सरे शाम धूप खिल रही है बेकायदा
रात धीरे-धीरे तेरी हँसी बन रही है
बू ए गुल का सफर सांस तक बेक़ायदा
सुबह धीरे-धीरे तेरी सदा बन रही है
नज़र के निशां पर जिरह बेक़ायदा
आहें तेरी मेरी दास्तां कह रही हैं
दुपहरी में आँसू बरसते बेक़ायदा
नैनों से बदली तेरे कहीं खो रही है
भोर तक न सोने के बहाने बेक़ायदा
नींद धीरे-धीरे तिरी गहरी हो चली है
परछाइयों की मासूमियत बेक़ायदा
हर वक़्त पीछे तिरे बस चल रही हैं
©सुनील_सोनी
© Sunil Soni
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