साये के साथ
रंग हैं नहीं
जो छोड़ता कभी कहीं
कब कहाँ जाएंगे नहीं
वहीं कहीं नहीं सही
यहीं अभी सही यही
हमसफ़र सफ़र में नहीं
साया कभी साया नहीं
रंग सुर्ख़ सुर्खी में नहीं
लहू छलक आया नहीं
©सुनील_सोनी
©SuneilSoni
समाज का सबसे बड़ा सरोकार यानी प्रेम छीजता जा रहा है. लिहाजा, मेरी कविताओं में आपको प्रेम ही केंद्रबिंदु नज़र आएगा. मेरे और दो प्रिय विषय हैं : पहला सिनेमा और समाज; और दूसरा राजनीति के मार्फत समाज और समाज के मार्फत जन.
साये के साथ
रंग हैं नहीं
जो छोड़ता कभी कहीं
कब कहाँ जाएंगे नहीं
वहीं कहीं नहीं सही
यहीं अभी सही यही
हमसफ़र सफ़र में नहीं
साया कभी साया नहीं
रंग सुर्ख़ सुर्खी में नहीं
लहू छलक आया नहीं
©सुनील_सोनी
©SuneilSoni
गली से गुज़रता हूँ रोज़
होती है तो नहीं देखता
नहीं होती वो तो
खोजता हूँ मैं
सूरत कोई नहीं
एहसास सा है
नहीं होता महसूस
तो रोज़ मरता हूँ मैं
अज़ब ढंग हैं
निराले दस्तूर
इश्क़ मुक़्क़मल हो तो
दास्तानें नहीं बनतीं
जी हुज़ूर कह दें
मन में घुलता है शहद
शायद अरमानों में
कोई बादशाह बैठा है
अंधेरे रोशनी हमदम हैं
बिछड़ते रूठते रहते हैं
बारिश
घर खाली है तुम बिन
खेत नम नहीं रहे
नदियों का पानी सूख रहा है
तालाब खाली हो चले हैं
मेरे घर का कुआं भी नहीं बचेगा
आँसू भी कम निकले इस बार
इससे पहले कि
मर जाए आँखों का पानी
बारिश का आना ज़रूरी है
© सुनील सोनी
तू भी, तू ही
इस फ़साने में जहाँ भी तेरा नाम होगा
शक़ नहीं वहीं मेरे दिल का मुकाम होगा
फरिश्तों ने भी आज़माए हैं अमल सारे
गुजरेगी तू जहाँ से वहीं मेरा नाम होगा
सवालों के जो भी निकलेंगे सफे
देखना जवाबों में मेरा नाम होगा
कोई कह दे बिगड़ा तो मान लूंगा
नशा भी तेरा है, तेरा ही नाम लूंगा
बहुत दूर हैं गलियां दिल की तेरे बिन
जिस तरफ निकलूंगा, तेरा नाम लूंगा
बहुत दूर हैं गलियां दिल की तेरे बिन
जिस तरफ निकलूंगा, तेरा नाम लूंगा
पनाहों में तेरी दिल तभी रख दिया था
छोड़ूंगा जब भी दुनिया तेरा नाम लूंगा
हर शहर तेरा हर बसर तेरा
जब भी बसूँगा तेरा नाम लूंगा
इबादत के बाज़ार मुमकिन नहीं हैं
पढूंगा दुआ किसी दिन तो तेरा नाम लूंगा
सतह पर सितारों की जाकर हो बैठे
चाँद शिकवा करेगा तो तेरा नाम लूंगा
©सुनील_सोनी
©Sunil Soni
सरे शाम धूप खिल रही है बेकायदा
रात धीरे-धीरे तेरी हँसी बन रही है
बू ए गुल का सफर सांस तक बेक़ायदा
सुबह धीरे-धीरे तेरी सदा बन रही है
नज़र के निशां पर जिरह बेक़ायदा
आहें तेरी मेरी दास्तां कह रही हैं
दुपहरी में आँसू बरसते बेक़ायदा
नैनों से बदली तेरे कहीं खो रही है
भोर तक न सोने के बहाने बेक़ायदा
नींद धीरे-धीरे तिरी गहरी हो चली है
परछाइयों की मासूमियत बेक़ायदा
हर वक़्त पीछे तिरे बस चल रही हैं
©सुनील_सोनी
© Sunil Soni
शिद्दत पूरी उसके जैसी है
बड़ी गहरी है सँकरी है
धार है आरपार है
तेज है गुनगुनाहट सी
सवार है सिर पर उसके जैसी ही
व्याकरण उसका समझ नहीँ आता
भाषा उसकी भी मेरे जैसी है
सड़कों पर बिछे हैं नज़र के अरमाँ
मंजरों की महफ़िल में पर हम नहीं हैं
कहते कहते थकते नहीं, सुनो तो
तराने तमन्नाओं के बुझते नहीं हैं
किसी और दिन इम्तिहान लेना
रक़ीबों की शमशीरें रुकती नहीं हैं
©सुनील_सोनी
© Sunil Soni
बेझिझक जिस तरह चली आई थी
बेझिझक उस तरह चली जाए भी
बहुत भोली है वो, रुकती भी नहीं
इतराई सी शरमाई सी हरजाई सी
बचपन भरी आँखें चंचल सी नहीं
बेपरवाह हैं मुझसे, कुछ सुस्ताई सी
मेरा मुक़द्दर कहाँ खींच लाया मुझको
सुबह सुबह देखा उसको अलसाई सी
लटें सुलझाती हुई कभी बिखराती हुई
सुबह सुबह देखा उसको अलसाई हुई
बसंत में अमराई सी कुछ कुछ बौराई भी
कुछ कुछ अपनी सी कुछ कुछ पराई भी
धड़कनें धीमी नहीं पड़ती मेरी
आ जाती है वो थोड़ी सकुचाई हुई
© Sunil Soni
कविता : सुनील स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी