शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

हमने तरक्की की नई राह ढूंढ ली है....


हमने तरक्की की नई राह ढूंढ ली है....

साक्षात्कार : केशव डम्भारे


केशव डम्भारे अभी ५४-५५ के हैं. २४ साल पहले जब नौसेना की नौकरी छोड़कर वे आपने गाँव पहुंचे तो पानी की विकराल समस्या से उनका आमना-सामना हुआ. तबसे वे लगातार अपने साथियों के साथ मिलाकर ग्राम-जल के पुनर्जीवन के लिये लड़ रहे हैं. वे विज्ञान में किसी कारण डिग्री पूरी नहीं कर पाए, पर ग्रामजीवन का विज्ञान उन्हें खूब आता है. उन्हें मालूम है कि किस रसायन में किस तत्त्व के मिलन से ऊर्जा निकलेगी और किस तत्त्व को मिलाने से विस्फोट होगा. वे फ़िलहाल वलनी गाँव के उपसरपंच हैं और राजनितिक-समाजकर्म ही उनकी जिंदगी का प्रमुख उद्देश्य है. राजनीति के सारे पैंतरे और दांव-पेंच उन्हें पता हैं, पर वे सार्वजानिक जीवन की शुचिता में विश्वास रखते हैं. जनता के जागरण पर उन्हें अगाध भरोसा है और यही कारण है कि वे गाँधी, विनोबा के रास्तों पर चलना चाहते हैं. उनके सब्र ने उनके राजनीतिक विरोधियों को भी उनका मित्र बना दिया और यह थाती उन्हें उनके पिता दिवंगत रामचन्द्रजी गणपतराव डम्भारे से मिली. उनके पिता कई सालों तक निर्विरोध गाँव के सरपंच थे. अब वे अपने राजनीतिक विरोधियों को भी निर्विरोध चुनवाने का माद्दा रखते हैं. वलनी में ग्राम तालाब का पुनर्जीवन और उसे ग्राम सम्पदा बनाना उनका लक्ष्य है. योगेश अनेजा और केशव डम्भारे एक गाड़ी के दो पहिये हैं, जो नए-नए प्रयोगों में दिलचस्पी रखते हैं. उनके प्रयोगों से ही गाँव इस मुकाम तक पहुँच गया है. उनसे सीधी बात करके इसे समझा जा सकेगा :

- आखिर ऐसा क्या हुआ कि गाँव लौट आए? 
-अपना गाँव सबसे अच्छा हो, हमेशा से मेरा सपना था. नौसेना छोड़कर यहाँ पहुंचा तो असलियत सामने आई कि हम कितने पिछड़े हैं. यहाँ पानी की भरी किल्लत थी. पशुओं के लिए चारा नहीं था. खेत सूखे थे और पैदावार अच्छी नहीं थी. लागत से आमदनी हमेशा कम थी. सीधे कारण थे - सिंचाई सुविधा का ना होना, मिट्टी की उर्वरता का नष्ट होना और उसे बढ़ाये जाने के प्रयास ना किये जाना आदि. मैंने इस मामले में जनजागरण करने का प्रयास किया और पहला काम तालाब को फिर से संवारना था. 

-मालगुजार इतना प्रभावी है और व्यवस्था भी आपके खिलाफ है, लेकिन आपकी इतनी लम्बी लड़ाई कभी टूटी नहीं?
-हम सत्याग्रही थे. हम कोई गलत काम नहीं कर रहे थे. हम आन्दोलन ऐसे करते थे कि मन, विचार और शरीर से कभी हिंसा ना हो. इसलिए हमारी ओर से उनको कभी मौका नहीं मिला. फिर भी हम सात लोगों को दलित प्रताड़ना कानून के झूठे मुक़दमे में फंसाया तो हम सच्चाई के कारण अंततः छूट गए. 

-तालाब की मिट्टी खेत में डालने का ख्याल कैसे आया?
-ये पुराना तरीका था. बड़े-बूढ़े बताते थे कि बेल वाली सब्जी लगनी हो तो तालाब की मिट्टी ले आओ. हर किसान साल में एक बार दो-चार बैलगाड़ी मिट्टी अपने खेत में डालता और टमाटर, मिर्ची, सेम, कद्दू, लौकी बो देता. पौधे आते तो उसे खेत में लगा देता. लेकिन जिस हिस्से में ये मिट्टी पड़ती, वहां होने वाला अन्न काफी स्वादिष्ट और अच्छा होता था. यहीं से ये ख्याल आया कि पूरे खेत में मिट्टी दल दी जाएगी तो पूरी फसल अच्छी हो जाएगी. ये बात सच साबित हुई. पैदावार बढ़ गई. फिर पानी बढ़ा तो इसमें और इजाफा हो गया. 

-आपने गाँव में क्या बदलते देखा?
-लोगों का जीवन स्तर सुधर गया. आमदनी अच्छी हो गई तो रहन-सहन, खाना-पीना, पढाई-लिखाई, सब चीजों का स्तर बढ़ गया. धड़धड़ पक्के घर बन गए.

-सिर्फ आर्थिक विकास हुआ या सामाजिक भी?
-हर स्तर पर प्रगति दिखती है. गाँव की शराब की दुकानें बंद हो गईं. लोगों का शराब पीना कम हो गया. महिलाओं के साथ मारपीट बंद हो गई. बच्चे कान्वेंट स्कूलों में पढ़ने लगे. लड़कियां पढ़ने लगीं. हर बच्ची स्कूल जाती है. लोगों में वैमनस्य कम हुआ है. यहाँ तक कि १२-१३ भूमि हीन परिवारों का जीवन स्तर भी बढ़ा है. उनमें से कुछ ने जमीन भी खरीद ली है. लोग अब खेत बेचने की बात नहीं करते. अब वे कहते हैं, हम अच्छे और हमारे खेत अच्छे. खेती के प्रति ये जो प्रेम बढ़ा है, वो सामाजिक तरक्की का द्योतक है. 

-कुछ कमी रह गई? 
-हाँ. अभी भी तालाब हासिल करना बाकी है. हम नागपुर जिले के एकमात्र आदर्श गाँव हैं, पर यहाँ अब भी दो घरों में संडास (शौचालय) नहीं हैं. वे खुले में दिशा मैदान जाते हैं. लेकिन धीरे-धीरे परिवर्तन की हवा चल रही है. वो गति पकड़ेगी तो देश बदल जायेगा. हमने तरक्की की नई राह ढूंढ ली है.


-सुनील सोनी 

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कविता : सुनील  स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी