हिकायत को न हिक़ारत से देखें हुज़ूर
ये हमारी है, उनकी भी है, दुनिया की भी है
लहू हमारे ज़ख्मों से ठहरता क्यों नहीं
सज़ा हमारी है, उनकी भी, दुनिया की भी है
सुनाते-सुनाते रोते जाते हैं बरबस
रंज हमारा उनका भी, दुनिया का भी है
मिसाल दूँ या ज़िक्र रंजिश में छोड़ दूँ
कहानी उन तक मेरी, दुनिया तक भी है
मुमकिन है एक ही वक़्त साथ हों तन्हा भी
तक़ाज़ा मेरा उनका भी है, दुनिया का भी
©सुनील_सोनी
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