हर सुबह उजाले में सूरज के डूब जाता हूँ
शफ़्फ़ाफ़ ओ मरमरी गरमाहट से तर जाता हूँ
हर दिन सात रंगों से यूँ गुलज़ार हो जाता हूँ
हर रात लेकिन स्याह इकरंग से डर जाता हूँ
रोशनी तमाम कहीं से ढूँढ निकाल लाता हूँ
औ पूरे जी-जान फिर अंधेरे से लड़ जाता हूँ
गुफा में लौटने का ख़याल जिस पल पाता हूँ
सदियों पुरानी याद से रूह तक सहम जाता हूँ
हमराह सितारा देखकर अब भी सिहर जाता हूँ
हर कृष्ण पक्ष में आशिक़ चाँद का हो जाता हूँ
पत्थरों फिर माचिसों से रोज़ आग जलाता हूँ
हर वक़्त आगे बेतरह पर क्यों अंधेरे पाता हूँ
रात में रंग भर दे जो बिजली के लट्टू बनाता हूँ
हर रोज़ बस जाने क्यों वजूद यूँ ही बचाता हूँ
हर क्षण उजाले में ही रहने को मचल जाता हूँ
दिल में हर उग जाए सूरज, ये हलफ उठाता हूँ
©सुनील_सोनी