों पर हम रो दिए तो

फरेब हैं ये आंसू, कहकर चल दिए


©सुनील_सोनी

छोर

तुम्हें देख लेना

मन का छूना है
छुईमुई के पत्तों के लजाने जितना
नाजुक
तुम्हारा न देखना भी
हर क्षण
तुम्हें देखने की प्रतीक्षा
यह प्रतीक्षा चंद्रयान की
विक्रम की तलाश जितनी ही
अनवरत है
अथाह है

तुम्हारा मौन
मेरे शब्दकोश से
अधिक वाचाल है
तुम जो कहती हो
बिना मुझसे मुखातिब हुए
मैं नहीं सुन पाता
लेकिन
तुम्हारे होंठों के खुलने या बंद होने की
आवृत्ति
अधैर्य की सीमा तक
चंचल है

तुम्हारा गुस्सा
मैं देख नहीं पाता
लेकिन
तुम्हारी आँखों से रिसता हुआ
पढ़ पाता हूँ
त्यौरियों से कपाल तक
भिंच जाता है
उसका अनुमान
वर्षा का अनुमान लगाने से
सरल है

जब मैं यह कह रहा हूँ
तब
मुझे रजभर भी
भरोसा नहीं
कि
तुम जानती हो
यह सब
मैं इस रहस्य को
अरहस्य नहीं होने दूंगा कभी
मैं इसका अकेला साक्षी हूँ
और रहूंगा


©सुनील_सोनी
©suneilsoni


अनुमान

जिस गली से
अनुमान पर निर्भर
गुजरता हूँ मैं
घुप्प अंधेरे के बीच

मैंने सुना था
लाउडस्पीकर पर
गली का समापन
जगमगा देगा मुझे

कोलाहल है जैसे
गली में हैं बहुत लोग
मेरी तरह
अनुमान पर चल रहे हैं

©suneilsoni

©सुनील_सोनी

भाषा

 भोथरी होती जाती है 

मेरी भाषा

हर रोज़ सान पर लगाता हूँ

लिखता हूँ

ताकि चमक बरकरार रहे

लेकिन

भय के फंदे मेरे भीतर पल रहे हैं

छटपटा रहे हैं आंसू

पर उन्हें बिना धार के

कैसे रुला पाऊंगा मैं

हँसा भी नहीं सकता

भाषा मेरे भीतर भय बनकर रह गई है

उसमें कोई न कोई अक्सर

य लगा जाता है

भाषा का स्थगन

 मेरा ठहर जाना है

लेकिन

मैं जोखिम लेने को तैयार नही

मैं उम्मीदें बँधाने को राजी नही

मैं दर्द के दरिया को क्यों छेड़ूँ

हरहराते घावों को क्यों छेड़ूँ

मैं नहीं कह पाऊंगा कि

निकल आओ घर से

सड़क पर भिड़ो

टूट जाओ या मर जाओ

पर अपनी बात बोलो

मैं नहीं लिखूंगा उनकी कहानी

खून से लथपथ हैं तो क्या

स्याही की जगह नहीं भरूंगा

कलम में रक्त की धार

नहीं बताऊँगा कि

मैंने जलते घरों की शहादत देखी

क्यों लिखूँ कि किन कब्रों में दफन हैं बच्चे

©सुनील_सोनी

हे ! राम !!

 हे ! राम !! सिया राम !!

माया का कैसा जाल बुना है

रूप तुम्हारा ही धरकर

रावण चहुंओर खड़ा है

दस नहीं, हज़ारों अब तो

मुख पर सुविध श्रृंगार है

कितना सुंदर वेश रचा है

मोह में कहीं फंस न जाऊं

मैया सीता ज्यूँ हर न जाऊं

धर्म के छद्म में अधर्म खड़ा है

सच की छाती पर झूठ चढ़ा है

मति मेरी सुध भी रखना राम

अरज

हे राम ! हे राम !!


©सुनील_सोनी

पुल

 ये जो बेपरवाही का विस्तार है मुझ तक

जैसे मेरा समग्र सिमट आना है तुझ तक


©सुनील_सोनी

चलना

 चलते रहना निरुद्देश्य

भटकाव नहीं

नई दृष्टि से देखना है

हर चीज़

©suneilsoni

मात्रा

 प में

र किसी अधटूटे तीर की तरह घुसा है

ऐ की मात्रा लगी है उत्थान की तरह

ताकि

म जब बिंधे

तो

सम्पूर्ण अर्थ बदल जाए

मिलकर


(प = पुरुष) (म = महिला)

@suneilsoni

इंसाफ़

 प्रेम की तरह ही

कविता को भी

रिश्ते का नाम देना

गुनाह है

असर

 ख़ुद से नाराज़ होता हूँ

तो बरस पड़ता हूँ औरों पर


सवाल ख़ुद से करता हूँ

जवाब तलब करता हूँ औरों से


तमन्नाएं रोज़ जोड़ते जाता हूँ

उम्मीद लगा लेता हूँ औरों से


बोझ से अपने दबा रह जाता हूँ

मंज़िलों पर रश्क़ करता हूँ औरों से


होश ठिकाने नहीं होते हैं मेरे

बेहोशी के इल्ज़ाम पाता हूँ औरों से


दिल के फ़रेब यूँ ताड़ जाता हूँ

वफ़ा का फ़न सीख जाता हूँ औरों से


©suneilsoni

©सुनील_सोनी


अर्थ

 मेरे होने के ये मायने हैं

नज़ारा जो भी हो

मैं ही नज़र आऊंगा

पथरीली, काली बेचैनियों को

मिटकर भी मिटा जाऊंगा

©सुनील_सोनी

मज़बूती

 बेल 

चढ़ जाती हैं पेड़ पर

दीवार या लौह स्तंभों पर

नाज़ुक बदन उनके

छिलते नहीं

 

©सुनील_सोनी

असल

 जहाँ से निश्चिंत गुजरते हैं लोग

वहाँ भरोसों के कब्रिस्तान पड़े हैं


जहाँ इस बार पुरजोर बरसे हैं बादल

वहाँ इस बार फसलों पर ख़तरे बड़े हैं


जहाँ दावा है सूरज की रोशनी का

उन इलाकों में अकाल भारी पड़े हैं


©सुनील_सोनी


मुकम्मल

 मुकम्मल सा दिन है, मुकम्मल रात भी

सराब इश्क़ में मुकम्मल जहां आज भी


तन्हाइयां भी मुकम्मल हैं और हिज़्र भी

हयाते नूर से मुकम्मल फरियाद भी


©सुनील_सोनी

नज़र

 सड़कें कितनी बेचैन हैं चलने के लिए

चौराहे मचल रहे हैं मायाजाल में

सिग्नलों पर भीड़ मुस्तैद है

©सुनील_सोनी

बाक़ी

 क्यों लूँ रुखसत नाराज़ी का सबब बाक़ी है

यार ने पिलाई उनको मेरी तलब बाक़ी है

©SuneilSoni

फर्क़

 मैंने सच कहा था तूने सुना नहीं

जो सच तूने सुना मैंने कहा नहीं


समझ की है अलहदा रौशनी

राहें मुझे मंज़ूर थीं जो तुझे नहीं


©SuneilSoni


©सुनील_सोनी

 मेरी आँखों में देख दुनिया

धरती के सारे झरने

पूरा आसमान

सभी नदियां और समंदर

तमाम साहस और करुणा

बची-खुची उम्मीद भी

फिर बौरा उठने के

धैर्य के साथ

यहाँ है

आ छुप जा

इन फूलों जैसी

मासूमियत के साथ

©सुनील_सोनी

पस ओ पेश (ग़ज़ल)

 कहता हूँ ख़ुद और ठहर जाता हूँ

ठिठकता हूँ, फिर जाग जाता हूँ

 

अँधेरे इंतहाई मेरे जानिब तन्हा

वादों पे हर शब गुज़ार जाता हूँ

 

खिड़की के पार बगीचे होंगे

सोच के हर रोज़ ठहर जाता हूँ


©सुनील_सोनी

साँप की प्रार्थना


हतप्रभ हूँ मनुष्य!

मेरा ज़हर

द्वेष-राग से नहीं उपजा

न ही किसी लाभ के लिए

कभी जान ली है मैंने

केंचुल धारण नहीं किया 

और न ही रूप बदलता हूँ

यह सब प्रकृति ने 

बख्शा है मुझे

हे, मनुष्य ! 

क्यों मेरी उपमा

मानवीय कर दी तुमने

क्यों लजाते हो मुझे

तुम ही हो

जिससे सदा बचना चाहता हूँ

धर्मग्रन्थों से

मुझे निकाल फेंको

मेरा ज़िक्र नृशंस आख्यानों में न आने दो

मैं निम्नतम कोटि का पशु हूँ

तुम प्रथम पायदान पर

मैं वही रहना चाहता हूँ

जो हूँ

मैं किसी तौर

मनुष्य नहीं होना चाहता


©सुनीलसोनी




सब कुछ

 सब कुछ कह देना ही नहीं है सब कुछ

सब कुछ सुन लेना ही नहीं है सब कुछ


सब कुछ में शामिल है मेरा तन्हा होना

सब कुछ में शामिल है तुम्हारा न होना


तुम्हें महसूस कर लेना भी है सब कुछ

तुम्हें न पाना या खो देने में भी जो है


फिर से तुम्हें पाने के बग़ैर का अहसास


©सुनील_सोनी

मैं

दिल की राहें कहाँ से गुज़रीं

पता नहीं था वहाँ से गुज़रीं

©सुनील_सोनी



तंत्र

 तंत्र ने

गण को

बजाया

खूब 

तन्ना तू...

तन्ना तू...


भूखे पेट

जो सोये थे

दिल से उनके

निकला

हू... हू... हू...


संगीनों के

साये में जो

खामोश

खड़े रहे

करते

कूं... कूं... कूं...


ख़ुशबू

अलबत्ता

फिर भी

फूलों से

उठती रही


जिनकी नाक

ज़मीं पर थी

बूटों से

सजती रही


सीने में 

बिंधे रहे

तीर 


©सुनील_सोनी

यार

 इश्क़ ए दुनिया में गिरफ़्तार हूँ

बज़्म तेरी, उनकी महफ़िल

हर सू मुखातिब ए यार हूँ


चर्चे तेरे ग़ैर के वादों में भी

दीदार उनके ग़ैर की राहों में भी

मेरा क्या, मैं तेरा बेक़रार हूँ


©सुनील_सोनी

तू और मैं

 इश्क़ राह है

एक छोर मेरा है

एक छोर तेरा है


इश्क़ सपना है

तेरा मेरी खूँटी पर टंगा है

मेरा तेरे काँधे पर लदा है


इश्क़ नदी है

मेरा किनारा तुझसे मिला है

तेरा किनारा मुझे छू गया है


©सुनील_सोनी

कोई (ग़ज़ल)

 ये मासूमियत मेरे कंधों पे भारी बोझ है

कोई मेरे भीतर के बच्चे को रोको तो ज़रा


हर तरफ़ वही वहशत शब ओ रोज़ है

मुझसे बहती मोहब्बत को रोको तो ज़रा


चमन पे बेवज़ह खिज़ां मेहरबां क्यों है

सियासत फ़िज़ां में घुल गई कुछ ज़रा


मेरे माज़ी में मुस्कुराहट का खज़ाना है

कभी तुझसे मिलूंगा तभी सोचा था ज़रा


इंतक़ाम में रक़ीबों को गुल से नवाजा है

कहाँ से उठती है खूँ की बू रोको तो ज़रा


मुँह फेर ले जो तसव्वुर हुस्न का इश्क़ है

सितमग़र वो नहीं मगर सूरत देखो तो ज़रा


©सुनील_सोनी



ताब

 मैंने परचम बनाया है तू एक नज़र डाल तो ज़रा

मेरी आँखों से आँखें मिलाने की ताब ला तो ज़रा

होली

हर सुबह उजाले में सूरज के डूब जाता हूँ

शफ़्फ़ाफ़ ओ मरमरी गरमाहट से तर जाता हूँ

हर दिन सात रंगों से यूँ गुलज़ार हो जाता हूँ
हर रात लेकिन स्याह इकरंग से डर जाता हूँ

रोशनी तमाम कहीं से ढूँढ निकाल लाता हूँ
औ पूरे जी-जान फिर अंधेरे से लड़ जाता हूँ

गुफा में लौटने का ख़याल जिस पल पाता हूँ
सदियों पुरानी याद से रूह तक सहम जाता हूँ

हमराह सितारा देखकर अब भी सिहर जाता हूँ
हर कृष्ण पक्ष में आशिक़ चाँद का हो जाता हूँ

पत्थरों फिर माचिसों से रोज़ आग जलाता हूँ
हर वक़्त आगे बेतरह पर क्यों अंधेरे पाता हूँ

रात में रंग भर दे जो बिजली के लट्टू बनाता हूँ
हर रोज़ बस जाने क्यों वजूद यूँ ही बचाता हूँ

हर क्षण उजाले में ही रहने को मचल जाता हूँ
दिल में हर उग जाए सूरज, ये हलफ उठाता हूँ


©सुनील_सोनी

तेरी बात (ग़ज़ल 5)


मेरी आँखों में अब जितना वीराना है

वही गली-कूचो का भी अब तराना है


मेरे दिल में अभी आँसू जो उभरा है

कबसे उसकी आँखों में भी वो ठहरा है


मेरे सीने से आती है जो उसकी सदा

मेरी वफ़ा भी उसकी धड़कन में रवां है


तड़पती बिजली जोश में बादल भी

बरस जाने की मेरी बेक़रारी भी जवां है


लाज़िम है उदासी का यूँ तारी हो जाना

मेरे हर रास्ते से वो कभी तो गुज़रा है


©सुनील_सोनी

इंटरनेट

 इश्क़ के मुक़ाबिल दुनिया इस तरह थी

आशिक़ ओ माशूक़ ने बरक़त बहुत की


वो छत पर नुमाया हम सड़क पर निकले

नज़रें लड़ाईं पलभर, उफ्फ़ की न उह की


बोलती बंद हमारी उनकी इंटरनेट ने यूँ की


©सुनील_सोनी


ये दिन (ग़ज़ल 4)


कट जाता है दिन, पर रात नहीं कटती
कट जाती है दुपहर, शाम नहीं कटती

फुर्र होती सुबह बच्चों के खेल में मुब्तिला
बेबस हूँ, मुए फ़ोन से दूरी नहीं घटती

शुक्र है कि रात तन्हा, अभी ख्वाब सोये हैं
तेरी यादों के बिन यां, क्या वरना गुज़रती

महकेंगे ज़माने फुरकत के, ख़ुशबू से
कहाँ भूला कस्तूरी थी तेरे आने से उठती

हिसाबों में पड़ा हूँ यूं कि न दिन कोई छूटे
तय है वस्ल, क्यों शब न हिज़्र की गुज़रती

©सुनील_सोनी

©suneilsoni





तू (ग़ज़ल)

वीराने में सहमा-सा छू जाता है

कोई नहीं है बस तू याद आता है

यह नहीं कि तेरी याद में खोया हूँ
हवा चलती है तो तू याद आता है

बिजलियाँ चमकें या बरसात हो
सीने से लिपटा तू याद आता है

अभी साया कोई गुज़रा छूकर
हमसाया मुझे तू याद आता है

पेशानी से बोसा मिटाया नहीं है
आईना देखकर तू याद आता है

©SuneilSoni

बेपरदा

लिख लूंगा फ़िर किसी दिन कविता

अभी फ़ुरसत से देख तो लूँ तुम्हें


©सुनील_सोनी

क्यों

 जो पैर ज़मीं पर नहीं पड़ते

उनका ज़मीं पर गुजारा क्योंकर हो?

जिन्होंने सपने नहीं देखे

उनका आसमां पर किनारा क्योंकर हो

जिन्होंने कभी नदी की रेत नहीं देखी

पहाड़ों का उन्हें नज़ारा क्योंकर हो


©सुनील_सोनी

ग़ज़ल (2) याद

 गश्त यूँ ही गली में लगती रही

मुश्क़ यूँ ही गली में फबती रही


यादों के सफ़र में मैं जगती रही

ख्वाबों के आईने में सजती रही


दिल ज़र्रा ज़र्रा यूँ फुदकता रहा

पेड़ पे कोई कोयल कूकती रही


गजरे से फूल आँगन में गिरते रहे

आंसुओं से गली मेरी सजती रही


तू चली आ कि बज़्म भरती नहीं

महफ़िल तेरे बिन बहकती नहीं

©सुनील_सोनी

©suneilsoni




तेरा ही

 नक़ाब में आँखों से पढ़ते हैं तेरा हाल

किस्सा ज़माना ए बेहिजाबी खत्म हुए


परदा भी सितमगर ने किया बेमिसाल

बज़्म में रस्म ए हया के रिश्ते खत्म हुए


धड़कता दिल है ज़ोर से क्यों हूं बेक़रार

सुनते हैं दीदार के सब रस्ते खत्म हुए


दरयाफ़्त में है आया वो नाम कई बार

शुक्र कि तफ्तीश के वो हिस्से ख़त्म हुए


सच्चे हैं कि झूठे क्यों मैं करूँ एतबार

हुस्न ए मेहताब के यूँ चरचे ख़त्म हुए


©सुनील_सोनी

@suneilsoni


तरक़ीब

 दिल न डूबे बेवजह, तहखानों में झाँकिए

रिश्तों के संदूक में पुड़िया खुशियों की फाँकिए


दिल में न हो हरारत तो जी किसी का बाँटिए

रंजिश से पड़ी खाई हों तो मोहब्बत से पाटिए


©सुनील_सोनी

ज़िद

 मुझे भी खबर कर 

तेरे आने की


ज़िद कब से ये मैं

लिए बैठा हूँ


हुआ था जो रुखसत

गई रोशनी थी


तेरे संग से मैं 

उजाला बना हूँ


कभी और भी जब

तेरी बात होगी


सांसों में गर्मी 

बेतरह देखता हूँ


सवालों में कुछ भी

नया तो नहीं है


फिर भी नए मैं

सिलसिले देखता हूँ

©सुनील_सोनी

समझ

 हुस्न ओ दानिश के अमल को समझ लें

लैला में कैस ने जो जाना वो क्या अलग था

©सुनील_सोनी

यूँ

 तकिये के नीचे किताब रखकर सो गए

आँसुओं से भीगा गुलाब फिर यूँ खिल गया


बारिशों की याद में ख्वाब तेरा छू गए

रात हुई तमाम तो किस्सा कोई यूँ खिल गया


हर गली चाँद निकला हम कहीं खो गए

उलझनें सुलझाईं तो चेहरा तेरा यूँ खिल गया


©सुनील_सोनी

उल्फ़त

 उसने कहा, ये तुम्हारी सबसे बुरी लत है

मैंने कहा, अपनी लतों में एक और जोड़ लो


©सुनील_सोनी

एहसास

 एक्शन फिल्में देखते हुए तीव्र इच्छा होती है

किरदारों की आंखों में प्रेम उपजते हुए देखना


हिंसा के नृशंस क्षणों में लज्जा से रुक जाना

करुणा से भर आना और घृणा का ढह जाना


©सुनील_सोनी



ताक़त

 ग़ुलामी की बू न जाएगी जब तक

बग़ावत नौजवां ख़ूँ से न जाएगी

©सुनील_सोनी

हाँ

 यूँ घूमना बेइरादा, ठहर जाना फिर लौट जाना

बहुत मुश्किल है दिलजलों का फिर लौट पाना


हरगिज़ नहीं है मुमकिन तनहा सफ़र पे जाना

याद की रात के भरोसे हर रोज़ जीते जाना

©सुनील_सोनी

वीराना (ग़ज़ल)

 सन्नाटों में दिल के वीराना भी जुड़ गया

याद का धुआँ उठा औ आँखों से बह गया


दोस्तो के हाथ में ही था ज़िम्मा चिराग का

ज़माना मुड़ा तो वफ़ा का ख्वाब बह गया


ज़ुल्मत से आरज़ू क्या किसी ने की होगी

मेरे वक़्त ए आफ़ताब का किस्सा सो गया


साँसों का भरम जोर का झोंका ले गया

हासिल कुल जमा ख़्वाब तनहा रह गया

 

©सुनील_सोनी


दिवाली की शुभकामनाएं

कविता : सुनील  स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी