सोमवार, 4 जनवरी 2021

रिक्त स्थान भरो

शहर में.... भरते जा रहे हैं...

खालीस्थान
दिलों में...
और ज़मीन पर

मेरे घर के सामने वाली गली में
खेलना;.   मुमकिन नहीं...
कि
...जैसे मैं बचपन में खेलता थाsss

सड़कें... रात में भी...
नहीं ले पाती सांस
चौराहे... सिग्नल बंद होने पर
तलाशते हैं... फुरसत

वो नीम...
बरसात में झूमता था...

पीपल के पत्तों में ठहरी बूंदें
अंजुलियों में...
ख़ज़ाना बनती थीं...

रह गए होते तो
सपना साझा करता...

नए बचपन से

नीम में...
या
बरगद में
रहनेवाले तमाम...
भूतों की कहानियां सुनाने का

शऊर
या
बिरसा
किसे सौंपू?

दुविधा है...

गुलमोहर...
गर्मियों में जला तो
हरियाते हुए दहका गया ज़मीन
सिर्फ बकाया है वही...
बेकायदा...

आसमान में...
चिड़ियों से ज्यादा...
उड़ते हुए... आदमी

पँख उगा पाते तो...
बेहतर था

मिट्टी... पेड़ उगाना भूल रही है...

पहली बारिशों की सौंधी खुशबू
12वीं मंज़िल पर...
इत्र की शीशियों में कैद हैं

सर्दियाँ; सिमट आई हैं...
एयर कंडीशनर के भीतर
शरद की; पूनों का चाँद...
प्रेम के बजाय...
फोटो प्रतियोगिता का सबब है

हम बदल रहे हैं...
जैसा चाहते थे...

आदमीयत की; आदिम इच्छाएँ...
मशीनों की रज़ामंदी हो चली हैं...

घर का बन जाना...
घर बन जाने से; अलहदा है...

जमीनों के रिक्त स्थान...
लोहा...; और कांक्रीट, भर रहा है...
दिल... पिघलकर मिट्टी हुए जा रहे हैं...

© सुनील सोनी

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दिवाली की शुभकामनाएं

कविता : सुनील  स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी