दरवाज़ों के ऊपर जो रौशनदान हैं
उन्हें खुला रखना
खिड़कियों से झाँकने वालों से डरकर
लगाना मत परदा
छत से आसमान दिखता रहे
ऐसा इंतेज़ाम करना
धूप तुम्हें पुचकार कर उठाए
इतना ध्यान रखना
झोंके इधर से चलें और उधर से जाएं
खुले में इतने रहना
बारिशों के छींटे चाय की मेज पर पड़ें
अथवा
झूले पर बैठकर चाय पीते हुए तुम्हें भिगोएं
ये ख़्याल रखना
शहर में इतना गुम न होते चले जाना
जैसे तुम शहर बन जाओ
मिट्टी पर कभी कभी नंगे पाँव
चल लिया करना
सब स्मृतियां मिट्टी से बनी हैं
© SuneilSoni
©सुनील_सोनी
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें