सोमवार, 4 जनवरी 2021

हम (ग़ज़ल 10)

 

छोर पर ज़माने के कबसे टिके हुए हैं
दोस्ती के बूते ही दुनिया में ठहरे हुए हैं

मिलते नहीं हैं जो, फिर भी मिल ही जाते हैं
हासिल हैं सारे जो, दुआएँ उनकी बड़ी हैं

बुलंदी पर यूँ तो शौहरत के मकाम हैं
यारों की सोहबत में न्यौछावर तमाम हैं

फ़िक्र बिखरी हुई पड़ी धूप सी आसपास
शुक्र है यारियां उसमें ठिठकी सी पड़ी हैं

रक़ाबत पुरज़ोर कभी इश्क़ की गली में
यारो को ग़ैर से हारें वो बुज़दिल नहीं हैं

©SuneilSoni

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दिवाली की शुभकामनाएं

कविता : सुनील  स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी