दिल न डूबे बेवजह, तहखानों में झाँकिए
रिश्तों के संदूक में पुड़िया खुशियों की फाँकिए
दिल में न हो हरारत तो जी किसी का बाँटिए
रंजिश से पड़ी खाई हों तो मोहब्बत से पाटिए
©सुनील_सोनी
समाज का सबसे बड़ा सरोकार यानी प्रेम छीजता जा रहा है. लिहाजा, मेरी कविताओं में आपको प्रेम ही केंद्रबिंदु नज़र आएगा. मेरे और दो प्रिय विषय हैं : पहला सिनेमा और समाज; और दूसरा राजनीति के मार्फत समाज और समाज के मार्फत जन.
दिल न डूबे बेवजह, तहखानों में झाँकिए
रिश्तों के संदूक में पुड़िया खुशियों की फाँकिए
दिल में न हो हरारत तो जी किसी का बाँटिए
रंजिश से पड़ी खाई हों तो मोहब्बत से पाटिए
©सुनील_सोनी
मुझे भी खबर कर
तेरे आने की
ज़िद कब से ये मैं
लिए बैठा हूँ
हुआ था जो रुखसत
गई रोशनी थी
तेरे संग से मैं
उजाला बना हूँ
कभी और भी जब
तेरी बात होगी
सांसों में गर्मी
बेतरह देखता हूँ
सवालों में कुछ भी
नया तो नहीं है
फिर भी नए मैं
सिलसिले देखता हूँ
©सुनील_सोनी
तकिये के नीचे किताब रखकर सो गए
आँसुओं से भीगा गुलाब फिर यूँ खिल गया
बारिशों की याद में ख्वाब तेरा छू गए
रात हुई तमाम तो किस्सा कोई यूँ खिल गया
हर गली चाँद निकला हम कहीं खो गए
उलझनें सुलझाईं तो चेहरा तेरा यूँ खिल गया
©सुनील_सोनी
एक्शन फिल्में देखते हुए तीव्र इच्छा होती है
किरदारों की आंखों में प्रेम उपजते हुए देखना
हिंसा के नृशंस क्षणों में लज्जा से रुक जाना
करुणा से भर आना और घृणा का ढह जाना
©सुनील_सोनी
कविता : सुनील स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी