गश्त यूँ ही गली में लगती रही
मुश्क़ यूँ ही गली में फबती रही
यादों के सफ़र में मैं जगती रही
ख्वाबों के आईने में सजती रही
दिल ज़र्रा ज़र्रा यूँ फुदकता रहा
पेड़ पे कोई कोयल कूकती रही
गजरे से फूल आँगन में गिरते रहे
आंसुओं से गली मेरी सजती रही
तू चली आ कि बज़्म भरती नहीं
महफ़िल तेरे बिन बहकती नहीं
©सुनील_सोनी
©suneilsoni