शनिवार, 16 जनवरी 2021

आवाज़


तेरी आवाज़ मेरी आवाज़ से कितनी मिलती है

तेरी सूरत मेरे नग़मे से भी कितनी मिलती है


ख़्वाब में भी असलियत से कितनी मिलती है

मेरी ज़िंदगी तेरी उम्मीद से कितनी मिलती है


कोई सूरत न छोड़ी जो तेरी गली से मिलती है

तेरे बहाने हर शाम जैसे मुझसे मिलती है


ज़माना भूल जाएगा कब तू किससे मिलती है

मेरे बारे में ही सोचा कर कि तबीयत बहलती है


सुनील ओ अगरचे भरम बाक़ी तो मिलती है

ये मानो ख़ाक में ही उल्फ़त हर बार मिलती है

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दिवाली की शुभकामनाएं

कविता : सुनील  स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी