ये वृक्ष जो
मूसलाधार में
सधे खड़े हैं
कृतज्ञ हैं
आकाश के
धरा की तृप्ति के लिए
जीवन तरने के लिए
आंधियाँ
विनम्रता की उपासक हैं
वृक्ष उनके शिष्य
ढहना
सफल होने का रास्ता है
सधे रहना समर्पण का
बारिश
आत्मा है सृष्टि की
©सुनील_सोनी
समाज का सबसे बड़ा सरोकार यानी प्रेम छीजता जा रहा है. लिहाजा, मेरी कविताओं में आपको प्रेम ही केंद्रबिंदु नज़र आएगा. मेरे और दो प्रिय विषय हैं : पहला सिनेमा और समाज; और दूसरा राजनीति के मार्फत समाज और समाज के मार्फत जन.
ये वृक्ष जो
मूसलाधार में
सधे खड़े हैं
कृतज्ञ हैं
आकाश के
धरा की तृप्ति के लिए
जीवन तरने के लिए
आंधियाँ
विनम्रता की उपासक हैं
वृक्ष उनके शिष्य
ढहना
सफल होने का रास्ता है
सधे रहना समर्पण का
बारिश
आत्मा है सृष्टि की
©सुनील_सोनी
हिकायत को न हिक़ारत से देखें हुज़ूर
ये हमारी है, उनकी भी है, दुनिया की भी है
लहू हमारे ज़ख्मों से ठहरता क्यों नहीं
सज़ा हमारी है, उनकी भी, दुनिया की भी है
सुनाते-सुनाते रोते जाते हैं बरबस
रंज हमारा उनका भी, दुनिया का भी है
मिसाल दूँ या ज़िक्र रंजिश में छोड़ दूँ
कहानी उन तक मेरी, दुनिया तक भी है
मुमकिन है एक ही वक़्त साथ हों तन्हा भी
तक़ाज़ा मेरा उनका भी है, दुनिया का भी
असंख्य द्वार
संशय के पार
तुम्हारा रास्ता देखते हैं
ज्यों हरसिंगार
गुलमोहर ज्यों
ग्रीष्म में
शरमा कर हो जाता है लाल
झरोखे वे हरियाये हैं
झाँकती थी
कोई कली जिनसे
सरोवरों के दर्पण में
जो शिखर
बादलों के परदे से ढँके हैं
नदी की तलछटों में
रूप हर चुके हैं
वन पर बसन्त छाये से
मुझ तक तुझे लाये से
©सुनील_सोनी
अनदेखे भी अनकहे हैं
अस्वर भी सुर से भरे हैं
दृग कब कभी किसके खुले हैं
आह ! श्वास के झोंके चले हैं
दृकपाल से हर क्षण तरसते
झूम के हर प्रहर बरसते
बादलों के मर्म में भी
प्रिय की सी छाया
धूल के कण भी अचंभित
थाप पाकर अनमने से
रक्त के आरोह में प्रतिक्षण
स्पंदनों के गीत हैं
©सुनील_सोनी
तितली कुछ पराग पाए
हरीतिमा जी भी जाए
क्यों कामना कहती चली है
मन में बहली पड़ी है
तुझसे मिलन की आशा
धूप मेरे हिस्से की
बादल ले गया
इंद्रधनुष
बारिश के साथ मिलकर
बच्चों की खातिर रच गया
रात जैसा दिन में ही
घनघोर
मन भी गीला कर गया
दुःख भरा या सुख से हो तर
भेद बोता ही नहीं है
फिर विरह हो या मिलन
शेष रहता ही नहीं है
शुष्क जब भी
दिख पड़ेगा
श्याम में भी शुभ्र होगा
तब नहीं बिखेरेगा
इंद्रधनुष के रंग
बारिश का विरही
खाली बादल
©सुनील_सोनी
©suneilsoni
दिल पे कब ज़ुबां के आमाल चलते हैं
इश्क़ में हुज़ूर बस कमाल चलते हैं
मंदिर की घंटियाँ जोर से बजाईं तो
वो समझे कि हम बवाल करते हैं
समंदर की दहाड़ों पर हम रो दिए तो
फरेब हैं ये आंसू, कहकर चल दिए
©सुनील_सोनी
तुम्हें देख लेना
मन का छूना है
छुईमुई के पत्तों के लजाने जितना
नाजुक
तुम्हारा न देखना भी
हर क्षण
तुम्हें देखने की प्रतीक्षा
यह प्रतीक्षा चंद्रयान की
विक्रम की तलाश जितनी ही
अनवरत है
अथाह है
तुम्हारा मौन
मेरे शब्दकोश से
अधिक वाचाल है
तुम जो कहती हो
बिना मुझसे मुखातिब हुए
मैं नहीं सुन पाता
लेकिन
तुम्हारे होंठों के खुलने या बंद होने की
आवृत्ति
अधैर्य की सीमा तक
चंचल है
तुम्हारा गुस्सा
मैं देख नहीं पाता
लेकिन
तुम्हारी आँखों से रिसता हुआ
पढ़ पाता हूँ
त्यौरियों से कपाल तक
भिंच जाता है
उसका अनुमान
वर्षा का अनुमान लगाने से
सरल है
जब मैं यह कह रहा हूँ
तब
मुझे रजभर भी
भरोसा नहीं
कि
तुम जानती हो
यह सब
मैं इस रहस्य को
अरहस्य नहीं होने दूंगा कभी
मैं इसका अकेला साक्षी हूँ
और रहूंगा
©सुनील_सोनी
©suneilsoni
कविता : सुनील स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी