शिद्दत पूरी उसके जैसी है
बड़ी गहरी है सँकरी है
धार है आरपार है
तेज है गुनगुनाहट सी
सवार है सिर पर उसके जैसी ही
व्याकरण उसका समझ नहीँ आता
भाषा उसकी भी मेरे जैसी है
सड़कों पर बिछे हैं नज़र के अरमाँ
मंजरों की महफ़िल में पर हम नहीं हैं
कहते कहते थकते नहीं, सुनो तो
तराने तमन्नाओं के बुझते नहीं हैं
किसी और दिन इम्तिहान लेना
रक़ीबों की शमशीरें रुकती नहीं हैं
©सुनील_सोनी
© Sunil Soni
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें