दिल पे कब ज़ुबां के आमाल चलते हैं
इश्क़ में हुज़ूर बस कमाल चलते हैं
मंदिर की घंटियाँ जोर से बजाईं तो
वो समझे कि हम बवाल करते हैं
समंदर की दहाड़ों पर हम रो दिए तो
फरेब हैं ये आंसू, कहकर चल दिए
©सुनील_सोनी
समाज का सबसे बड़ा सरोकार यानी प्रेम छीजता जा रहा है. लिहाजा, मेरी कविताओं में आपको प्रेम ही केंद्रबिंदु नज़र आएगा. मेरे और दो प्रिय विषय हैं : पहला सिनेमा और समाज; और दूसरा राजनीति के मार्फत समाज और समाज के मार्फत जन.
दिल पे कब ज़ुबां के आमाल चलते हैं
इश्क़ में हुज़ूर बस कमाल चलते हैं
मंदिर की घंटियाँ जोर से बजाईं तो
वो समझे कि हम बवाल करते हैं
समंदर की दहाड़ों पर हम रो दिए तो
फरेब हैं ये आंसू, कहकर चल दिए
©सुनील_सोनी
तुम्हें देख लेना
मन का छूना है
छुईमुई के पत्तों के लजाने जितना
नाजुक
तुम्हारा न देखना भी
हर क्षण
तुम्हें देखने की प्रतीक्षा
यह प्रतीक्षा चंद्रयान की
विक्रम की तलाश जितनी ही
अनवरत है
अथाह है
तुम्हारा मौन
मेरे शब्दकोश से
अधिक वाचाल है
तुम जो कहती हो
बिना मुझसे मुखातिब हुए
मैं नहीं सुन पाता
लेकिन
तुम्हारे होंठों के खुलने या बंद होने की
आवृत्ति
अधैर्य की सीमा तक
चंचल है
तुम्हारा गुस्सा
मैं देख नहीं पाता
लेकिन
तुम्हारी आँखों से रिसता हुआ
पढ़ पाता हूँ
त्यौरियों से कपाल तक
भिंच जाता है
उसका अनुमान
वर्षा का अनुमान लगाने से
सरल है
जब मैं यह कह रहा हूँ
तब
मुझे रजभर भी
भरोसा नहीं
कि
तुम जानती हो
यह सब
मैं इस रहस्य को
अरहस्य नहीं होने दूंगा कभी
मैं इसका अकेला साक्षी हूँ
और रहूंगा
©सुनील_सोनी
©suneilsoni
जिस गली से
अनुमान पर निर्भर
गुजरता हूँ मैं
घुप्प अंधेरे के बीच
मैंने सुना था
लाउडस्पीकर पर
गली का समापन
जगमगा देगा मुझे
कोलाहल है जैसे
गली में हैं बहुत लोग
मेरी तरह
अनुमान पर चल रहे हैं
©suneilsoni
©सुनील_सोनीभोथरी होती जाती है
मेरी भाषा
हर रोज़ सान पर लगाता हूँ
लिखता हूँ
ताकि चमक बरकरार रहे
लेकिन
भय के फंदे मेरे भीतर पल रहे हैं
छटपटा रहे हैं आंसू
पर उन्हें बिना धार के
कैसे रुला पाऊंगा मैं
हँसा भी नहीं सकता
भाषा मेरे भीतर भय बनकर रह गई है
उसमें कोई न कोई अक्सर
य लगा जाता है
भाषा का स्थगन
मेरा ठहर जाना है
लेकिन
मैं जोखिम लेने को तैयार नही
मैं उम्मीदें बँधाने को राजी नही
मैं दर्द के दरिया को क्यों छेड़ूँ
हरहराते घावों को क्यों छेड़ूँ
मैं नहीं कह पाऊंगा कि
निकल आओ घर से
सड़क पर भिड़ो
टूट जाओ या मर जाओ
पर अपनी बात बोलो
मैं नहीं लिखूंगा उनकी कहानी
खून से लथपथ हैं तो क्या
स्याही की जगह नहीं भरूंगा
कलम में रक्त की धार
नहीं बताऊँगा कि
मैंने जलते घरों की शहादत देखी
क्यों लिखूँ कि किन कब्रों में दफन हैं बच्चे
हे ! राम !! सिया राम !!
माया का कैसा जाल बुना है
रूप तुम्हारा ही धरकर
रावण चहुंओर खड़ा है
दस नहीं, हज़ारों अब तो
मुख पर सुविध श्रृंगार है
कितना सुंदर वेश रचा है
मोह में कहीं फंस न जाऊं
मैया सीता ज्यूँ हर न जाऊं
धर्म के छद्म में अधर्म खड़ा है
सच की छाती पर झूठ चढ़ा है
मति मेरी सुध भी रखना राम
अरज
हे राम ! हे राम !!
©सुनील_सोनी
कविता : सुनील स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी