सोमवार, 4 जनवरी 2021

असल

 जहाँ से निश्चिंत गुजरते हैं लोग

वहाँ भरोसों के कब्रिस्तान पड़े हैं


जहाँ इस बार पुरजोर बरसे हैं बादल

वहाँ इस बार फसलों पर ख़तरे बड़े हैं


जहाँ दावा है सूरज की रोशनी का

उन इलाकों में अकाल भारी पड़े हैं


©सुनील_सोनी


मुकम्मल

 मुकम्मल सा दिन है, मुकम्मल रात भी

सराब इश्क़ में मुकम्मल जहां आज भी


तन्हाइयां भी मुकम्मल हैं और हिज़्र भी

हयाते नूर से मुकम्मल फरियाद भी


©सुनील_सोनी

नज़र

 सड़कें कितनी बेचैन हैं चलने के लिए

चौराहे मचल रहे हैं मायाजाल में

सिग्नलों पर भीड़ मुस्तैद है

©सुनील_सोनी

बाक़ी

 क्यों लूँ रुखसत नाराज़ी का सबब बाक़ी है

यार ने पिलाई उनको मेरी तलब बाक़ी है

©SuneilSoni

फर्क़

 मैंने सच कहा था तूने सुना नहीं

जो सच तूने सुना मैंने कहा नहीं


समझ की है अलहदा रौशनी

राहें मुझे मंज़ूर थीं जो तुझे नहीं


©SuneilSoni


©सुनील_सोनी

 मेरी आँखों में देख दुनिया

धरती के सारे झरने

पूरा आसमान

सभी नदियां और समंदर

तमाम साहस और करुणा

बची-खुची उम्मीद भी

फिर बौरा उठने के

धैर्य के साथ

यहाँ है

आ छुप जा

इन फूलों जैसी

मासूमियत के साथ

©सुनील_सोनी

पस ओ पेश (ग़ज़ल)

 कहता हूँ ख़ुद और ठहर जाता हूँ

ठिठकता हूँ, फिर जाग जाता हूँ

 

अँधेरे इंतहाई मेरे जानिब तन्हा

वादों पे हर शब गुज़ार जाता हूँ

 

खिड़की के पार बगीचे होंगे

सोच के हर रोज़ ठहर जाता हूँ


©सुनील_सोनी

दिवाली की शुभकामनाएं

कविता : सुनील  स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी