मैंने परचम बनाया है तू एक नज़र डाल तो ज़रा
मेरी आँखों से आँखें मिलाने की ताब ला तो ज़रा
समाज का सबसे बड़ा सरोकार यानी प्रेम छीजता जा रहा है. लिहाजा, मेरी कविताओं में आपको प्रेम ही केंद्रबिंदु नज़र आएगा. मेरे और दो प्रिय विषय हैं : पहला सिनेमा और समाज; और दूसरा राजनीति के मार्फत समाज और समाज के मार्फत जन.
हर सुबह उजाले में सूरज के डूब जाता हूँ
शफ़्फ़ाफ़ ओ मरमरी गरमाहट से तर जाता हूँ
हर दिन सात रंगों से यूँ गुलज़ार हो जाता हूँ
हर रात लेकिन स्याह इकरंग से डर जाता हूँ
रोशनी तमाम कहीं से ढूँढ निकाल लाता हूँ
औ पूरे जी-जान फिर अंधेरे से लड़ जाता हूँ
गुफा में लौटने का ख़याल जिस पल पाता हूँ
सदियों पुरानी याद से रूह तक सहम जाता हूँ
हमराह सितारा देखकर अब भी सिहर जाता हूँ
हर कृष्ण पक्ष में आशिक़ चाँद का हो जाता हूँ
पत्थरों फिर माचिसों से रोज़ आग जलाता हूँ
हर वक़्त आगे बेतरह पर क्यों अंधेरे पाता हूँ
रात में रंग भर दे जो बिजली के लट्टू बनाता हूँ
हर रोज़ बस जाने क्यों वजूद यूँ ही बचाता हूँ
हर क्षण उजाले में ही रहने को मचल जाता हूँ
दिल में हर उग जाए सूरज, ये हलफ उठाता हूँ
©सुनील_सोनी
मेरी आँखों में अब जितना वीराना है
वही गली-कूचो का भी अब तराना है
मेरे दिल में अभी आँसू जो उभरा है
कबसे उसकी आँखों में भी वो ठहरा है
मेरे सीने से आती है जो उसकी सदा
मेरी वफ़ा भी उसकी धड़कन में रवां है
तड़पती बिजली जोश में बादल भी
बरस जाने की मेरी बेक़रारी भी जवां है
लाज़िम है उदासी का यूँ तारी हो जाना
मेरे हर रास्ते से वो कभी तो गुज़रा है
©सुनील_सोनी
इश्क़ के मुक़ाबिल दुनिया इस तरह थी
आशिक़ ओ माशूक़ ने बरक़त बहुत की
वो छत पर नुमाया हम सड़क पर निकले
नज़रें लड़ाईं पलभर, उफ्फ़ की न उह की
बोलती बंद हमारी उनकी इंटरनेट ने यूँ की
©सुनील_सोनी
कट जाता है दिन, पर रात नहीं कटती
कट जाती है दुपहर, शाम नहीं कटती
फुर्र होती सुबह बच्चों के खेल में मुब्तिला
बेबस हूँ, मुए फ़ोन से दूरी नहीं घटती
शुक्र है कि रात तन्हा, अभी ख्वाब सोये हैं
तेरी यादों के बिन यां, क्या वरना गुज़रती
महकेंगे ज़माने फुरकत के, ख़ुशबू से
कहाँ भूला कस्तूरी थी तेरे आने से उठती
हिसाबों में पड़ा हूँ यूं कि न दिन कोई छूटे
तय है वस्ल, क्यों शब न हिज़्र की गुज़रती
©सुनील_सोनी
©suneilsoni
वीराने में सहमा-सा छू जाता है
कोई नहीं है बस तू याद आता है
यह नहीं कि तेरी याद में खोया हूँ
हवा चलती है तो तू याद आता है
बिजलियाँ चमकें या बरसात हो
सीने से लिपटा तू याद आता है
अभी साया कोई गुज़रा छूकर
हमसाया मुझे तू याद आता है
पेशानी से बोसा मिटाया नहीं है
आईना देखकर तू याद आता है
©SuneilSoni
कविता : सुनील स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी