ऑस्कर 2019 और भारत
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| Poster : Bohemian Rhapsody |
‘बोहेमियन रैपसिडी’ दरअसल, एक एलबम का नाम है, जो उस ज़माने में 6 मिनट लंबा था और इतने लंबे गीत को प्रसारित करने से तब के रेडियो इनकार कर देते थे. बीबीसी उस समय बड़ा नाम था. लेकिन, एल्बम के अभूतपूर्व मिज़ाज़ को देख उसने उसे प्रसारित किया।
फ्रेडी मरक्यूरी पॉप जगत में अब तक के सबसे प्रसिद्ध नामों में से एक हैं. वे भारतीय पारसी मां बाप (जेर और बोमी बलसारा) की संतान थे. उनकी बड़ी बहन का नाम था कश्मीरा. उनका जन्म 5 सितंबर 1946 को जंजीबार में हुआ, जहां उनके पिता अंग्रेजी सरकार के कारिंदे थे. उनका ज्यादातर बचपन भारत मे बीता, जिसमें उन्होंने औपचारिक शिक्षा के अलावा संगीत दीक्षा भी ली. जंजीबार में विद्रोह हुआ, तो उनके पिता इंग्लैंड में बस गए. नौजवान फ्रेडी भी बाद में लंदन में कला की पढ़ाई करने लगे.
उन्होंने कई रॉक बैंड में काम किया, पर 1970 में उन्होंने ‘स्माइल’ नाम के बैंड में गिटारवादक ब्रायन मे और ड्रमर रॉजर टेलर के साथ काम शुरू किया. वे इस रॉक बैंड के मुख्य गायक और गीतकार थे. सालभर बाद उनके साथ संगीतकार जॉन डिकॉन भी जुड़ गए. इसके बाद उन्होंने ‘क्वीन’ नाम का गीत लिखा और रिलीज से पहले बैंड का नाम भी बदलकर ‘क्वीन’ रख दिया. इस गीत और उनके परफॉरमेंस ने धूम मचा दी. फिर बैंड ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. उन्होंने अपना नाम भी फ्रेडी बलसारा से फ्रेडी मरक्यूरी कर लिया.
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| Rami Malek and Freddie |
फिल्म में रैमी मलिक ने उनकी भूमिका निभाई है. वे सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का ऑस्कर जीत सकते हैं. एडिटिंग और साउंड एडिटिंग के दोनों पुरस्कार भी इस फिल्म को मिल सकते हैं.
‘पीरियड्स : ऐंड ऑफ सेंटेंस’
दूसरी फिल्म शॉर्ट डाक्युमेंटरी है : ‘पीरियड्स : ऐंड ऑफ सेंटेंस’. उत्तरप्रदेश के हापुड़ के एक गांव की किशोरी छात्राओं पर बनी यह डाक्युमेंटरी लॉस एंजिल्स की 6 छात्राओं की मेहनत का फल है. यह फिल्म ऑस्कर में लघु आकार की डॉक्युमेंटरी श्रेणी में चुनी गई है. खास बात यह है कि लॉस एंजिल्स के ऑकवुड स्कूल की छह हाईस्कूल छात्राएँ में इस फिल्म की कार्यकारी निर्माता हैं. हॉलीवुड पब्लिसिस्ट लीसा टैबैक की बेटी क्लेयर स्लाइनी, फिल्म के छह कार्यकारी निर्माताओं में से एक है. फिल्म की निर्देशक रायका जेहताबकी हैं, जबकि सैम डेविस फिल्म के सिनेमैटोग्राफर, एडिटर, साउंड डिजाइनर और निर्माता हैं. गुणीत मोंगा की वजह से भारत में यह फिल्म शूट हो पाई.25 मिनट लंबी इस फिल्म में छात्राओं से पूछे गए प्रश्नों और उत्तर के बीच लंबा सन्नाटा है, जो भयभीत करता है. यह सन्नाटा रॉ फुटेज में और लंबा है. यह दिखाता है कि कैसे भारत में लड़कियों के लिए मासिक धर्म शर्मसार करने वाली घटना है और उन्हें कोई अंदाज़ नहीं है कि इससे कैसे निपटा जाए. हापुड़ के स्कूल के छात्र-छात्राओं की बातचीत से फिल्म शुरू होती है. एक लड़का पूछता है कि क्या ये किसी कक्षा के पीरियड की तरह है, जिसके लिए एक घंटा बजता है? जब उस लड़के से पूछा जाता है कि क्या तुम पीरियड के बारे में जानते हो, वह किशोर उत्तर देता है, ‘‘यह एक तरह का रोग है न?’’
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| Poster of Film and Guneet Monga |
बाफ्टा पुरस्कारों के लिए नामांकित गुणीत मोंगा की कंपनी सिख्या एंटरटेनमेंट भी इस डॉक्युमेंटरी की निर्माता है. मोंगा ने बताया कि कि ऑकवुड स्कूल की 12-14 साल की लड़कियों के समूह ने कहीं आलेख पढ़ा कि कैसे भारत के गांवों की लड़कियों को मासिक धर्म के चलते साफसफाई और शर्म के चलते स्कूल छोड़ देना पड़ता है. उन्होंने एक्शन इंडिया नामक एनजीओ से संपर्क किया और कहा कि वे सैनेटरी पैड बनाने वाली मशीन दान करना चाहती हैं. उन्होंने कई उपक्रम चलाए और पैसे जुटाए.
लेकिन, जब उन्हें लगा कि यह पर्याप्त नहीं है तो शिक्षिका के प्रोत्साहन से उन्होंने ऑनलाइन अभियान चलाया, ताकि इस विषय में चर्चा के लिहाज से डॉक्युमेंटरी फिल्म बनाई जा सके. जैसे ही पैसे पूरे हुए, उन्होंने रायका से संपर्क किया.
मोंगा ने बताया, ‘‘उनमें से एक लड़की के माता-पिता मुझे जानते थे. उस लड़की ने मुझे भारत में शूटिंग में मदद करने के लिए कहा.’’ फिल्म में मोंगा की सहयोगी मंदाकिनी कक्कड़ का वाइसओवर है, जिन्होंने लड़कियों को मनाया और उनसे बात की. अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद और फिर हिंदी से अंग्रेजी करना एक समस्या थी और दूसरी समस्या थी लड़कियों से कुछ कहलवा पाना. लेकिन, हमने इसे हल कर लिया.
युवा निर्देशक *रायका
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| Director Rayka Zehtabchi |
लड़की रूबी शिफ के पिता ने मुझसे इस बारे में बात की. यह प्रोजेक्ट लॉस एंजिल्स के ऑकवुड स्कूल में पढ़ानेवाली अंग्रेजी शिक्षिका मेलिसा बर्टन के कारण शुरू हो पाया.’’
रायका ने बताया कि फिल्म बनाने में हमें दो साल लगे. उस गांव की औरतें कैसे दूसरी औरतों की मदद कर रही हैं, इस बारे में वे कहती हैं, ‘‘जो चीज हमें गर्व से भर देती है, वह यह कि भारत के छोटे से गांव में कुछ दृढ़निश्चयी महिलाओं का समूह ‘एक समय में एक पैड’ की प्रथा को बदलने के लिए काम कर रहा है.’’
(*रायका, दरअसल रेखा हैं और उनका सरनेम भी मेहताब से संबंधित है। वे ईरानी हैं)



