सोमवार, 4 जनवरी 2021

कहता हूँ (नज़्म )

 गली से गुज़रता हूँ रोज़

होती है तो नहीं देखता

नहीं होती वो तो

खोजता हूँ मैं


सूरत कोई नहीं

एहसास सा है

नहीं होता महसूस

तो रोज़ मरता हूँ मैं


अज़ब ढंग हैं

निराले दस्तूर

इश्क़ मुक़्क़मल हो तो

दास्तानें नहीं बनतीं


जी हुज़ूर कह दें

मन में घुलता है शहद

शायद अरमानों में

कोई बादशाह बैठा है


अंधेरे रोशनी हमदम हैं

बिछड़ते रूठते रहते हैं


बारिश

 

बारिश

घर खाली है तुम बिन
खेत नम नहीं रहे
नदियों का पानी सूख रहा है
तालाब खाली हो चले हैं
मेरे घर का कुआं भी नहीं बचेगा
आँसू भी कम निकले इस बार
इससे पहले कि
मर जाए आँखों का पानी
बारिश का आना ज़रूरी है

© सुनील सोनी

तू भी, तू ही (ग़ज़ल 14)

 तू भी, तू ही


इस फ़साने में जहाँ भी तेरा नाम होगा

शक़ नहीं वहीं मेरे दिल का मुकाम होगा


फरिश्तों ने भी आज़माए हैं अमल सारे

गुजरेगी तू जहाँ से वहीं मेरा नाम होगा


सवालों के जो भी निकलेंगे सफे

देखना जवाबों में मेरा नाम होगा


कोई कह दे बिगड़ा तो मान लूंगा

नशा भी तेरा है, तेरा ही नाम लूंगा


बहुत दूर हैं गलियां दिल की तेरे बिन

जिस तरफ निकलूंगा, तेरा नाम लूंगा


बहुत दूर हैं गलियां दिल की तेरे बिन

जिस तरफ निकलूंगा, तेरा नाम लूंगा


पनाहों में तेरी दिल तभी रख दिया था

छोड़ूंगा जब भी दुनिया तेरा नाम लूंगा


हर शहर तेरा हर बसर तेरा

जब भी बसूँगा तेरा नाम लूंगा


इबादत के बाज़ार मुमकिन नहीं हैं

पढूंगा दुआ किसी दिन तो तेरा नाम लूंगा


सतह पर सितारों की जाकर हो बैठे

चाँद शिकवा करेगा तो तेरा नाम लूंगा


©सुनील_सोनी

©Sunil Soni


तुझ तक (ग़ज़ल 13)

 


सरे शाम धूप खिल रही है बेकायदा

रात धीरे-धीरे तेरी हँसी बन रही है


बू ए गुल का सफर सांस तक बेक़ायदा

सुबह धीरे-धीरे तेरी सदा बन रही है


नज़र के निशां पर जिरह बेक़ायदा

आहें तेरी मेरी दास्तां कह रही हैं


दुपहरी में आँसू बरसते बेक़ायदा

नैनों से बदली तेरे कहीं खो रही है


भोर तक न सोने के बहाने बेक़ायदा

नींद धीरे-धीरे तिरी गहरी हो चली है


परछाइयों की मासूमियत बेक़ायदा

हर वक़्त पीछे तिरे बस चल रही हैं


©सुनील_सोनी

© Sunil Soni

सपना (नज़्म)


शिद्दत पूरी उसके जैसी है

बड़ी गहरी है सँकरी है


धार है आरपार है

तेज है गुनगुनाहट सी

सवार है सिर पर उसके जैसी ही



व्याकरण उसका समझ नहीँ आता

भाषा उसकी भी मेरे जैसी है


सड़कों पर बिछे हैं नज़र के अरमाँ

मंजरों की महफ़िल में पर हम नहीं हैं


 कहते कहते थकते नहीं, सुनो तो

तराने तमन्नाओं के बुझते नहीं हैं


किसी और दिन इम्तिहान लेना

रक़ीबों की शमशीरें रुकती नहीं हैं

©सुनील_सोनी

© Sunil Soni

नहीं था मन मेरा (ग़ज़ल 12)

 


बेझिझक जिस तरह चली आई थी
बेझिझक उस तरह चली जाए भी

बहुत भोली है वो, रुकती भी नहीं
इतराई सी शरमाई सी हरजाई सी

बचपन भरी आँखें चंचल सी नहीं
बेपरवाह हैं मुझसे, कुछ सुस्ताई सी

मेरा मुक़द्दर कहाँ खींच लाया मुझको
सुबह सुबह देखा उसको अलसाई सी

लटें सुलझाती हुई कभी बिखराती हुई
सुबह सुबह देखा उसको अलसाई हुई

बसंत में अमराई सी कुछ कुछ बौराई भी
कुछ कुछ अपनी सी कुछ कुछ पराई भी

धड़कनें धीमी नहीं पड़ती मेरी
आ जाती है वो थोड़ी सकुचाई हुई

© Sunil Soni

तस्वीर (ग़ज़ल 11)

 जो पगडंडियाँ आसमां से लौटी हैं

बहुत तन्हा हैं, बड़ी सूखी-सूखी हैं

रहने दो अभी, बरसेंगे तो दिख जाएंगे
बादलों ने ग़म की खेती में कुछ देर की है

घुमड़ आए हैं खूब, घने भी अच्छे हैं
अम्बर की झोली खुलने में जरा सी देरी है

कितनी मायूस है, बिछड़कर उससे जो
उदास है हवा, फिर भी बहकी-बहकी है

कभी आएंगे और, तो बाज़ी जीत लेंगे
खेल बाक़ी है, पर खेत होने का जी है

भरम जब भी बनेंगे, खूबसूरत होंगे
सच के दरिया में क्या डूबना ज़रूरी है

© Sunil Soni

©सुनील_सोनी

दिवाली की शुभकामनाएं

कविता : सुनील  स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी