जहाँ से निश्चिंत गुजरते हैं लोग
वहाँ भरोसों के कब्रिस्तान पड़े हैं
जहाँ इस बार पुरजोर बरसे हैं बादल
वहाँ इस बार फसलों पर ख़तरे बड़े हैं
जहाँ दावा है सूरज की रोशनी का
उन इलाकों में अकाल भारी पड़े हैं
©सुनील_सोनी
समाज का सबसे बड़ा सरोकार यानी प्रेम छीजता जा रहा है. लिहाजा, मेरी कविताओं में आपको प्रेम ही केंद्रबिंदु नज़र आएगा. मेरे और दो प्रिय विषय हैं : पहला सिनेमा और समाज; और दूसरा राजनीति के मार्फत समाज और समाज के मार्फत जन.
जहाँ से निश्चिंत गुजरते हैं लोग
वहाँ भरोसों के कब्रिस्तान पड़े हैं
जहाँ इस बार पुरजोर बरसे हैं बादल
वहाँ इस बार फसलों पर ख़तरे बड़े हैं
जहाँ दावा है सूरज की रोशनी का
उन इलाकों में अकाल भारी पड़े हैं
©सुनील_सोनी
मुकम्मल सा दिन है, मुकम्मल रात भी
सराब इश्क़ में मुकम्मल जहां आज भी
तन्हाइयां भी मुकम्मल हैं और हिज़्र भी
हयाते नूर से मुकम्मल फरियाद भी
©सुनील_सोनी
सड़कें कितनी बेचैन हैं चलने के लिए
चौराहे मचल रहे हैं मायाजाल में
सिग्नलों पर भीड़ मुस्तैद है
मैंने सच कहा था तूने सुना नहीं
जो सच तूने सुना मैंने कहा नहीं
समझ की है अलहदा रौशनी
राहें मुझे मंज़ूर थीं जो तुझे नहीं
©SuneilSoni
©सुनील_सोनी
मेरी आँखों में देख दुनिया
धरती के सारे झरने
पूरा आसमान
सभी नदियां और समंदर
तमाम साहस और करुणा
बची-खुची उम्मीद भी
फिर बौरा उठने के
धैर्य के साथ
यहाँ है
आ छुप जा
इन फूलों जैसी
मासूमियत के साथ
कहता हूँ ख़ुद और ठहर जाता हूँ
ठिठकता हूँ, फिर जाग जाता हूँ
अँधेरे इंतहाई मेरे जानिब तन्हा
वादों पे हर शब गुज़ार जाता हूँ
खिड़की के पार बगीचे होंगे
सोच के हर रोज़ ठहर जाता हूँ
©सुनील_सोनी
कविता : सुनील स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी