शनिवार, 4 जून 2016

प्रेम

प्रेम तुम चिरैया हो
या खेत
नहीं; तुम पानी हो
जो आसमान से बरसता है
या बहता है किसी नदी से
और बरसता है झरने से
हरेक लम्हा तुम हो
हर कण भी
इसलिए धूल में लोटा हूँ मैं
क्योंकि मैं न रहूँ
यकीन तुम ही हो
और
संदेह तक
कहना
या
न कहना
क्षितिज से मिलती धरती
तुम्हारा होना है
तुम हो वहाँ
जहाँ नहीं हो
मैं भी तुम
तुम मैं हूँ
हर तरफ

-सुनील सोनी 03/06/2016

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दिवाली की शुभकामनाएं

कविता : सुनील  स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी