सोमवार, 4 जनवरी 2021

भीगना

वो मकान अब भी मेरा बसेरा है

रहती थीं जब तक तुम, घर था


रूठकर भी नहीं मना पाया क्यूँ
सर से पांव तक यूं डूबा हुआ था


हक़ तेरा इतना, छोड़ दे मुझको
मैं भूल जाऊंगा, मैंने कब कहा था


तमन्ना ए सफर भी तमाम नहीं
ज़िक्र तेरे शहर का होता रोज़ था


डबडबाई आँख, ऐलान हो गए
मुक़म्मल न तेरा जां चला जाना था

© SuneilSoni

©सुनील_सोनी

खेल (ग़ज़ल 9)

 अभी लाल है, अभी पीला होगा

चित्रों में बच्चों के नीला भी होगा


दुल्हन सजी है, दूल्हा भी सजा है

बच्चों के खेल में ये आम होगा


गुलाबी है चुनरी, लहंगा भी गुलाबी

दुल्हन का गजरा घर महका देगा


बजेगा बाजा तो नाचेंगे बाराती

मजा आएगा, क्या खूब खेल होगा


फिर होगी विदाई, तो मैं न जाने दूँगी

कहेगी बिटिया रानी, यही खेल होगा


दुल्हन ही क्यों जाए, दूल्हा आ जाए

खिलौना संसार किस्सा आम होगा

©सुनील_सोनी

जश्ने आज़ादी

ख़्याल ए आज़ादी से छा गईं रौनकें

आसमां पे देखिए तिरंगा लहराया है


कभी खेतों में कभी मैदां में झलकें

गंगा-जमुना में मुहब्बतों का साया है


खुशबुओं के दौर जो सांसों से गुज़रे 

चमन ए हिन्द में फूल कोई बौराया है


सरहदों से रुकते नहीं कभी झोंके

नाम ओ रुतबा ए गुल जहां पे छाया है


तारीख़ ए दौरां ए दुश्वारी के सफ़े मौजूं

इन बादलों के जाने का मौसम आया है


इंद्रधनुषों के पार सूरज ज्यों चमके

इल्म की रौशनी हिन्द का सरमाया है


@SuneilSoni

©सुनील_सोनी

अर्थात (ग़ज़ल 8)

 


लगता है यूं जैसे फूल साज़िशों से खिले हैं

इत्तफाक़ों के चमन में ऐसे सिलसिले हैं


वो यारो की बातें अदाकारी का वो फ़न

सिनेमा से भी बढ़कर ग़ज़ब सिलसिले हैं


सियासत में आजकल सितम खुशनुमां

मोहब्बत में जनाज़ों के लंबे सिलसिले हैं


वफ़ा के किस्से पत्थरों पर पानी से लिखे हैं

यक़ीं है मगर ताज़ा ज़ख्मों के सिलसिले हैं


मुझ तक ही लौट आती है आवाज़ मेरी

तिलिस्मी वादियों में अंधेरों के सिलसिले हैं


©SuneilSoni

©सुनील_सोनी


ज़मीन

 जहाँ तक देखो हरा है

शायद इसमें लाल भी पड़ा है

मटमैला हो गया वहां पर

जहां मेरा पसीना पड़ा है

सुर्ख उग आए से लगते हैं जो फूल

मां का सिंदूर वहां झड़ा है


©सुनील_सोनी

मिट्टी

 उनकी मिट्टी में जाना है मुझे

जिसने मिट्टी में मिलाया था मुझे


हश्र ए आख़िर मिट्टी सबका

ख़ाक में ही मिल जाना है मुझे


©सुनील_सोनी

दृष्टि

 ये वृक्ष जो

मूसलाधार में

सधे खड़े हैं

कृतज्ञ हैं

आकाश के

धरा की तृप्ति के लिए

जीवन तरने के लिए

आंधियाँ

विनम्रता की उपासक हैं

वृक्ष उनके शिष्य

ढहना

सफल होने का रास्ता है

सधे रहना समर्पण का

बारिश

आत्मा है सृष्टि की


©सुनील_सोनी

दिवाली की शुभकामनाएं

कविता : सुनील  स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी