सोमवार, 4 जनवरी 2021

भाषा

 भोथरी होती जाती है 

मेरी भाषा

हर रोज़ सान पर लगाता हूँ

लिखता हूँ

ताकि चमक बरकरार रहे

लेकिन

भय के फंदे मेरे भीतर पल रहे हैं

छटपटा रहे हैं आंसू

पर उन्हें बिना धार के

कैसे रुला पाऊंगा मैं

हँसा भी नहीं सकता

भाषा मेरे भीतर भय बनकर रह गई है

उसमें कोई न कोई अक्सर

य लगा जाता है

भाषा का स्थगन

 मेरा ठहर जाना है

लेकिन

मैं जोखिम लेने को तैयार नही

मैं उम्मीदें बँधाने को राजी नही

मैं दर्द के दरिया को क्यों छेड़ूँ

हरहराते घावों को क्यों छेड़ूँ

मैं नहीं कह पाऊंगा कि

निकल आओ घर से

सड़क पर भिड़ो

टूट जाओ या मर जाओ

पर अपनी बात बोलो

मैं नहीं लिखूंगा उनकी कहानी

खून से लथपथ हैं तो क्या

स्याही की जगह नहीं भरूंगा

कलम में रक्त की धार

नहीं बताऊँगा कि

मैंने जलते घरों की शहादत देखी

क्यों लिखूँ कि किन कब्रों में दफन हैं बच्चे

©सुनील_सोनी

हे ! राम !!

 हे ! राम !! सिया राम !!

माया का कैसा जाल बुना है

रूप तुम्हारा ही धरकर

रावण चहुंओर खड़ा है

दस नहीं, हज़ारों अब तो

मुख पर सुविध श्रृंगार है

कितना सुंदर वेश रचा है

मोह में कहीं फंस न जाऊं

मैया सीता ज्यूँ हर न जाऊं

धर्म के छद्म में अधर्म खड़ा है

सच की छाती पर झूठ चढ़ा है

मति मेरी सुध भी रखना राम

अरज

हे राम ! हे राम !!


©सुनील_सोनी

पुल

 ये जो बेपरवाही का विस्तार है मुझ तक

जैसे मेरा समग्र सिमट आना है तुझ तक


©सुनील_सोनी

चलना

 चलते रहना निरुद्देश्य

भटकाव नहीं

नई दृष्टि से देखना है

हर चीज़

©suneilsoni

मात्रा

 प में

र किसी अधटूटे तीर की तरह घुसा है

ऐ की मात्रा लगी है उत्थान की तरह

ताकि

म जब बिंधे

तो

सम्पूर्ण अर्थ बदल जाए

मिलकर


(प = पुरुष) (म = महिला)

@suneilsoni

इंसाफ़

 प्रेम की तरह ही

कविता को भी

रिश्ते का नाम देना

गुनाह है

असर

 ख़ुद से नाराज़ होता हूँ

तो बरस पड़ता हूँ औरों पर


सवाल ख़ुद से करता हूँ

जवाब तलब करता हूँ औरों से


तमन्नाएं रोज़ जोड़ते जाता हूँ

उम्मीद लगा लेता हूँ औरों से


बोझ से अपने दबा रह जाता हूँ

मंज़िलों पर रश्क़ करता हूँ औरों से


होश ठिकाने नहीं होते हैं मेरे

बेहोशी के इल्ज़ाम पाता हूँ औरों से


दिल के फ़रेब यूँ ताड़ जाता हूँ

वफ़ा का फ़न सीख जाता हूँ औरों से


©suneilsoni

©सुनील_सोनी


दिवाली की शुभकामनाएं

कविता : सुनील  स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी