ख़ुद से नाराज़ होता हूँ
तो बरस पड़ता हूँ औरों पर
सवाल ख़ुद से करता हूँ
जवाब तलब करता हूँ औरों से
तमन्नाएं रोज़ जोड़ते जाता हूँ
उम्मीद लगा लेता हूँ औरों से
बोझ से अपने दबा रह जाता हूँ
मंज़िलों पर रश्क़ करता हूँ औरों से
होश ठिकाने नहीं होते हैं मेरे
बेहोशी के इल्ज़ाम पाता हूँ औरों से
दिल के फ़रेब यूँ ताड़ जाता हूँ
वफ़ा का फ़न सीख जाता हूँ औरों से
©suneilsoni
©सुनील_सोनी
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें