प में
र किसी अधटूटे तीर की तरह घुसा है
ऐ की मात्रा लगी है उत्थान की तरह
ताकि
म जब बिंधे
तो
सम्पूर्ण अर्थ बदल जाए
मिलकर
(प = पुरुष) (म = महिला)
@suneilsoni
समाज का सबसे बड़ा सरोकार यानी प्रेम छीजता जा रहा है. लिहाजा, मेरी कविताओं में आपको प्रेम ही केंद्रबिंदु नज़र आएगा. मेरे और दो प्रिय विषय हैं : पहला सिनेमा और समाज; और दूसरा राजनीति के मार्फत समाज और समाज के मार्फत जन.
प में
र किसी अधटूटे तीर की तरह घुसा है
ऐ की मात्रा लगी है उत्थान की तरह
ताकि
म जब बिंधे
तो
सम्पूर्ण अर्थ बदल जाए
मिलकर
(प = पुरुष) (म = महिला)
@suneilsoni
ख़ुद से नाराज़ होता हूँ
तो बरस पड़ता हूँ औरों पर
सवाल ख़ुद से करता हूँ
जवाब तलब करता हूँ औरों से
तमन्नाएं रोज़ जोड़ते जाता हूँ
उम्मीद लगा लेता हूँ औरों से
बोझ से अपने दबा रह जाता हूँ
मंज़िलों पर रश्क़ करता हूँ औरों से
होश ठिकाने नहीं होते हैं मेरे
बेहोशी के इल्ज़ाम पाता हूँ औरों से
दिल के फ़रेब यूँ ताड़ जाता हूँ
वफ़ा का फ़न सीख जाता हूँ औरों से
©suneilsoni
©सुनील_सोनी
मेरे होने के ये मायने हैं
नज़ारा जो भी हो
मैं ही नज़र आऊंगा
पथरीली, काली बेचैनियों को
मिटकर भी मिटा जाऊंगा
जहाँ से निश्चिंत गुजरते हैं लोग
वहाँ भरोसों के कब्रिस्तान पड़े हैं
जहाँ इस बार पुरजोर बरसे हैं बादल
वहाँ इस बार फसलों पर ख़तरे बड़े हैं
जहाँ दावा है सूरज की रोशनी का
उन इलाकों में अकाल भारी पड़े हैं
©सुनील_सोनी
मुकम्मल सा दिन है, मुकम्मल रात भी
सराब इश्क़ में मुकम्मल जहां आज भी
तन्हाइयां भी मुकम्मल हैं और हिज़्र भी
हयाते नूर से मुकम्मल फरियाद भी
©सुनील_सोनी
कविता : सुनील स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी