हतप्रभ हूँ मनुष्य!
मेरा ज़हर
द्वेष-राग से नहीं उपजा
न ही किसी लाभ के लिए
कभी जान ली है मैंने
केंचुल धारण नहीं किया
और न ही रूप बदलता हूँ
यह सब प्रकृति ने
बख्शा है मुझे
हे, मनुष्य !
क्यों मेरी उपमा
मानवीय कर दी तुमने
क्यों लजाते हो मुझे
तुम ही हो
जिससे सदा बचना चाहता हूँ
धर्मग्रन्थों से
मुझे निकाल फेंको
मेरा ज़िक्र नृशंस आख्यानों में न आने दो
मैं निम्नतम कोटि का पशु हूँ
तुम प्रथम पायदान पर
मैं वही रहना चाहता हूँ
जो हूँ
मैं किसी तौर
मनुष्य नहीं होना चाहता
©सुनीलसोनी