इश्क़ के मुक़ाबिल दुनिया इस तरह थी
आशिक़ ओ माशूक़ ने बरक़त बहुत की
वो छत पर नुमाया हम सड़क पर निकले
नज़रें लड़ाईं पलभर, उफ्फ़ की न उह की
बोलती बंद हमारी उनकी इंटरनेट ने यूँ की
©सुनील_सोनी
समाज का सबसे बड़ा सरोकार यानी प्रेम छीजता जा रहा है. लिहाजा, मेरी कविताओं में आपको प्रेम ही केंद्रबिंदु नज़र आएगा. मेरे और दो प्रिय विषय हैं : पहला सिनेमा और समाज; और दूसरा राजनीति के मार्फत समाज और समाज के मार्फत जन.
इश्क़ के मुक़ाबिल दुनिया इस तरह थी
आशिक़ ओ माशूक़ ने बरक़त बहुत की
वो छत पर नुमाया हम सड़क पर निकले
नज़रें लड़ाईं पलभर, उफ्फ़ की न उह की
बोलती बंद हमारी उनकी इंटरनेट ने यूँ की
©सुनील_सोनी
कट जाता है दिन, पर रात नहीं कटती
कट जाती है दुपहर, शाम नहीं कटती
फुर्र होती सुबह बच्चों के खेल में मुब्तिला
बेबस हूँ, मुए फ़ोन से दूरी नहीं घटती
शुक्र है कि रात तन्हा, अभी ख्वाब सोये हैं
तेरी यादों के बिन यां, क्या वरना गुज़रती
महकेंगे ज़माने फुरकत के, ख़ुशबू से
कहाँ भूला कस्तूरी थी तेरे आने से उठती
हिसाबों में पड़ा हूँ यूं कि न दिन कोई छूटे
तय है वस्ल, क्यों शब न हिज़्र की गुज़रती
©सुनील_सोनी
©suneilsoni
वीराने में सहमा-सा छू जाता है
कोई नहीं है बस तू याद आता है
यह नहीं कि तेरी याद में खोया हूँ
हवा चलती है तो तू याद आता है
बिजलियाँ चमकें या बरसात हो
सीने से लिपटा तू याद आता है
अभी साया कोई गुज़रा छूकर
हमसाया मुझे तू याद आता है
पेशानी से बोसा मिटाया नहीं है
आईना देखकर तू याद आता है
©SuneilSoni
जो पैर ज़मीं पर नहीं पड़ते
उनका ज़मीं पर गुजारा क्योंकर हो?
जिन्होंने सपने नहीं देखे
उनका आसमां पर किनारा क्योंकर हो
जिन्होंने कभी नदी की रेत नहीं देखी
पहाड़ों का उन्हें नज़ारा क्योंकर हो
©सुनील_सोनी
गश्त यूँ ही गली में लगती रही
मुश्क़ यूँ ही गली में फबती रही
यादों के सफ़र में मैं जगती रही
ख्वाबों के आईने में सजती रही
दिल ज़र्रा ज़र्रा यूँ फुदकता रहा
पेड़ पे कोई कोयल कूकती रही
गजरे से फूल आँगन में गिरते रहे
आंसुओं से गली मेरी सजती रही
तू चली आ कि बज़्म भरती नहीं
महफ़िल तेरे बिन बहकती नहीं
©सुनील_सोनी
©suneilsoni
नक़ाब में आँखों से पढ़ते हैं तेरा हाल
किस्सा ज़माना ए बेहिजाबी खत्म हुए
परदा भी सितमगर ने किया बेमिसाल
बज़्म में रस्म ए हया के रिश्ते खत्म हुए
धड़कता दिल है ज़ोर से क्यों हूं बेक़रार
सुनते हैं दीदार के सब रस्ते खत्म हुए
दरयाफ़्त में है आया वो नाम कई बार
शुक्र कि तफ्तीश के वो हिस्से ख़त्म हुए
सच्चे हैं कि झूठे क्यों मैं करूँ एतबार
हुस्न ए मेहताब के यूँ चरचे ख़त्म हुए
©सुनील_सोनी
@suneilsoni
कविता : सुनील स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी