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शनिवार, 31 अक्टूबर 2015

औजार

सियासी हलकों में तूफान के किस्से आजकल आम हैं. भगवा अश्वमेध को चुनौती देते साहित्यकार, इतिहासकार, फिल्मकार त्यागपत्रों से शरसंधान में जुटे हैं. विज्ञानवेत्ता देर से सही, इस औजार को अपनाने लगे हैं.


निशाने सटीक हैं. प्रतिरोध के स्वर काम कर रहे हैं और स्वाभाविक ढंग से प्रतिक्रियाएं तीखेपन से भद्देपन और अश्लीलता की ओर बढ़ रही हैं. प्रतिक्रियावादियों को जाननेवाले इसे पुराना ढर्रा ही कहेंगे. भारत में 2014 में जन्मे भगवा सियासी उभार की पृष्ठभूमि में यह अवश्यंभावी डर सच में तब्दील होने की प्रक्रिया में है कि संस्थानों और संगठनों को वैचारिक कत्लगाहों में तब्दील करके दक्षिणपंथी राह ही खुली रखी जाएगी.

विहंग दृष्टि से निरपेक्ष कुछ होता हो, तो यूं समझ बनती है कि भारत और भारतीयता के प्रगतिशील बौद्धिक उध्र्वगमन से निश्चिंत ऊंघते हरकारे अनमने से उठ बैठे हैं. निश्चय ही समक्ष दिशादुर्गम्य रण विशाल है. सो, चिड़चिड़ाहट में सहीं, बिना रणनीति यह लक्ष्य साधा है. सवाल उठेगा ही कि अगला कदम क्या होगा? कैसे सधेगा और किसलिए?








हत्यारे निकल पड़े हैं मांदों से

भूख बहुत ज्यादा है

और तुम्हारे औजार भी बोथरे हैं

उनके सुनहरे चश्मे भी

अतीत की तरह

भविष्य को

कत्लगाहों में लाने से रोक नहीं सकते

खून बहते-बहते पड़ जाएगा काला

तब चढ़ेगा नया मुलम्मा

तब तक

जब तक

भविष्य भी हो

अतीत जैसा सुनहरा

दिवाली की शुभकामनाएं

कविता : सुनील  स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी