लिख लूंगा फ़िर किसी दिन कविता
अभी फ़ुरसत से देख तो लूँ तुम्हें
©सुनील_सोनी
समाज का सबसे बड़ा सरोकार यानी प्रेम छीजता जा रहा है. लिहाजा, मेरी कविताओं में आपको प्रेम ही केंद्रबिंदु नज़र आएगा. मेरे और दो प्रिय विषय हैं : पहला सिनेमा और समाज; और दूसरा राजनीति के मार्फत समाज और समाज के मार्फत जन.
जो पैर ज़मीं पर नहीं पड़ते
उनका ज़मीं पर गुजारा क्योंकर हो?
जिन्होंने सपने नहीं देखे
उनका आसमां पर किनारा क्योंकर हो
जिन्होंने कभी नदी की रेत नहीं देखी
पहाड़ों का उन्हें नज़ारा क्योंकर हो
©सुनील_सोनी
गश्त यूँ ही गली में लगती रही
मुश्क़ यूँ ही गली में फबती रही
यादों के सफ़र में मैं जगती रही
ख्वाबों के आईने में सजती रही
दिल ज़र्रा ज़र्रा यूँ फुदकता रहा
पेड़ पे कोई कोयल कूकती रही
गजरे से फूल आँगन में गिरते रहे
आंसुओं से गली मेरी सजती रही
तू चली आ कि बज़्म भरती नहीं
महफ़िल तेरे बिन बहकती नहीं
©सुनील_सोनी
©suneilsoni
नक़ाब में आँखों से पढ़ते हैं तेरा हाल
किस्सा ज़माना ए बेहिजाबी खत्म हुए
परदा भी सितमगर ने किया बेमिसाल
बज़्म में रस्म ए हया के रिश्ते खत्म हुए
धड़कता दिल है ज़ोर से क्यों हूं बेक़रार
सुनते हैं दीदार के सब रस्ते खत्म हुए
दरयाफ़्त में है आया वो नाम कई बार
शुक्र कि तफ्तीश के वो हिस्से ख़त्म हुए
सच्चे हैं कि झूठे क्यों मैं करूँ एतबार
हुस्न ए मेहताब के यूँ चरचे ख़त्म हुए
©सुनील_सोनी
@suneilsoni
दिल न डूबे बेवजह, तहखानों में झाँकिए
रिश्तों के संदूक में पुड़िया खुशियों की फाँकिए
दिल में न हो हरारत तो जी किसी का बाँटिए
रंजिश से पड़ी खाई हों तो मोहब्बत से पाटिए
©सुनील_सोनी
मुझे भी खबर कर
तेरे आने की
ज़िद कब से ये मैं
लिए बैठा हूँ
हुआ था जो रुखसत
गई रोशनी थी
तेरे संग से मैं
उजाला बना हूँ
कभी और भी जब
तेरी बात होगी
सांसों में गर्मी
बेतरह देखता हूँ
सवालों में कुछ भी
नया तो नहीं है
फिर भी नए मैं
सिलसिले देखता हूँ
©सुनील_सोनी
कविता : सुनील स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी