रविवार, 24 फ़रवरी 2019

#Oscars & #India

ऑस्कर 2019 और भारत

-सुनील सोनी 

ऑस्कर पुरस्कारों के वितरण में 12 घंटों से भी कम समय बचा है. लेकिन, कुछ बातें जो जरूरी हैं, जान लें. 
इस बार ऑस्कर में ऐसी दो फिल्में नामांकित हुई हैं, जिनका किसी न किसी तरह भारत से संबंध है. इनमें से एक तो बेस्ट फिल्म, बेस्ट एक्टर समेत 5 श्रेणियों में नामांकित हुई है, जबकि दूसरी जिस श्रेणी में नामांकित हुई है, वह शॉर्ट डाक्युमेंटरी है. इस श्रेणी में नामांकित फिल्म में इकलौती महिला निर्देशक हैं.

Poster : Bohemian Rhapsody
पहली फिल्म रैमी मलिक के अभिनय से सजी जीवनी ‘बोहेमियन रैपसिडी’ है. इसे ‘सर्वश्रेष्ठ फिल्म’, ‘सर्वश्रेष्ठ अभिनेता’, ‘सर्वश्रेष्ठ फिल्म एडिटिंग’, ‘सर्वश्रेष्ठ साउंड एडिटिंग’, ‘सर्वश्रेष्ठ साउंड मिक्सिंग’ जैसी श्रेणियों में नामांकित किया गया है.

‘बोहेमियन रैपसिडी’ दरअसल, एक एलबम का नाम है, जो उस ज़माने में 6 मिनट लंबा था और इतने लंबे गीत को प्रसारित करने से तब के रेडियो इनकार कर देते थे. बीबीसी उस समय बड़ा नाम था. लेकिन, एल्बम के अभूतपूर्व मिज़ाज़ को देख उसने उसे प्रसारित किया।

फ्रेडी मरक्यूरी पॉप जगत में अब तक के सबसे प्रसिद्ध नामों में से एक हैं. वे भारतीय पारसी मां बाप (जेर और बोमी बलसारा) की संतान थे. उनकी बड़ी बहन का नाम था कश्मीरा. उनका जन्म 5 सितंबर 1946 को जंजीबार में हुआ, जहां उनके पिता अंग्रेजी सरकार के कारिंदे थे. उनका ज्यादातर बचपन भारत मे बीता, जिसमें उन्होंने औपचारिक शिक्षा के अलावा संगीत दीक्षा भी ली. जंजीबार में विद्रोह हुआ, तो उनके पिता इंग्लैंड में बस गए. नौजवान फ्रेडी भी बाद में लंदन में कला की पढ़ाई करने लगे.

उन्होंने कई रॉक बैंड में काम किया, पर 1970 में उन्होंने ‘स्माइल’ नाम के बैंड में गिटारवादक ब्रायन मे और ड्रमर रॉजर टेलर के साथ काम शुरू किया. वे इस रॉक बैंड के मुख्य गायक और गीतकार थे. सालभर बाद उनके साथ संगीतकार जॉन डिकॉन भी जुड़ गए. इसके बाद उन्होंने ‘क्वीन’ नाम का गीत लिखा और रिलीज से पहले बैंड का नाम भी बदलकर ‘क्वीन’ रख दिया. इस गीत और उनके परफॉरमेंस ने धूम मचा दी. फिर बैंड ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. उन्होंने अपना नाम भी फ्रेडी बलसारा से फ्रेडी मरक्यूरी कर लिया.

Rami Malek and Freddie
‘बोहेमियन रैपसिडी’, ‘किलर क्वीन’, ‘समबडी टू लव’, ‘डोंट स्टॉप में नॉव’, ‘क्रेज़ी लिटिल थिंग कॉल्ड लव’ और वी.आर. चैम्पियंस’ जैसे हिट गीतों ने उनकी जिंदगी बदल दी. उनके चार दाँत जन्मजात बड़े थे और यही उनकी गायिकी में काम आए. वे ऊंचे और नीचे सुर भी इतनी आसानी से लगाते थे और कोई भी गीत इस तरह लय में गाते थे कि लोग उनके साथ सीधे जुड़ जाते थे. फ्रेडी का सबसे बड़ा चमत्कार यही था कि वे श्रोताओं को अपने साथ जोड़ लेते थे. कई परफॉरमेंस में उनके साथ लोग भी गाते और नाचते थे.


फिल्म में रैमी मलिक ने उनकी भूमिका निभाई है. वे सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का ऑस्कर जीत सकते हैं. एडिटिंग और साउंड एडिटिंग के दोनों पुरस्कार भी इस फिल्म को मिल सकते हैं.

‘पीरियड्स : ऐंड ऑफ सेंटेंस’

दूसरी फिल्म शॉर्ट डाक्युमेंटरी है :  ‘पीरियड्स : ऐंड ऑफ सेंटेंस’. उत्तरप्रदेश के हापुड़ के एक गांव की किशोरी छात्राओं पर बनी यह डाक्युमेंटरी लॉस एंजिल्स की 6 छात्राओं की मेहनत का फल है. यह फिल्म ऑस्कर में लघु आकार की डॉक्युमेंटरी श्रेणी में चुनी गई है. खास बात यह है कि लॉस एंजिल्स के ऑकवुड स्कूल की छह हाईस्कूल छात्राएँ में इस फिल्म की कार्यकारी निर्माता हैं. हॉलीवुड पब्लिसिस्ट लीसा टैबैक की बेटी क्लेयर स्लाइनी, फिल्म के छह कार्यकारी निर्माताओं में से एक है. फिल्म की निर्देशक रायका जेहताबकी हैं, जबकि सैम डेविस फिल्म के सिनेमैटोग्राफर, एडिटर, साउंड डिजाइनर और निर्माता हैं. गुणीत मोंगा की वजह से भारत में यह फिल्म शूट हो पाई.

25 मिनट लंबी इस फिल्म में छात्राओं से पूछे गए प्रश्नों और उत्तर के बीच लंबा सन्नाटा है, जो भयभीत करता है. यह सन्नाटा रॉ फुटेज में और लंबा है. यह दिखाता है कि कैसे भारत में लड़कियों के लिए मासिक धर्म शर्मसार करने वाली घटना है और उन्हें कोई अंदाज़ नहीं है कि इससे कैसे निपटा जाए. हापुड़ के स्कूल के छात्र-छात्राओं की बातचीत से फिल्म शुरू होती है. एक लड़का पूछता है कि क्या ये किसी कक्षा के पीरियड की तरह है, जिसके लिए एक घंटा बजता है? जब उस लड़के से पूछा जाता है कि क्या तुम पीरियड के बारे में जानते हो, वह किशोर उत्तर देता है, ‘‘यह एक तरह का रोग है न?’’

Poster of Film and Guneet Monga
अरुणाचलम मुरु गनाथनम ने सस्ते सैनेटरी पैड बनाने की जो पहल की, उसी से ईजाद मशीन को इस गांव में लगाया जाता है. यह स्नेहा, रेखा और दूसरी लड़कियों का जीवन बदल देती है. गांव की औरतें ही ये पैड बनाती हैं और बेचती हैं. यह उनके लिए आमदनी का जरिया ही नहीं है, बल्कि इसने गहरी खाई पाटने में मदद भी की है और पुरुषों के बीच भी इस विषय पर विमर्श शुरू किया है.

बाफ्टा पुरस्कारों के लिए नामांकित गुणीत मोंगा की कंपनी सिख्या एंटरटेनमेंट भी इस डॉक्युमेंटरी की निर्माता है. मोंगा ने बताया कि कि ऑकवुड स्कूल की 12-14 साल की लड़कियों के समूह ने कहीं आलेख पढ़ा कि कैसे भारत के गांवों की लड़कियों को मासिक धर्म के चलते साफसफाई और शर्म के चलते स्कूल छोड़ देना पड़ता है. उन्होंने एक्शन इंडिया नामक एनजीओ से संपर्क किया और कहा कि वे सैनेटरी पैड बनाने वाली मशीन दान करना चाहती हैं. उन्होंने कई उपक्रम चलाए और पैसे जुटाए.
लेकिन, जब उन्हें लगा कि यह पर्याप्त नहीं है तो शिक्षिका के प्रोत्साहन से उन्होंने ऑनलाइन अभियान चलाया, ताकि इस विषय में चर्चा के लिहाज से डॉक्युमेंटरी फिल्म बनाई जा सके. जैसे ही पैसे पूरे हुए, उन्होंने रायका से संपर्क किया.
मोंगा ने बताया, ‘‘उनमें से एक लड़की के माता-पिता मुझे जानते थे. उस लड़की ने मुझे भारत में शूटिंग में मदद करने के लिए कहा.’’  फिल्म में मोंगा की सहयोगी मंदाकिनी कक्कड़ का वाइसओवर है, जिन्होंने लड़कियों को मनाया और उनसे बात की.  अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद और फिर हिंदी से अंग्रेजी करना एक समस्या थी और दूसरी समस्या थी लड़कियों से कुछ कहलवा पाना. लेकिन, हमने इसे हल कर लिया.

युवा निर्देशक *रायका

Director Rayka Zehtabchi
फिल्म की निर्देशक रायका जेहताबकी इस श्रेणी में नामांकित की गईं अकेली स्त्री हैं. 25 साल की इस निर्देशक ने महज 2 साल पहले यूएससी फिल्म स्कूल से स्नातक किया है. रायका कहती हैं, ‘‘मैं जब स्नातक हुई तो इन 6 कार्यकारी निर्माताओं में से एक
लड़की रूबी शिफ के पिता ने मुझसे इस बारे में बात की. यह प्रोजेक्ट लॉस एंजिल्स के ऑकवुड स्कूल में पढ़ानेवाली अंग्रेजी शिक्षिका मेलिसा बर्टन के कारण शुरू हो पाया.’’
रायका ने बताया कि फिल्म बनाने में हमें दो साल लगे. उस गांव की औरतें कैसे दूसरी औरतों की मदद कर रही हैं, इस बारे में वे कहती हैं, ‘‘जो चीज हमें गर्व से भर देती है, वह यह कि भारत के छोटे से गांव में कुछ दृढ़निश्चयी महिलाओं का समूह ‘एक समय में एक पैड’ की प्रथा को बदलने के लिए काम कर रहा है.’’

(*रायका, दरअसल रेखा हैं और उनका सरनेम भी मेहताब से संबंधित है। वे ईरानी हैं)



बुधवार, 12 सितंबर 2018

इंसानों और रोबोट्स के रिश्तों की दास्तान बयान करती कहानियाँ


Published by ZN Team on September 11, 2018 

विष्य कथाएं लिखने की परंपरा भारत में, खासकर हिंदी में बहुत ज्यादा समृद्ध नहीं हो पाई है. सत्तर के दशक में प्रो. दिवाकर या डाॅ. रमन के छद्म नाम से छपने वाले साइंस फिक्शन और कैलाश शाह या कृश्नचंदर जैसे प्रतिष्ठित लेखकों की कहानियां-उपन्यास को छोड़ दिया जाए तो इस विधा में बहुत कम हिंदी साहित्य उपलब्ध है.
रोबोटोपिया: निकट भविष्य की कहानियाँ 
लेखक: संदीप अग्रवाल

रविवार, 19 अगस्त 2018

उम्मीद

उम्मीद

चाँद को पहलू में लिये बैठा हूँ
दामन में रोशनी लिये बैठा हूँ

अँधेरे ज़िंदगी के ख़त्म नहीं होते
तनहा नहीं बैठा,भीड़ में बैठा हूँ

इबादतों के दौर गुज़रे जाते हैं बारिश नहीं होती
खाली नहीं बैठा, सजदे में बैठा हूँ

-सुनील

स्वाद की वर्षा

स्वाद की वर्षा

अक्सर मां लोकोक्तियां कहती हैं. कुछ जीवन से जुड़ीं, कुछ प्रकृति से. उनमें से बुंदेलखंडी में यह भी है : ‘‘सावन मूला, भादों मही/ क्वांर करेला, कातक दही/ मरहौं न तो परहौं सही.’’ ऋतु के बरसाती चौमासे पर ये लोक समझ का वितान है. विदर्भ में ठेठ वरहाड़ी भोजन से मुंह जला बैठने के बाद जो जलीकटी दिल से और पेट से निकलती है, वह आग बरसाते सूरज और उतनी ही शिद्दत से तपती धरती के पाकरहस्य का तिलिस्म तोड़ने का जज़्बा शायद ही बचने देती है.

बारहोंमास किसी भी सड़क, किसी भी कोने-किनारे, बाज़ार से गली-कूचों तक भोग लगा आते हों, वो सावन का इंतज़ार नहीं करते कि कोई बूंद मेघ बरसायें और माटी की सौंधी खुशबू से मन भरे; ताकि प्रतिक्रिया में उठती बेसन की गंध रसोई में झांकने पर विवश कर दे.
घर के दीवानखाने की फ्रेंच विंडो के कांच से झरती धार के बीच दूर तलक फूल-पौधों को झूमते हुए भीगते देख पाना सपना हो; लेकिन, स्याह-सी दोपहर के अहसास में रिमझिम नाद का सुकून उस व्यंजन की स्मृति को पुनर्जीवित कर ही देता है, जिसके आस्वाद के व्यग्रता की तीव्रता कुलमहिषी के इत्मीनान की स्थिरता से अधिक है.

परिणीति निश्चय उस अभिव्यक्ति से मेल खाती है.. ज्यों.. टमाटर-धनिया-मिर्च की चटनी में डुबोकर मनोदर तृप्त करने वाले पकौड़े देर तक जमीं पर उतरने नहीं देते. ..जब तक चाय की चुस्की स्वाद संपूर्ण न कर दे.

बात बेसन के पकौड़ों की होती, तो बहुत-सी बातें याद आतीं.. मसलन, दादी और मां से होते हुए जीवनसाथी तक की बहुविधस्वाद श्रृंखला. ‘आम’ भजियों से ‘कुलीन’ पकौड़े होते जाने का शब्द-संबंध वर्षा ऋतु आरंभ से ही है, वरना फिर कहां...  

मेघवर्षा सौंदर्य उपासकों में रससंचार के उपक्रम में ही नहीं रह जाती; मन की अगन, तन की अगन, पेट की अगन भी बुझाती है. विरह महज प्रेम में होता है, तो यकीन जानिये कोई भी भोजनप्रेमी गलत साबित कर देगा.

वर्षा गोलगप्पों से लेकर मनाही की पूरी सूची बनवाती है, जो बाजार से घर तक स्वानुशासन की रेखा से इधर-उधर होकर चलती रहती है. शाकाहारियों और मांसाहारियों की दशा में अंतर नहीं बचता. शाकाहारी अत्याल्पाहारी हो जाते हैं; मांसाहारी प्रकृतिवश शाकाहार की ओर मुड़ जाते हैं.

मंद जठराग्नि का समय संभवत: उपवास का सर्वश्रेष्ठ समय हो आता है. सावन में नौजवान लड़कियां शिव को साधने में सोमवार का व्रत न करें और लड़के कांवड़ से जल लाकर देवों को न चढ़ाएं तो कैसे बड़े-बूढ़े मनवा पाते कि वर्षा में सुपाचन अमृतवर्षा ही है.
प्रकृति के आनंदोत्सव की ऋतु सब प्राणधारियों के फलने-फूलने का वरदान है. हर हर हरियाली हरे पत्ताें की शाक को तक वर्ज्य बना देती है, ताकि सूक्ष्म जीव संसार बड़ा हो और मनुष्य का आत्मानुशासन भी.

अजब नहीं कि विज्ञान के बाजार से मेल ने थोड़े समय में इतना कुछ बदल दिया कि ‘चातुर्मास का बंधन’ समाजबंध की जगह धार्मिक हो चला. परिवहन खाद्य परिवर्तन भी ले आया. शेष कसर पीढ़ीगत स्मृतिलोप पूरी कर दी. यह तक भुला दिया कि वर्षा से फैली; चहुंओर हरियाली गाय के दूध तक का स्वाद/गुणधर्म बदल देती है; मछलियों समेत कई जीवों का प्रजननकाल यही है और संक्रमण का भीषण समय भी. उष्णकटिबंधीय प्रदेश के व्यापक ऋतुचक्र में ‘चातुर्मास’ के मूल मिताहार, पथ्य या आहार नियमन ही हैं.

आपको पालने हों, तो यह नियमन बड़े-बुजुर्ग बताएंगे या आहारविद्. लेकिन, सावन के बाद किसी को पथ्यप्रतिबंध तोड़ते देखें तो समझें कि स्मृति में वह वहीं से संचित है, रूप बदलकर भले ही.

शुक्रवार, 2 मार्च 2018

तुम मेरे रंग

🌾🌾🌱🌴☘🍀🌿
रंगों में
पहले से भी
पहले का
सबसे आखिरी के
बाद फैला
जीवन के ज से
प्रेम के म तक
पृथ्वी के
नील
और
शुक्र जैसे
अमिट
पिघले
सब क्षण
वो
जो
तुमने
और
मैंने
जिया
साथ
सूक्ष्म भी
समग्र भी
वे रंग
इंद्रधनुष से अपार
तुम पर
न्यौछावर
🍁🍂🌿🌱
©सुनील सोनी 

सोमवार, 13 जून 2016

क्या स्विट्जरलैंड सभ्यता के नए पायदान पर नहीं जाना चाहता?

क्या स्विट्जरलैंड सभ्यता के नए पायदान पर नहीं जाना चाहता?



विविध एवं बहुआयामी संकट से जूझ रहे संपूर्ण मानवीय समाज के समक्ष फिलहाल असमंजस यह है कि सभ्यता के नवचरण में प्रवेश के लिए वह रास्ता कौन-सा चुने? प्रौद्योगिक-धार्मिक अतिरंजना के क्षण में स्विट्जरलैंड ने बहुत छोटा-सा प्रयोग किया, जिसके खिलाफ सत्ता से आवाम तक बड़ी आवाज बुलंद हुई. मूल मकसद के चलते इस प्रयोग को विफल माना भी जाना चाहिए,पर उसने जो राय मांगी थी, वह बहुत महत्वपूर्ण थी.  वह थी कि क्या सभी नागरिकों को हर महीने तय रकम  दी जाए, चाहे वे काम करें या नहीं. बच्चों को भी उनका तयशुदा हिस्सा मिले. रायशुमारी में इसे बहुत थोड़ा समर्थन मिला. लेकिन, क्या इससे उस मकसद को व्यापक बनाकर संकट का समाधान तलाशा जा सकता है? 

अहम था उस जनमत संग्रह का हिस्सा बनना, जो साबित करता है कि ऐसा कोई भी सवाल स्विट्जलैंड जैसे देश में कितने मायने रखता है. अगर भारत में यह रायशुमारी कोई करता, तो उसे ‘पागल’ करार देने में चंद मिनट भी न लगते. लिहाजा, सवाल यह कि स्विट्ज़रलैंड ने ऐसे किसी विकल्प को क्यों नकारा? क्या जनमानस में ऐसे सवाल पहले से ही कौंध रहे थे? लेकिन, सिर्फ स्विट्ज़रलैंड नहीं, भारत में दो दशक पहले से ऐसा विचार विमर्श जारी है. फ़र्क महज उद्देश्यों और सिद्धांतों का  है. आइए उस विमर्श के बारे में बात करें...




तकरीबन दो दशक बीत चुके हैं, जब नागपुर में हम इस बात पर सिर खपा रहे थे कि पैसे से समग्रता में छुटकारा पाने के लिए क्या किया जाए? दुनिया में पैसा लगभग भगवान की जगह रखता है और हर कोई उसके पीछे है. ‘आजच्या सुधारक’ के संपादकीय मंडल के सदस्य और भारत में नवोन्मेषी सोच रखनेवाले चिंतकों में से एक दिवाकर मोहनी उस वक्त नया सुझाव रख रहे थे. यह सन 1996 से 2004 के बीच का वक्त था. उस समय तक मोहनी जी महान समाज सुधारक गोपाल गणेश आगरकर की ‘सुधारक’ पत्रिका को नागपुर से पुनर्जीवित कर चुके थे और दो दशकों से  मौजूदा युग में मानवीय जीवन का हिस्सा बन चुके कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर काम कर रहे थे. ये मुद्दे थे ईश्वर और धर्म; पैसे से मुक्ति एवं नई अर्थव्यवस्था की अवधारणा, स्त्री स्वतंत्रता और शिक्षा; विवाह संस्था एवं परिवार.

इन सब मुद्दों में ‘पैसे से मुक्ति’ (महज मुद्रा से निजात नहीं) एक ऐसी अवधारणा थी, जो अत्यंत विचारोत्तेजक थी.  पैसा एक ऐसी चीज है, जिससे हम अपनी खाल की तरह ही मुक्ति नहीं पा सकते. दूसरे शब्दों में यह भी कह सकते हैं कि पैसा हमारी आत्मा में गहराई तक धंसा है.  उसको नष्ट करने का सिद्धांत ही कई लोगों को सिहरा देता है और गुस्सा दिलाता है या वे उसे अविश्वसनीय गल्प मानकर खारिज कर देते हैं.

लिहाजा, जब यह संवाद होता कि विश्व को पैसे से मुक्ति दिलानी ही होगी, तो मोहनी जी को एक नया विचार सूझा. विचार यह था कि हर व्यक्ति किसी के बैंक खातों में हर माह एक निश्चित रकम डाल दी जाए, चाहे वह काम करता हो अथवा नहीं. बच्चों के लिए भी एक निश्चित रकम दी जाए. हर परिवार में चाहे जितने भी सदस्य हों, यह रकम सरकार उनके खाते में हर माह जमा करेगी और उसे महंगाई के सूचकांक के हिसाब से बढ़ाती घटाती जाएगी. (महंगाई वाला सिलसिला व्यवस्था के पूर्णता प्राप्त कर लेने तक ही चलेगा, क्योंकि उसके बाद धन की जरूरत ही खत्म हो जाएगी.)

इस ख्याल की चिंगारी को हवा उसी समय तेजी से प्रचलित हो रहे क्रेडिट और डेबिट कार्डो की प्रणाली ने दी थी कि कैसे ‘आभासी धन’ यानी वर्चुअल मनी पैसे को हकीकत में नष्ट करने का आगाज कर देगी और चूंकि मुद्रा प्रथम चरण में खत्म होगी, शनै:-शनै: वह (पैसा) खुद खत्म होता चला जाएगा. यह कोई पुराने युग की व्यवस्था नहीं थी, जिसमें करंसी नोटों और सिक्कों से पहले अनाज अथवा वस्तुओं के लेनदेन करके व्यापार कर लिया जाता था. यह एक ऐसी व्यवस्था की अभिकल्पना थी, जिसमें लेनदेन की जरूरत रह ही नहीं जाती और हर अनिवार्य सामग्री सबको नि:शुल्क ही प्राप्त होती.

निश्चित ही इस कल्पना ने संदेह के घने बादल उठाए और सवालों की मूसलाधार बारिश ने भी उन्हें कम नहीं किया.  यह यह बेहद रोमानी कल्पना थी, जिससे पहली नजर में अराजकता फैलने का खतरा पैदा होने का अनुमान था. यह इसलिए कि माना जाता है कि सभ्यता के इस चरण में दुनिया के अमूमन सभी हिस्सों में अपवादों को छोड़कर धन को ही श्रम का मूल माना जाता है और शासन तथा शक्ति का केंद्रबिंदु भी. लेकिन, दिवाकर मोहनी बादलों को छाँटने के प्रयास में हमारे नकारात्मक सवालों के जवाब खोज रहे थे.  उनकी समझ निश्चय ही कहती थी कि श्रम के बदले धन दिया/लिया जाना गुलामी का ही एक रूप है, जो अंतत: शोषण तक ले जाता है और सजर्नात्मक वृत्ति को समाप्त करता है. पैसा अंधविश्वास की तरह नकली चीज है. विभिन्न उदाहरणों से वे यह मनवा पाने में कामयाब रहे भी.

इसके बावजूद यह सवाल भी उठा कि धन के अभाव में व्यवस्थाएं कैसे चलेंगी? जब कोई मजदूर नहीं होगा, तो उत्पादन कैसे होगा? जब उत्पादन नहीं होगा तो सब कुछ ठप हो जाएगा? जीवन स्तर में बढ़ोत्तरी के मापदंड कैसे होंगे? सबसे बड़ी कठिनाई कि अनाज कैसे उगेगा?

यहां मोहनी जी का तर्क था, ‘‘सामुदायिक शासनकर्ता (अथवा समाज अधिष्ठाता) ही अगर इसे लागू करेंगे तो वे नई चुनौतियों के हल भी ढूंढेंगे. यानी सामुदायिक समानता का अधिकार सर्वप्रथम होगा, जिसमें व्यक्तिगत के बजाय सामुदायिक श्रम की भागीदारी महज न्यूनतम उत्पादन एवं अधिकतम सृजन तक सीमित होगी. नई व्यवस्था में सबको सबकुछ प्राप्त करने के लिए उत्पादन में योगदान देना होगा, जो अनिवार्यता से स्वैच्छिकता की ओर बढ़ता चला जाएगा.  यानी एक नई प्रणाली की स्थापना हो जाएगी. यह उत्तरोत्तर प्रगति करेगी. मतलब यह कि जहां समुदाय ही अनाज उगाएगा, वहीं जरूरी उत्पादन भी करेगा और आविष्कार भी. धन के लोप के चलते सभी अड़ंगे मिट जाएंगे. इससे संसाधनों का दुरुपयोग भी खत्म होगा.’’

एक सवाल और उठा कि क्या श्रम के महत्वहीन होने से लोग आलसी नहीं हो जाएंगे? अथवा नए आविष्कार एवं प्रयोग रुक नहीं जाएंगे? हमारे एक मित्र ने महाराष्ट्र के यवतमाल जिले के कोलाम आदिवासियों का उदाहरण दिया, जिनकी बेतरह गरीबी पर तरस खाकर तत्कालीन सरकार ने उन्हें भरण-पोषण खर्च देना शुरू कर दिया था. इसके चलते वे आलसी हो गए थे और उन्होंने रोजगार के प्रयास तक छोड़ दिए थे, क्योंकि उस अल्प भरण-पोषण खर्च में वे पूरा माह काम चला लेते थे.

लेकिन, विचार प्रक्रिया से इसका जवाब भी मिल गया. खासकर, मोहनी जी ने इसकी दिशा दी. निश्चय ही पहले कुछ समय तक श्रम के अभाव में लोग आलसी हो जाएंगे, पर वे उसके बाद अपने शौक पूरे करने में जुट जाएंगे. उनमें से जो लोग घूमने के शौकीन होंगे, वे घूमेंगे; जो वैज्ञानिक होंगे, वे प्रयोग करेंगे, जो संगीत में रुचि लेते होंगे, वे सीखेंगे-सिखाएंगे या संगीत समारोह करेंगे-नई गीत और धुन रचेंगे. पेंटिंग  और शिल्प रचे जाएंगे, फिल्में और नाटक होंगे.  सबसे बड़ी बात सब उन्हें देखेंगे, सुनेंगे. सबकी बारी उत्पादन, रचना एवं आविष्कार की रचनात्मक प्रक्रिया में शामिल होने की होगी, जिसे समाज तय करेगा. यह नए समाज के उत्थान की प्रक्रिया में होता जाएगा, जिसमें कुछ दशक या सदियां भी लगेंगी.

जहां तक अराजकता की बात थी, वह प्रारंभिक पायदान तक ही सीमित रह जाएगी, क्योंकि उसे काबू में करने के लिए समाज एवं शासनकर्ता उपयुक्त कदम यानी चेतना का स्तर बढ़ाने जैसे तरीके शिक्षा जैसे औजार के मार्फत उठाएंगे. चूंकि नए समाज की रचना के पहरेदार और हरकारे वही होंगे, इसलिए वे नए नियम रचेंगे, जिसे समाज की स्वीकृति के बाद ही लागू किया जाएगा. इसे ग्रामसभा की तरह देखा और लागू किया जा सकता है.

इसमें सबसे बड़ा सवाल यह था कि ऐसे बेहतर समाज के लिए क्या हर मनुष्य तैयार होगा और वह अपनी प्रवृत्ति को काबू में रख सकेगा? वह भी बिना किसी अनुशासन के? क्योंकि इस समाज में रेजिमेंटेशन जैसी अनुशासन कुप्रवृत्तियों के लिए जगह ही नहीं बन सकती. एक और मानवीय कुप्रवृत्ति ‘लालच’ से कैसे पार पा सकेंगे? क्या इसके लिए जेनेटिक कोड बदलने की जरूरत होगी, या इंसान खुद बदल जाएगा?

बहुत सालों तक कई अनुत्तरित प्रश्नों को वहीं छोड़ दिया गया कि जब यह प्रयोग होगा, तब देखा जाएगा.

तकरीबन 20 साल बाद स्विट्जरलैंड में ‘बेसिक इनकम समूह’ ने वह प्रयोग किया, जिसका नागपुर के इस विमर्श को इंतज़ार था. वहां इस बात पर रायशुमारी हुई कि क्या सभी को एक निश्चित रकम हर माह मिल जाए, जो मौजूदा वक्त और महंगाई के हिसाब से बड़ों के लिए 2500 स्विस फ्रैंक और नाबालिगों एवं बच्चों के लिए 625 स्विस फ्रैंक हो. हालांकि, वे पैसों से मुक्त नई दुनिया बनाने की ओर कदम नहीं उठा रहे थे. वे बस बेरोजगारी को सबक सिखाने के पक्षधर थे. लेकिन, अंतत: यह योजना थी बेहतरीन, जिसे लोगों ने नकार दिया.

सवाल यह उठता है कि क्या लोगों ने इसे इसलिए नकार दिया कि इस समूह ने इसे बेरोजगारी का हल बताया था? हालांकि, भारत के नागपुर शहर में बैठे दिवाकर मोहनी और सभ्यता के नए स्तर की रचना के इरादे को वैचारिक रूप देने की समझ कायम करने अथवा गुननेवाले लोग मानते हैं कि यह नई दुनिया की ओर एक कदम है और स्विट्जरलैंड ने यह पहल की है. हालांकि वह हर प्रयोग के पहले पड़ाव से फिसल गया? लेकिन, इससे आगे ऐसे प्रयोग होते रहेंगे.

-सुनील सोनी 
(लेखक खुद उस विचार-विमर्श का हिस्सा रहा है)

दिवाली की शुभकामनाएं

कविता : सुनील  स्वर : अर्चना वीडियो संपादन : गार्गी