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शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

ये ना थी हमारी किस्मत कि विसाल ए यार होता..

ये न थी हमारी किस्मत...  

फिल्म विश्लेषण : सात खून माफ़


निर्देशक/ संगीतकार : विशाल भारद्वाज


निश्चय ही 'सात खून माफ़' एक ऐसी फिल्म है, जो आपको राहत देती है कि आप अकेले ही नहीं हैं, जो जिंदगी में चाही-अनचाही घुसपैठों को भुगत रहे हैं. आपकी जिन्दगी में दाखिल लोग, जिनके मुखौटे उतरने  पर दुनिया के तमाम असौंदर्य और अधैर्य का अहसास होता है, सारी चीजों को बंजर बना चुके होते हैं. तब आप एक फैसला लेते हैं, उन्हें जिन्दगी  और दुनिया से खारिज करने का. अधीरता में ही सही, निर्णय का यही चरम संभवतः जीवन की दुश्वारियों के बीच से पगडंडियाँ  बनाता है. रस्किन बांड की लघुकथा  'सुजेना'ज सेवेन हसबैंड' पर आधारित इस फिल्म में विशाल भारद्वाज ने  बड़ी सफाई से पुरुष प्रधान समाज की बखिया उधेड़ी है. पहली नज़र में सुजेना का चरित्र आपको 'निम्फो-मेनियक'  दिखाई पड़ सकता है, पर ऐसा है नहीं. असली प्यार की तलाश सुजेना को कहाँ नहीं ले जाती, पर हर बार पैकिंग के चमकदार रैपर उतरते ही बदसूरती अपनी सारी भयावहता और सड़ांध के साथ ऐन मुंह के सामने आ खड़ी होती है. वास्तव में ये सुजेना और उसके रिश्तों की पड़ताल नहीं है; ये समाज के बहुस्तरीय अस्तरों में छिपे सच की खुरचन है.

यह एक खूबसूरत एंग्लो-इंडियन युवती सुजेना ऐना मेरी जोहानिस उर्फ़ साहेब की कथा है. फिल्म में यह किरदार प्रियंका चोपड़ा ने निभाया है. बचपन में है माँ के साए से महरूम हो गई सुजेना फिर से वही स्नेह पाना चाहती है. सच्चा प्रेम पाने के लिये एक के बाद एक, सात शादियाँ करती है, पर प्यार की जगह धोखा खाती है. छह पतियों का  क़त्ल  करती है और सातवाँ खून खुद अपनी शिनाख्त मिटाकर करती है. फिल्म में फोरेंसिक डॉक्टर अरुण (विवान शाह)  अपनी पत्नी नंदनी (कंकणा सेन शर्मा)  सुजेना की कथा कहता है, जो उसे देखते और चाहते हुए बड़ा हुआ है. सुजेना का पहला पति एडविन रोड्रिक्स (नील नितिन मुकेश) सेना का एक लंगड़ा मेजर है, जो बेहद क्रूर है और बीवी को सिर्फ भोग्य और संपत्ति समझता है. सुजेना के स्वाभिमान को चोट पहुंचाकर तृप्ति पाने वाले मेजर को सुजेना आदमखोर शेर का निवाला बनवा देती है. फिर उसकी जिंदगी में जमशेद सिंह राठोड़ (जॉन अब्राहम) आता है, जिसे सिर्फ उसके पैसे से मतलब है. ड्रग्स, लड़कियां, संगीत चोरी से निपटते निपटते सुजेना उसे अंततः हेरोइन ओवरडोज से मुक्ति दिलवा देती है. तीसरा शौहर वसीउल्लाह खान (इरफ़ान)  अच्छा शायर है, पर बिस्तर पर बेरहम जल्लाद. उसे जीते-जी कब्र नसीब होती है. चौथा शौहर रूसी जासूस निकोलाई वेरोंसकी (अलेक्जेंद्र दायचेंको) दोहरी जिंदगी जी रहा है. सुजेना इस छल को नहीं बख्शती. पांचवां पति कीमतीलाल (अन्नू कपूर ) उसके जिस्म का दीवाना है और कुछ जरा जल्दी ही वियाग्रा का ओवरडोज खाकर मरता है. छठा हसबैंड डॉ. मधुसूदन तरफदार (नसीरूदीन शाह ) उसकी संपत्ति हड़पने का भेद खुलने पर मारा जाता है. इन पूरे चक्करों में सुजेना ना केवल यह समझ गई है कि खूबसूरत जिस्म का इस्तेमाल कैसे किया जाये, पर यह भूल भी गई है कि सिर्फ जिस्म ही मंजिल नहीं है. इसलिए वह जब नौजवान हो चुके अरुण को पाना चाहती है, तो वह इंकार कर देता है. उसका दिल फिर एकबार टूटता है, पर उसे परिणति पर पहुँचने का सबक भी देता है. पूरी फिल्म का दूसरा भाग ही ज्यादा तेज घटनाक्रमों से भरा है, जहाँ फ्लैशबैक और वर्तमान एक जगह आकर मिलते भी हैं. खुद रस्किन बांड का एक किरदार में होना अच्छा महसूस करता है. यह फिल्म आपको सुकून का अहसास नहीं करने देती, क्योंकि सुजेना को भी चैन नहीं है. लेकिन, आप खुद को उसके करीब पाते हैं. वह आपकी रूह में सुरसुरी पैदा करती है. 

प्रियंका ने सुजेना के चरित्र को जीने में जी-जान लगा दी है और केंद्रीय पात्र का आभामंडल इतना असरदार है कि अरुण के अलावा बाकी सब किरदार गौण लगते हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि उनका अभिनय कमतर है. हर कोई अपनी कहानी चलने तक बेहद प्रभावी हैं. यहाँ तक कि नील नितिन मुकेश और जॉन भी. नसीर और इरफ़ान अपनी टाईप्ड छवि के मारे हैं, पर ठीक हैं. अन्नू कपूर किरदार के अनुकूल हैं, और उषा उत्थुप तो पहली बार पता चला कि अदाकारा भी हैं. एक डार्क फिल्म में सिनेमेटोग्राफी कितनी प्रभावोत्पादक होनी चाहिए, यह रंजन पंडित ने दिखाया है.  

संगीत का जिक्र किये बगैर फिल्म पूरी नहीं हो सकती. फिल्म का काल और कैनवास काफी बड़ा है, इसलिए संगीतकार के रूप में विशाल ने कई प्रयोग किये है, जो अच्छे हैं. रूसी लोकगीत का प्रयोग भी. गुलज़ार हैं ही. उषा उत्थुप और रेखा भारद्वाज आवाज के जरिये फिल्म में कई रंग भरती हैं. पता नहीं क्यों, सुरेश वाडेकर का 'तेरे लिये' एल्बम में होने के बावजूद फिल्म से गायब है. बैकग्राउंड स्कोर बढ़िया है और कथा को सहारा देने में कामयाब है. 

विशाल की किस्सागोई पिछली फिल्मों में अच्छी रही है, पर यहाँ वे कुछ कथा कहने के तरीके को लेकर असमंजस में दिखाई देते हैं. वैसे भी, इतनी सपाट; पर परतदार कथा को कहना खेल नहीं. शायद यही कारण होगा कि पटकथा लिखने के लिये उन्हें विदेशी पटकथाकार की मदद लेनी पड़ी. यह भी कहना होगा कि निर्देशक, संपादन के स्तर पर भी चूक गया. फिल्म संपादक ए. श्रीकर प्रसाद ने अपना काम किया है, पर उन्हें निर्देशक की ओर से वह मदद नहीं मिली, जो फिल्म में कसाव ले आती. एक बात और... विशाल अपने गुरु गुलज़ार का फ्लैशबैक का जुनून समझ तो गए, पर इस हुनर में उतनी सफाई नहीं ला पाए हैं. नतीजा यह कि फिल्म की लय और गत बिगड़ गई. बहस इस पर भी हो सकती है कि क्या निर्देशक के पास खुद कथा कहने का माद्दा नहीं था, जो सूत्रधार और कथा-कथन का सहारा लेना पड़ा? निर्देशक की इससे बड़ी कमजोरी और क्या होगी? 

इसके बावजूद प्रयोगधर्मी विशाल को सराहे बगैर नहीं रहा जा सकता. 

सुनील सोनी 

दिवाली की शुभकामनाएं

कविता : सुनील  स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी