नक़ाब में आँखों से पढ़ते हैं तेरा हाल
किस्सा ज़माना ए बेहिजाबी खत्म हुए
परदा भी सितमगर ने किया बेमिसाल
बज़्म में रस्म ए हया के रिश्ते खत्म हुए
धड़कता दिल है ज़ोर से क्यों हूं बेक़रार
सुनते हैं दीदार के सब रस्ते खत्म हुए
दरयाफ़्त में है आया वो नाम कई बार
शुक्र कि तफ्तीश के वो हिस्से ख़त्म हुए
सच्चे हैं कि झूठे क्यों मैं करूँ एतबार
हुस्न ए मेहताब के यूँ चरचे ख़त्म हुए
©सुनील_सोनी
@suneilsoni