तंत्र ने
गण को
बजाया
खूब
तन्ना तू...
तन्ना तू...
भूखे पेट
जो सोये थे
दिल से उनके
निकला
हू... हू... हू...
संगीनों के
साये में जो
खामोश
खड़े रहे
करते
कूं... कूं... कूं...
ख़ुशबू
अलबत्ता
फिर भी
फूलों से
उठती रही
जिनकी नाक
ज़मीं पर थी
बूटों से
सजती रही
सीने में
बिंधे रहे
तीर
©सुनील_सोनी