असंख्य द्वार
संशय के पार
तुम्हारा रास्ता देखते हैं
ज्यों हरसिंगार
गुलमोहर ज्यों
ग्रीष्म में
शरमा कर हो जाता है लाल
झरोखे वे हरियाये हैं
झाँकती थी
कोई कली जिनसे
सरोवरों के दर्पण में
जो शिखर
बादलों के परदे से ढँके हैं
नदी की तलछटों में
रूप हर चुके हैं
वन पर बसन्त छाये से
मुझ तक तुझे लाये से
©सुनील_सोनी
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