#Festival लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
#Festival लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 24 मई 2016

दि सिनेमा ट्रैवलर्स के माथे पर ताज

‘दि सिनेमा ट्रैवलर्स’ के माथे पर ताज

शर्ली अब्राहम
अंतत: 2016 का कान्स फिल्म मेला भारत के लिहाज से खाली नहीं गया. भारत, खासकर महाराष्ट्र में टूरिंग टॉकीज यानी तंबू में प्रोजेक्टर के जरिए दिखाई जानेवाली फिल्मों को लेकर बनी शर्ली अब्राहम और अमित मधेशिया की डॉक्युमेंटरी ‘दि सिनेमा ट्रैवलर्स’ को ‘ल वील डि’ओ’ अवार्ड से नवाजा गया.

79 वर्षीय ब्रिटिश निर्देशक केन लोच की फिल्म ‘आई, डैनियल ब्लैक’ ने सर्वश्रेष्ठ फिल्म का ‘पाम डि’ओ’ जीता. वे 2006 में ‘द विंड दैट शेक्स द बार्ली’ के लिए यह प्रतिष्ठित पुरस्कार पा चुके हैं. ‘आई, डैनियल ब्लैक’  न्यूकैसल के प्रौढ़ विधुर को हार्टअटैक आने के बाद ब्रिटेन की जनकल्याण से नाउम्मीदी और समस्याओं की कहानी है. लोच का नया प्रोजेक्ट मशहूर फिल्मी हस्तियों आल्फ जोबर्ग, फ्रांसिस फोर्ड कपोला, बिले अगस्त, दि दार्देन ब्रदर्स, एमिर कुस्तुरिका, शोहेई इमामुरा और माइकल हनेके के साथ होगा.
अमित मधेशिया
फिलिपीन्स की जैकलीन जोस निर्देशक ‘ब्रिलैंट मैंडोजा की ‘मा रोसा’ में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री ठहरीं.  ब्रिटेन की एंड्रिया अर्नाल्ड की ‘अमेरिकन हनी’ को जूरी अवार्ड मिला, जबकि रोमानियाई डायरेक्टर क्रिश्चियन मुनग्यू ने फ्रांसीसी डायरेक्टर ऑलिवर असायस के साथ बेस्ट डायरेक्शन का अवार्ड पाया. ईरानी निर्देशक असगर फरहादी की फिल्म ‘फरोशांद’ (दि सेल्समैन’) ने सर्वश्रेष्ठ स्क्रीनप्ले और सर्वश्रेष्ठ अभिनेता (शाहाब हुसैनी) के अवार्ड जीते. शॉर्ट फिल्म का पॉम डि’ओ जुआनजो गिमेनेज को मिला, जबकि ज्यूरी की ओर से विशेष प्रशस्ति जाओ पॉला मिरांडा मारिया की अ मोक कुई डांसकू कॉम ओ डियाबो (दि गर्ल हू डांस विद दि डेविल) को मिला. कैमेरा डि’ओ ‘डिवाइंस’ के लिए हॉडा बेनयामिना को मिला. 

रविवार, 22 मई 2016

ये भारत भी कान्स में था मौजूद

कान्स फिल्म मेला 2016 

ये भारत भी कान्स में था मौजूद...


-सुनील सोनी

यही है वो ऐश्वर्य की बहुचर्चित लिपस्टिक 
मौजूदा वक्त में दुनिया में जितनी भी लुभावनी चीजें हैं, उनमें से सबसे रसदार है फ्रांस के कान्स में चल रहा 69वां विश्व कान्स फिल्म मेला 2016.
यह ऐसी जगह है, जहां सिनेमा जगत से जुड़ी दुनियाभर की तमाम हस्तियां हाजिरी लगाती हैं. यूं, यह फिल्म मेला यूरोप और अमेरिका को ही तरजीह देता है, पर अफ्रीका और एशिया के लिए भी वहां थोड़ी बहुत जगह होती है. खासतौर पर उन सिनेकृतियों के लिए, जिन्हें आम तौर पर उनके अपने देशों में भी लोक तक पहुंचाने के लिए भीषण मशक्कत और दुश्वारियों से गुजरना पड़ता है.

सोनम कपूर 
कान्स फिल्म मेले को भारतीय मूलत: कला की इस विधा के कलात्मक आकलन के लिए नहीं जानते. वे उसे जानते हैं ऐश्वर्या राय से लेकर विद्या बालन, ऋचा चड्ढा, सोनम कपूर और मलिका सहरावत तक के रेड कॉरपेट पर चलने को लेकर. इस बार भी भारतीय सौंदर्यमूर्तियां मेले में मौजूद रहीं. अनुराग कश्यप जैसे बहुचर्चित अभिनेता भी ‘रमन राघव 2.0’ जैसी फिल्मों को लेकर वहां पहुंचे. लेकिन, इस बार उन सबका कान्स फिल्म मेले की आधिकारिक प्रविष्टियों से लेना-देना नहीं था. वे किसी न किसी तौर पर आमंत्रित या अतिथि थे, बस.

मंटो फ्रांस में..
अचरज यह है कि नंदिता दास सआदत हसन ‘मंटो’ को लेकर कान्स हो आती हैं, पर बहुत लोगों को पता नहीं चलता.

ये हैं प्रातिनिधिक ‘भारतीय’ फिल्में


केवल नंदिता नहीं हैं, जिनकी चर्चा भारतीय सिने संसार में उस तरह नहीं हो रही है, जैसी होनी चाहिए, क्योंकि दरअसल कान्स में भारतीय उपमहाद्वीप की प्रातिनिधिक फिल्में तो यही हैं.  इन फिल्मों में ‘गुढ़’, ‘दि सिनेमा ट्रैवलर्स’, ‘अ येलो बर्ड’ और ‘जागो हुआ सवेरा’ हैं. इनमें से पहली दो तो भारतीय हैं, पर शेष दो सिंगापुरी और पाकिस्तानी हैं.




चलिए जानते हैं उनके बारे में : 

गुढ़ यानी घोंसला

गुढ़  का एक दृश्य
इस बंगाली फिल्म का निर्देशन सौरभ राय ने किया है, जो सत्यजीत राय फिल्म संस्थान के छात्र रहे हैं. 2015 की यह फिल्म 28 मिनट की है. यह एक बच्चे अजय की कहानी है, जिसके मार्फत बचपन की वो यादें ताजा होती हैं, जिनसे हर कोई गुजरता है. वे हमारी स्मृतियों के ऐसे धुंधले क्षण होते हैं, जिनसे नाता जोड़ने में बड़ी कठिनाई होती है, क्योंकि हम बड़े हो चुके हैं.  यह अजय के बचपन, उसकी मां, गांव और उसमें जारी क्रांति और उससे होनेवाले परिवर्तनों के प्रति उसके लगाव की कहानी है. उसे कान्स मेले के ‘सिने फाउंडेशन’ खंड में जगह मिली.


दि सिनेमा ट्रैवलर्स 

यह मूलत: 1:36 घंटे की डॉक्युमेंटरी है, जिसके निर्माता-निर्देशक शिरले अब्राहम और अमित मधेशिया हैं. इसे बनाने में उन्होंने तकरीबन 5 साल लगाए. जिन्होंने इस फिल्म को भारत की केव पिक्चर्स के मार्फत प्रस्तुत किया है. उसे कान्स के ‘क्लासिक’ खंड में ‘डॉक्युमेंटरी एबाउट सिनेमा’ कॉलम के तहत जगह मिली. यह भारत के गांव-कस्बों में मशहूर टूरिंग टॉकीज की कथा है, जो तकनीकी, सांख्यिक और जटिल परिवर्तनों के बावजूद लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है. इसमें एक प्रोजेक्टर मरम्मत करनेवाला सूत्रधार है और उसे कविता, दर्शन तथा यथार्थवाद के मार्फत पेश करता है.


जागो हुआ सवेरा / फैज़ अहमद फैज़ की पटकथा 

जागो हुआ सवेरा का पोस्टर, जिसमें फैज़ का नाम है. 
यह 1:34 घंटे की ऐसी
पाकिस्तानी फिल्म है, जिसका अस्तित्व समाप्तप्राय: था. लेकिन, उसे पुनर्निर्मित किया गया और कान्स ने पुनर्निर्माण वाले खंड में उसे जगह दी. यह जानना बड़ा दिलचस्प है कि हिंदी नामवाली यह फिल्म आखिर पाकिस्तान की क्यों है?
तो जानिए कि यह फिल्म जब बनी तो पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) पाकिस्तान का हिस्सा था. बांग्लादेश के मछुआरों की जिंदगी पर बनी इस फिल्म के निर्देशक ए.जे. कारदार हैं, जबकि  संगीतकार तिमिर बरन और कहानीकार माणिक बंदोपाध्याय हैं. उसकी पटकथा खुद कारदार ने विश्वविख्यात शायर फैज अहमद फैज के साथ मिलकर लिखी. उसके कलाकारों में : खान अताउर रहमान, तृप्ति मित्र, मैना लतीफ, काजी खालिक, मोयना, जुरीन रक्षी, रोक्सी, रिजवान, नसीमा जैसे पुराने जमाने के कलाकार थे.  1958 में बनी और और 25 मई 1959 रिलीज हुई इस फिल्म को कान्स फिल्म मेले में नौमान तासीर फाउंडेशन ने पेश किया. चूंकि उसके निगेटिव गुम हो गए थे, इसलिए छाया और आवाज का पुनरुद्धार लंदन में डीलक्स रिस्टोरेशन में किया गया है. इस फाउंडेशन को अंजुम तासीर ने स्थापित किया है.


ए  येलो  बर्ड का पोस्टर 

ए येलो बर्ड 

सिंगापुर में रहनेवाले भारतवंशी के. राजगोपाल की 1:52 घंटे की इस फिल्म का वर्ल्ड प्रीमियर कान्स फिल्म मेले में हुआ, पर उसका सबसे बड़ा आकर्षण भारतीय अभिनेत्री सीमा बिस्वास थीं. शिव नामक एक कैदी की पत्नी और बेटी को ढूंढने की यह करुणामयी कहानी ‘यथार्थवादी’ यानी रियलिस्टिक सिनेमा की तर्ज पर कही गई है. हालांकि, कान्स के सिने फाउंडेशन खंड में भी उसका चयन किया गया था.



भारत कान्स में 

बहरहाल, एक नजर इस पर भी डालें कि भारत का कान्स में क्या इतिहास रहा है : 

1.
चेतन आनंद की ‘नीचा नगर’
1946 पॉम डि ओ (गोल्डन पाम) जीता
2.
वी. शांता राम की ‘आमार भूपाली’
1952, उत्कृष्ट साउंड रिकॉर्डिग
3.
विमल राय की दो बीघा जमीन
1954 अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार
4.
सत्यजीत राय की ‘पथेर पांचाली’
1956, पॉम डि ओ
सत्यजीत राय की फिल्म पथेर पांचाली का डाक टिकट 
5.
मृणाल सेन की ‘खारिज’
1983, स्पेशल जूरी पुरस्कार
6.
मीरा नायर की ‘सलाम बॉम्बे’
1988, कैमेरा डि ओ
7.
मुरली नायर की ‘मरण सिंहासनम्’
1999, कैमरा डि ओ पॉम डि ओर
8.
1948 में बनी उदय शंकर (गुरुदत्त के बड़े भाई) की ‘कल्पना’ को मार्टिन स्कोरसिसी के वर्ल्ड सिनेमा फाउंडेशन ने 2010 में रिस्टोर किया और 2012 में उसे कान्स में दिखाया गया.
9.
2010 में विक्रमादित्य मोटवानी की फिल्म ‘उड़ान’ ऐसी पहली हिंदी फिल्म थी, जो ‘अनसर्टन रिगार्ड’ खंड में दिखाई गई.
10.
2011 में श्रीलंकाई निर्देशक विमुक्ति जयसुंदर की बंगाली फिल्म ‘छत्रक’ ने डायरेक्टर्स फॉर्टनाइट खंड में स्टैंडिंग ओवेशन पाया.
11.
2012 में असीम अहलुवालिया की ‘मिस लवली’ और अनुराग कश्यप की ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के दो खंड दिखाए गए. तीनों में नवाजुद्दीन सिद्दीकी प्रमुख भूमिका में थे.


दिवाली की शुभकामनाएं

कविता : सुनील  स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी