मैंने सच कहा था तूने सुना नहीं
जो सच तूने सुना मैंने कहा नहीं
समझ की है अलहदा रौशनी
राहें मुझे मंज़ूर थीं जो तुझे नहीं
©SuneilSoni
©सुनील_सोनी
समाज का सबसे बड़ा सरोकार यानी प्रेम छीजता जा रहा है. लिहाजा, मेरी कविताओं में आपको प्रेम ही केंद्रबिंदु नज़र आएगा. मेरे और दो प्रिय विषय हैं : पहला सिनेमा और समाज; और दूसरा राजनीति के मार्फत समाज और समाज के मार्फत जन.
मैंने सच कहा था तूने सुना नहीं
जो सच तूने सुना मैंने कहा नहीं
समझ की है अलहदा रौशनी
राहें मुझे मंज़ूर थीं जो तुझे नहीं
©SuneilSoni
©सुनील_सोनी
मेरी आँखों में देख दुनिया
धरती के सारे झरने
पूरा आसमान
सभी नदियां और समंदर
तमाम साहस और करुणा
बची-खुची उम्मीद भी
फिर बौरा उठने के
धैर्य के साथ
यहाँ है
आ छुप जा
इन फूलों जैसी
मासूमियत के साथ
कहता हूँ ख़ुद और ठहर जाता हूँ
ठिठकता हूँ, फिर जाग जाता हूँ
अँधेरे इंतहाई मेरे जानिब तन्हा
वादों पे हर शब गुज़ार जाता हूँ
खिड़की के पार बगीचे होंगे
सोच के हर रोज़ ठहर जाता हूँ
©सुनील_सोनी
हतप्रभ हूँ मनुष्य!
मेरा ज़हर
द्वेष-राग से नहीं उपजा
न ही किसी लाभ के लिए
कभी जान ली है मैंने
केंचुल धारण नहीं किया
और न ही रूप बदलता हूँ
यह सब प्रकृति ने
बख्शा है मुझे
हे, मनुष्य !
क्यों मेरी उपमा
मानवीय कर दी तुमने
क्यों लजाते हो मुझे
तुम ही हो
जिससे सदा बचना चाहता हूँ
धर्मग्रन्थों से
मुझे निकाल फेंको
मेरा ज़िक्र नृशंस आख्यानों में न आने दो
मैं निम्नतम कोटि का पशु हूँ
तुम प्रथम पायदान पर
मैं वही रहना चाहता हूँ
जो हूँ
मैं किसी तौर
मनुष्य नहीं होना चाहता
©सुनीलसोनी
सब कुछ कह देना ही नहीं है सब कुछ
सब कुछ सुन लेना ही नहीं है सब कुछ
सब कुछ में शामिल है मेरा तन्हा होना
सब कुछ में शामिल है तुम्हारा न होना
तुम्हें महसूस कर लेना भी है सब कुछ
तुम्हें न पाना या खो देने में भी जो है
फिर से तुम्हें पाने के बग़ैर का अहसास
©सुनील_सोनी
तंत्र ने
गण को
बजाया
खूब
तन्ना तू...
तन्ना तू...
भूखे पेट
जो सोये थे
दिल से उनके
निकला
हू... हू... हू...
संगीनों के
साये में जो
खामोश
खड़े रहे
करते
कूं... कूं... कूं...
ख़ुशबू
अलबत्ता
फिर भी
फूलों से
उठती रही
जिनकी नाक
ज़मीं पर थी
बूटों से
सजती रही
सीने में
बिंधे रहे
तीर
©सुनील_सोनी
कविता : सुनील स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी